रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तम प्रभाव १५६
अथ उत्तमा-लक्षण- ( दोहा )
(२७२) मान करै अपमान तें, तजै मान तें मान ।
पिय देखें सुख पावई, ताहि उत्तमा जान ।३५।
उत्तमा, यथा--( सवैया )
(२७३) होइ कहा अब के समुझे न तबै समुझे जब हे समुझाए ।
एक ही बंक बिलोकनि माँह अनेक अमोल बिबेक बिकाए ।
जानिपनो न जनावहु जी जनमावधि लौं उहि जानि हौ पाए ।
बातैं बनाइ बनाइ कहा कहौ लेहु मनाइ मनाइ ज्यों आए ।३६।
शब्दार्थ—अब के समुझे = इस समय समझने से । समुझाए हे = समु-
झाए गए थे । हौं = मैं । बंक बिलोकनि = टेढ़ी चितवन । माँह = में ।
अमोल = अमूल्य । बिबेक = ज्ञान । जानिपनो = ज्ञानीपना, चतुराई । जनमा-
वधि लौं = जन्म भर में, सारी जिंदगी लगाकर ।
भावार्थ- ( सखी की उक्ति नायक प्रति ) जब मैंने आपको समझाया
तब तो आपने समझा नहीं, अब समझने से भी क्या लाभ ? ( अन्य नायिका
की ) एक ही टेढ़ी चितवन में आपके अनेक अमूल्य ज्ञान बिक गए । आपने
यह नहीं समझा कि वह अप्रसन्न हो जाएगी । आपका ज्ञानीपना समझ गई ।
उसे दिखाने की कोशिश मत कीजिए । सारी जिंदगी खपाकर तो उसे किसी
प्रकार आपने समझा है । उसके स्वभाव को पहचाना है । बातें बना बनाकर
कहने से क्या होगा ? जैसे उसे पहले मनाते रहे हैं उसी प्रकार फिर क्यों नहीं
मना लेते ?
अथ मध्यमा-लक्षण-( दोहा )
(२७४) मान करै लघु दोष तें, छोड़ै बहुत प्रनाम ।
केसवदास बखानियै ताहि मध्यमा बाम ।३७।
शब्दार्थ—बहुत प्रनाम = बहुत प्रणाम करने पर, पैरों पर गिरने से ।
मध्यमा, यथा - ( सवैया )
(२७५) भूलेहूँ सूधे नहीं चितयो इहिं कान्ह कियो लचि लालच केतौ ।
हाहा कै हारि रहे मनमोहन पाइ परे त्यों परेई रहे तौ ।
हौं तो यहै तब ही की बिचारति होतौ गुमान क्यों याहि धौं एतौ ।
लाँबी लटैं अरु पातरी देह जु नेक बड़ी बिधि आँखि न देतौ ।३८।
शब्दार्थ-लचि = नम्रतापूर्वक । हाहा कै = दीनता दिखाकर ।
३५-पिय-प्यौ । ३६-होइ-होहि । हे-हौं । जानिपनो-जानि परौ,
जान परचो । बातें-बात । ३७-छोड़ै-छोड़ो । छोड़ै ०-तजै मान तें मान ।
बखानियै-बखानिहु । ३८-मनमोहन-पुनि केसव । पाइ ०-प्यारी के पाइ । त्यों-
तो । बिचारति-बिलोकति । याहि धौं-छाहि सो । धौं-तो । एतो-केतो ।