रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तम प्रभाव १५७
शब्दार्थ--चारु = सुंदर । अंबर = वस्त्र । के उर = के बीच, भीतर
वस्त्रों के नीचे । सुमन = पुष्प । वारौं = न्यौछावर करूँ । कोरि = कोटि,
करोड़ों । बानी जगबंद = संसारपूज्या सरस्वती । दीनी = दुःखी । अरबिंद =
कमल । ब्रजचंद = श्रीकृष्ण । ज्यों = जैसे, तरह ।
भावार्थ--( सखी की उक्ति नायक प्रति ) शरीर में चंदन लगाए,
सुंदर ( श्वेत ) वस्त्र पहने, उन वस्त्रों के नीचे मोतियों के हार गले में डाले,
( श्वेत ) पुष्पों की माला वक्षःस्थल पर धारण किए वह आनंद की जड़ सी
शोभित होती है । ( उसकी सुंदरता पर ) करोड़ों रति न्यौछावर करती हूँ ।
हे नाथ, वह वीणा में आपका गुणगान करती है । उसके साथ मृगछौने तो हैं
ही, हंस भी जा रहे हैं, जिससे जगद्वंद्य शारदा सी जान पड़ती है । जिसे देख
कर (सौतों की) दूतियां चकित होकर चकई की भाँति भाँग चलीं और सौतें
कमलिनी की भाँति मुरझाकर दुःखित हुई अर्थात् कोई उसके सौंदर्य के सामने
ठहर न सकी ( चंद्रमा को देखकर चकई एवम् कमल मंद हो जाते हैं ) ।
अंधकार रूपी वियोग जाता रहा । नेत्र रूपी चकोर प्रफुल्ल हुए । हे ब्रजचंद,
वह चंद्रावली की भाँति चलकर चंद्र ( आप ) के पास आई है ।
अलंकार--उपमा से पुष्ट रूपक ।
सूचना--यहाँ 'दूती चौकि चलीं', 'सौतें दीनी भई' और 'वारौं कोरि
रति' पदों से नायिका के सौंदर्य की पराकाष्ठा सूचित होती है । वह वीणा
बजाकर प्रतिपक्षियों को चुनौती देती है, जिससे उसका गर्व प्रकट होता है ।
अतः गर्वाभिसारिका है ।
प्रच्छन्न कामाभिसारिका, यथा--( कवित्त )
(२६८) डरझत उरग चपत चरननि फन,
देखत बिबिध निसिचर दिसि चारि के ।
गनति न लागत मुसलधार सुनत न,
झिल्लीगन-घोष निरघोष जल-धारि के ।
जानति न भूषन गिरत, पट फाटत न,
कंटक अटक उर उरज उजारि के ।
प्रेतनि की पूछै नारि कौन पै तैं सीख्यो यह,
जोग कैसो सारु अभिसारु अभिसारिके ।३१।
शब्दार्थ--उरग = सर्प । फन = फण, सिर । दिसि ० = चारो दिशाओं
के । घोष = शब्द, ध्वनि । निरघोष = घोर ध्वनि । धारि = धारा । भूषन =
३१--चरननि ०-फन चरननि, चरननि फनि । सुनत न-बरषत । गिरत-
गिरन ।