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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 160, कुल 286 में से

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पृष्ठ 160

अष्टम प्रभाव १६३
ता दिन तें जग की जुवतीनि की लागत केसव बात अनैसी ।
चाहि फिरचो चित चक्र चहूँ न कहूँ द्युति देखियै बा मुख कैसी ।६।
शब्दार्थ—बृषभानसुता = राधिका । सजनी = सखी । जननी = माता ।
बैसी = बैठी थी । चितयो = ( जाते हुए श्रीकृष्ण को राधिका ने ) देखा ।
रीति = भाँति । अनैसी = बुरी, भद्दी । चाहि फिरयो = देखकर चित्त लौट
आया । चक्र = दिशा, ओर । चहूँ = चारो ।
श्रीकृष्णजू को प्रकाश पूर्वानुराग, यथा = ( सवैया )
(२८८) भाँति भली बृषभानलली जब तें अँखियाँ अँखियानि सों जोरी ।
भौंह चढ़ाइ कछू डरपाइ बुलाइ लई हँसि कै बस भोरी ।
केसव काहू त्यौ ता दिन तें रुचि कै न बिलोकति केतौ निहोरी ।
लीलत है सब ही के सिंगार अँगारनि ज्यों बिन चंद चकोरी ।७।
शब्दार्थ—भाँति भली = भली भाँति, अच्छे प्रकार । लली = पुत्री,
लाड़िली । डरपाइ = डराकर, धमकाकर । बस कै = वश में करके । भोरी =
इन भोली भाली आँखों को । काहूँ त्यौ = किसी की ओर । रुचि कै = चाव से ।
केतौ = ( न जाने ) कितना अधिक । निहोरी = ( मैंने इन्हें ) मनाया । लीलत
है = खा जाती है । सब ही के = सखा-सखी, मित्रों के द्वारा किए जाने-
वाले सजावट के प्रयत्न । अथवा ही = हृदय । सिंगार = ( श्रृंगार ) सजावट,
प्रफुल्लता, उमंग ।
भावार्थ—(नायक की उक्ति सखी से) जब से वृषभानु की पुत्री (राधिका)
ने मेरी इन आँखों से अपनी आँखें भली भाँति मिलाई हैं और इन भोलीभाली
बेचारियों को भौंहें चढ़ाकर, कुछ डरा धमकाकर, हँसकर और वश में करके
अपने पास बुलाया तभी ( उस दिन ) से ये किसी की ओर रुचिपूर्वक देखती
ही नहीं । मैंने न जाने कितना मनाया ( पर व्यर्थ ) । जैसे बिना चंद्रमा के
चकोरी अंगारे लीलने लगती है वैसे ही ( राधिका के मुखचंद्र के बिना ) ये
भी मेरे हृदय की सारी उमंगें खाए जा रही हैं ( मेरे हृदय में प्रफुल्लता रह
ही नहीं गई है । )
अथ दशदशा-वर्णन— ( दोहा )
(२८६) अबिलोकनि आलाप तें मिलिबे कौं अकुलाहिं ।
होत दसा दस बिनु मिले केसव क्यों कहिं जाहिं ।८।
दशदशा-नामकथन—( दोहा )
(२६०) अभिलाष सु चिंता गुनकथन स्मृति उद्वेग प्रलाप ।
उन्माद व्याधि जड़ता भए होत मरन पुनि आप ।६।
६—संग-ढिग । जुवतीनि-बतियानि । की लागत-लगावत । बात-भाँति ।
चाहि-चाहैं । ७-काहूँ त्यौँ-क्यों हूँ सु । बिलोकति-निहारति ।