रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
पृष्ठ 165, कुल 286 में से
संदर्भ में पढ़ें१६८ रसिकप्रिया
दंड, भेद । साम = प्रियमिलन, दान=आनंददान, भेद = सखी को मिला लेना,
दंड = कुलकानि का नाश ये चार रथ हैं। गुण या श्रृंगार सोलह होते हैं—
उबटन, स्नान, वस्त्रधारण, केश संवारना, कज्जल, सिंदूर, महावर, तिलक,
तिल (गोदनाबिंदु), मेंहदी, अरगजा-लेप, आभूषण, पुष्पधारण, तांबूल और
मिस्सी । (३) प्रच्छन्न और प्रकाश भेद से विरह एवम् विनोद के दो दो रूप
होंगे । अतः हाथी चार हुए। इसी प्रकार चितवन संकोच और सोच के प्रकाश
प्रच्छन्न भेद से चार प्रकार की हुई। अतः घोड़े चार हुए। विरह एवम् विनोद
के मनोरथ के दो रथ भी इसी प्रकार चार हुए। इन सबके गुण सोलह हुए ।
श्रीकृष्णजू की प्रच्छन्न चिंता, यथा (कवित्त)
(२६६) केसौदास सकल सुबास को निवास तन,
कहिं कब भुकुटिबिलास त्रास छोलिहै ।
कैसो है सुदिन बड़भागी अनुरागी जिहिं,
मेरो दृग वाके संग लागि लागि डोलिहै ।
ऐसी हैहै ईस पुनि आपने कटाक्ष मृग-
मद घनसार सम मेरे उर श्रोलिहै ।
दीप के समीप पुनि दीपति बिलोकि वह,
चित्र की सी पूतरी सु क्योंहूँ हँसि बोलिहै ।१८।
शब्दार्थ—सुबास = सुगंध । निवास = वासस्थान । तन = शरीर ।
छोलिहै = छील डालेगी, दूर कर देगी । भृकुटि० = अपनी भौंहों की भंगिमा से
त्रास दूर करेगी । मृगमद = कस्तूरी । घनसार = कपूर । ओलिहै = डालेगी ।
भावार्थ—(नायक की उक्ति अपने मन से) (हे मन) जिसका शरीर
ही समस्त सुगंधों का वासस्थान है कह तो वह कब अपने भृकुटि-विलास से
मेरा त्रास दूर करेगी ? वह भाग्यशाली प्रेम से भरा सुदिन कब होगा जब मेरे
नेत्र उसके अनुगामी हो होकर चलेंगे। हे ईश्वर, क्या ऐसा होगा कि वह
कस्तूरी एवम् कपूर के समान अपने कटाक्ष मेरे हृदय में डालेगी। क्या ऐसा दिन
कभी आएगा जब किसी दीपक के पास रात में खड़ी उस चित्र की पुतली सी
नायिका की दीप्ति दिखाई पड़ेगी और किसी प्रकार वह हँसकर मुझसे बोलेगी ?
श्रीकृष्णजू की प्रकाश चिंता, यथा—( सवैया )
(३००) राधिका को जननी कौं जनी कोऊ क्योंहूँ स्वयंबर बात जनावै ।
देवकुमार से गोपकुमारनि मान दै दै बृषभान बुलावै ।
केसव कैसहु बाल भली वह माल सु मेरे हियें पहिरावै ।
तोहि सखी समदै सँग वाके सु क्यों यह बात सबै बनि आवै । १६।
१८—तन-मनु । जिहि-जब । मेरो-अंग, मेरी बीर । संग-संग संग ।
पुनि-निसि । १६—कौं-सों । जनावै-चलावै ।