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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 167, कुल 286 में से

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पृष्ठ 167

१७० रसिकप्रिया
हाथ कोमल एवम् सुगंधित हैं पर कमल-नाल तो कँटीली होती है ( फिर दोनो
की समता कैसी ? ) । मदनगोपाल के नेत्र विशाल और सुंदर हैं पर कामदेव
के बाणों के तो दर्शन ही दुर्लभ हैं ( इसलिए यह उपमान भी ठीक नहीं )।
अलंकार—व्यतिरेक ।
श्री राधिकाजू को प्रकाश गुणकथन, यथा—( सवैया )
(३०३) खंजन हैं मनोरंजन केसव रंजन नैन किधौं मति जी की।
मीठी सुधा कि सुधाधर की दुति दंतन की किधौं दाड़िम ही की।
चंद भलो मुखचंद किधौं सखि सूरति काम कि कान्ह की नीकी।
कोमल पंकज कै पद-पंकज प्रान पियारे कि मूरति पी की।२२।
शब्दार्थ—मनोरंजन = मन को प्रसन्न करनेवाले । रंजन = रमानेवाले ।
मति = बुद्धि, वृत्ति । जी=अंतःकरण । सुधा = अमृत । सुधाधर की = अधर
की सुधा, अधरामृत । दुति = प्रकाश, शोभा । दाड़िम = अनार । नीकी = भली ।
पंकज = कमल । पी की = प्रिय की ।
भावार्थ—( नायिका की उक्ति सखी से ) हे सखी, खंजन पक्षी विशेष
मन का रंजन करनेवाले हैं अथवा प्रिय के नेत्र अंतःकरण की वृत्ति को विशेष
रमानेवाले हैं। वह अमृत विशेष मधुर है या प्रिय का अधरामृत । अनार के
दाने की शोभा विशेष आकर्षक है या उनके दाँतों की चमक । चंद्र विशेष
अच्छा है अथवा उनका मुखचंद्र । काम की मूर्ति अधिक अच्छी है या श्रीकृष्ण
की सुंदर मूर्ति । कमल विशेष कोमल हैं या उनके पदकमल । प्राण अधिक
प्रिय हैं या प्रिय की मूर्ति अधिक प्रिय है ।
सूचना—सरदार ने ‘पीकी’ का अर्थ ‘पीका’ के आधार पर निकाला है ।
वृक्ष में निकले नए पत्ते को ‘पीका’ कहते हैं ।
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न गुणकथन, यथा—( सवैया )
(३०४) जौ कहौं केसव सोम सरोज सुधासुर भृंगनि देह दहे हैं।
दाड़िम के फल श्रीफल बिद्रुम हाटक कोटिक कष्ट सहे हैं।
कोक कपोत करी अहि केहरि कोकिल कीर कुचील कहे हैं।
अंग अनूपम वा तिय के उनकी उपमा कहूँ वेई रहे हैं।२३।
शब्दार्थ—सोम = चंद्रमा ( मुख)। सरोज = कमल ( नेत्रों ) सुधासुर=
राहु । दाड़िम = अनार ( दांत ) । श्रीफल = बेल ( कुच ) । विद्रुम = मूँगा
(होंठ) । हाटक = सोना ( शरीर का वर्ण, रंग ) । कोक = चकवा ( स्तन ) ।
कपोत = कबूतर ( ग्रीवा ) । करी = हाथी ( गति ) । अहि = सर्प (बाहें) ।
केहरि = ( सं० केसरी ) सिंह ( कमर ) । कोकिल = कोयल ( वाणी ) ।
२२—रंजन नैन ॰ इंगित् नैन । कि०-कै सुधारस । किधौं—सखी लखि ।
२३—केहरि-केसरि ।