रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६० रसिकप्रिया
भावार्थ—( सखी की उक्ति सखी से ) हे सखी, इस नायिका ने भूलकर
भी सीधी चितवन से श्रीकृष्ण की ओर नहीं देखा, यद्यपि वे बेचारे नम्रतापूर्वक
न जाने कितनी लालसाएँ करते रहे । वे बिनती करके भी थक गए, पैरों पड़े
तो पैरों पर पड़े ही रह गए । मैं तो तभी से यही विचार रही हूँ कि इसे
इतना घमंड आखिर क्यों हुआ । यदि कहीं ब्रह्मा इसे लंबी लंबी लटें, पतली
देह और बड़ी बड़ी आँखें न देता ( इन्हीं पर तो यह गुमान कर रही है )
तो इतना गुमान न करती ।
अथ अधमा-लक्षण—( दोहा )
(२७६) रूठै बारहिं बार जो, तूटै बेहीं काज ।
ताही सों अधमा सबै, कहि बरनत कबिराज ।३६।
अधमा, यथा—( सवैया )
(२७७) काटौं कपट्टु जु कान्ह सों कीजै री बाँटौं वे बोल कुबोल कसाई ।
फारौं जु घूँघट ओट अटै सोई डीठि फोरौ अध कों जु धँसाई ।
केसव ऐसी सखीन कों मारौं सिखै कै करैं हित की जु हँसाई ।
बारहि बार को रूसबो बारौं बहाऊँ सु बुद्धि बियोग-बसाई ।४०।
बचन—सखी की उक्ति नायिका से ।
शब्दार्थ—काटौं = काट दूँ । बाँटौं = पीस डालूँ । बाँटों वे बोल० =
उन कसाई कुबोलों की पीस डालू ँ ( बुरी बात कहना तू छोड़ दे ) । फारौं =
फाड़ डालूँ । ओट अटै = बाधा डाले ( चेहरा न देखने दे ) । फोरौं = फोड़
डालूँ । अध को० = जो दृष्टि नीचे ही देखती रहे ( श्रीकृष्ण की दृष्टि से
मिलकर प्रेमालाप न करे ) । हित = प्रेम । हित की० = प्रेम की हँसी कराए
( निर्द्वंद्व प्रेम करने में बाधा उपस्थित करे ) । बारौं = जला दूँ । बहाऊँ =
बहा दूँ, प्रवाहित कर दूँ । बियोग-बसाई = जो वियोग में बसती हो, जो
वियोग करानेवाली हो ।
( दोहा )
(२७८) इहि बिधि नायक-नायिका बरनहुँ सहित बिबेक ।
जाति काल बय भाव तें, केसव जानि अनेक ।४१।
अथ अगम्या नायिका—( दोहा )
(२७६) तजि तरुनी संबंध की, जानि मित्र द्विजराज ।
राखि लेइ दुख भूख तें, ताकी तिय तें भाज ।४२।
३६—बेहीं-बैठहि, बिनही । सों-कों । सबैं-बरन । कहि०-कहँ महा ।
४० - फोरौं-फुरौं । हित की-हित ही । रूसबो-रूसनो । सु-जु । ४१—
-रनहँ - बर्नों । जाति-देस । ४२-- जानि-जती ।