सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 163, कुल 286 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 163

१६६ रसिकप्रिया
शब्दार्थ—माई = माता, सखी (संबोधन)। इनको = श्रीकृष्ण का।
हितू = कल्याण चाहनेवाला, हितूआ । कहे = अर्थात् पूछे । किहि बाइ बहे
हैं = किस वाह (प्रवाह) में बह रहे हैं, किस ढर्रे पर जा रहे हैं । न्यायहीं =
ठीक ही है । कुलनारि = कुलवती स्त्रियाँ । कुलटा० = कुलटाएँ जो कुलवती
स्त्रियों का नाम धरने लगी हैं वह ठीक है, क्योंकि जब इनकी यह करनी है
तो उन बेचारियों का नाम रखा ही जायगा, उनकी बदनामी कुलटाएँ करेंगी
ही । टकी = टकटकी (लगाकर) । इत = इधर की ओर । सोनो सो घालिकै
चाहि रहे हैं = 'सोना फेंककर देखना' ध्यान देकर देखने या घूरने के अर्थ में
आता है । देख कैसी टकटकी बाँधकर घूर रहे हैं । को है० = पूछते हैं कि तू
कौन है मानो जानते ही नहीं । अभी कल इन्हीं से मैंने उसके (नायिका के )
संदेश कहे हैं ।
सूचना—छपी प्रतियों में निम्नलिखित सवैया भी मिलता है जिसे 'सरदार'
ने केशव का नहीं माना है—
केसव नैननि लागिहै ज्यों वह मूरु ह्रै प्रेम अदृष्ट बढ़ावै ।
क्यों वह कामकला मिलै मोहि सु तौ मन मूढ़ उपाउ न पावै ।
कीजै कृपा बुधि दीजै बुधीसजू राधिका के उर में यह आवै ।
लागति ज्यों कबहुँ कबहुँ मुख चंपक ज्यों मुख सों मुख लावै ।
अथ चिंता-लक्षण—(दोहा)
(२५६) कैंसैं कै मिलियै, मिलें हरि कैसे बस होइ ।
यह चिंता चित चेत कै, बरनत हैं सब कोइ ।१५।
शब्दार्थ—मिलियै = मिलूँ । मिलें = मिलने पर । धौं = न जाने । चेत
कै = विचारकर ।
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न चिंता, यथा—(दोहा)
(२५७) आपुनहीं तन, आपुनो होत न देखें जाहि ।
आपुनहीं तें आपनो क्यों मन, करिहै ताहि ।१६।
शब्दार्थ—आपुनहीं = अपना ही । तन = शरीर । आपनो = अपना ।
जाहि = जिसे । आपनहीं तें = स्वयम् अपनी ओर से । करिहै = करेगा ।
भावार्थ—(नायिका की उक्ति मन के प्रति) हे मन, जिस नायक को
देखकर अपना ही शरीर अपने वश में नहीं रह जाता वे स्वयम् तेरे वश में हो
जाएँगे ऐसा कैसे संभव है ।
१५—कैसें० कैसे मिलिए । कैंसैं-कैसें धौं । बरनत०-रहै निरंतर सोइ ।
१६—आपुनहीं०-अपनोऊ तन, आपुनहों तू, अपुनउ तनु तू ।