रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टम प्रभाव १६५
शब्दार्थ—( श्रीकृष्ण का वचन सखी से ) जनी = दासी । राधिका० =
राधिका की माता को कोई इस बात के लिए प्रेरित करे कि वह राधिका का
स्वयंवर रचे । देवकुमार = देवपुत्र, देवता । देवकुमार० = देवताओं के समान
अच्छे अच्छे कुलवाले गोपों को उस स्वयंवर में वरण के लिए स्वयम् वृषभानु
( राधिका के पिता ) आमंत्रित करें ( यह आमंत्रण मुझे भी मिले और मैं भी
जाऊँ ) । बाल = बाला, नायिका, राधिका । समदै = भेंट करे । कैसहु० =
उस स्वयंवर के समारोह में वह मेरे गले में जयमाल डाले । तोहि०=हे सखी,
फिर विदाई के समय भेंट में तुझे भी उसके साथ अर्पित करें । ये सब संयोग
किस प्रकार हों ।
अथ गुणकथन-लक्षण—( दोहा )
(३०१) जहँ गुनगन गुनि देहदुति, बरनत बचन बिसेषि ।
ताकहँ जानहु गुनकथन, मनमथ-मथन सु लेखि ।२०।
शब्दार्थ—गुनि = स्मरण करके । देह० = अंगदीप्ति, सौंदर्य । मनमथ-
मथन ० = कामव्यथा का विशेष उल्लेख करके ।
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न गुणकथन, यथा—( कबित्त )
(३०२) कीरति सहित नित केसव कुँवर कान्ह,
केवल अकीरति नृपति सोम मानियै ।
छुवत चंपकपात कुँभिलात जात तन,
अति हरषित गात हरिजू को जानियै ।
कोमल सुबासजुत प्यारे के परम पानि,
कंटककलित नील नलिन बखानियै ।
लोचन बिसाल चारु मदनगुपालजू के,
मदन-सरनि दरसन-रस हानियै ।२१।
शब्दार्थ-कान्ह = श्रीकृष्ण । सोम = चंद्रमा । अकीरति = क्षीण होना,
कलंकयुक्त होना, दिन में मलिन रहना आदि । परम = विशाल । पानि =
( सं० पाणि ) हाथ ।
भावार्थ-(नायिका की उक्ति आत्मगत) कुँवर कन्हैया तो सर्वदा कीर्ति-
सहित रहते हैं पर सोम राजा ( चंद्रमा ) केवल अकीर्तिसहित ( अतः दोनो
की समता क्या ? ) । श्रीकृष्ण का शरीर (सदा) प्रफुल्ल रहता है पर चंपक
पुष्प के दल तो स्पर्श मात्र से कुम्हला जाते हैं ( इसलिए चंपक उनके शरीर
के वर्ण की बराबरी नहीं कर सकता ) । प्रियतम ( श्रीकृष्ण ) के विशाल
२०-गुनि-मनि । ताकहँ०-तासों कहिये । मथन ०-मनु से लेखि ।
२१-सुबास-सुबाहु । रस-हित ।