रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११ अष्टम प्रभाव १६१
शब्दार्थ—संबंध की = संबंध में पड़नेवाली ( भगिनी आदि ) । मित्र =
मित्र की पत्नी । द्विजराज = ब्राह्मण की पत्नी । राखि० = दुख पड़ने पर
जिसने रक्षा की हो उसकी पत्नी और जिसका या जिसने पालन-पोषण किया
हो उसकी पत्नी । भाज = भागो, बचना चाहिए ( प्रेम नहीं करना चाहिए) ।
(२८०) अधिक बरन अरु अंग घटि, अंत्यज जन की नारि ।
तजि बिधवा अरु पूजिता रमियहु रसिक बिचार ।४३।
शब्दार्थ—अधिक बरन = अपने से उच्च वर्ण की । अंग घटि = अपनी
जाति से नीची जाति की । अंत्यज = चांडाल । जन = दास ।
(२८१) यह संजोग सिंगार की केसव बरनी रीति ।
बिप्रलंभ सिंगार की रीति कहौं करि प्रीति ।४४।
इति श्रीमन्महाराजकुमारइंद्रजीतविरचितायां रसिकप्रियायामष्ट-
नायिकासंभोगशृंगारवर्णनं नाम सप्तमः प्रभावः ॥७॥
अष्टम प्रभाव
अथ विप्रलंभशृंगार-लक्षण—( दोहा )
(२८२) बिछुरत प्रीतम प्रीतमा होत जु रस तिहिं ठौर ।
बिप्रलंभ सिंगार कहि बरनत कबि-सिरमौर ।१।
शब्दार्थ—प्रीतम = प्रियतम, नायक । प्रीतमा = प्रियतमा, नायिका ।
अथ विप्रलंभशृंगार भेद-वर्णन--( दोहा )
(२८३) बिप्रलंभ सिंगार को चारि प्रकार प्रकास ।
प्रथम पूर्ब-अनुराग पुनि, करुना, मान, प्रवास ।२।
तात्पर्य--विप्रलंभ के भेद-पूर्वानुराग, मान, प्रवास और करुण विरह ।
अथ पूर्वानुराग-लक्षण--( दोहा )
(२८४) देखतहीं दुति दंपतीहि, उपजि परत अनुराग ।
बिन देखे दुख देखियै, सो पूरब अनुराग ।३।
शब्दार्थ—दुति = कांति, सौंदर्य । दुख देखना = दुख पाना ।
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न पूर्वानुराग, यथा--( कबित्त )
(२८५) फूल न दिखाव सूल फूलत है हरि बिनु,
दूरि करि माल बाल ब्याल सी लगति है ।
४३-अंत्यज-अक्षत ।
१--प्रीतमा-प्रीतमहि । सिंगार०-तासों कहैं । बरनत०-केसव कबि,
कहत रसिक । २-वर्णन-कथनम् । ३--देखियै-देखई ।