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रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पंचविंशप्रकाशः २५. (२५१)

मू०-चारिमैंएकहुजोअपनावै । तौतुमपैप्रभुआवनपावै ॥
राम ॥ ज्योतिनिरीहनिरंजनमानी। तामहैंक्योंऋषिइच्छबखा-
नी ॥ १५ ॥ वशिष्ठ-दोहा ॥ सकलशक्तिअनुमानिये, अद्भुत
ज्योतिप्रकाश ॥ जातेजगकोहोतहै, उत्पतिस्थितिअरुनाश॥
॥ १६ ॥ श्रीराम-दोधकछंद ॥ जीवबँधेसबआपनिमाया ॥
कीन्हेंकुकर्ममनोवचकाया ॥ जीवनचित्तप्रबोधनआनो ।
जीवनमुक्तकेभेदबखानो ॥ १७ ॥
टी०-जैसे चोपदारको अपनाइकै राजाके पास सब जात हैं तैसे इन चारिमैं
एकहूको अपनावै तौ तुमपै जान पावै फेरि राम ऋषिसों पूंछचों कि ज्योतिको
तौ निरीह कहे इच्छा रहित और निरंजन कहे रागरहित मान्यौ औ कह्यो कि
“ताकी इच्छाते भये, नारायण मतिनिष्ठ” तौ ज्योतिमें इच्छा क्यों कही सो
कहौ ॥ १५ ॥ वशिष्ठ कह्यो कि अद्भुत जो ज्योतिको प्रकाश है तामें इच्छादि
कहैं तौ नहीं परंतु इच्छादिकनकी सबकी शक्ति अनुमानियतहै जा शक्तिसों
संसारकी उत्पत्ति स्थिति नाश होत है ॥ १६ ॥ जीव जे हैं ते अपनीमायामें
बँधे मनसा वाचा कर्मणा कुकर्म (कुत्सितकर्म) कीन्हे हैं तिन जीवनको जो
प्रबोधन कहे ज्ञान तुम कह्यो सो हम चित्तमें आन्यो अर्थ भ्यास जान्यो इति अब
जीवनमुक्तके भेद कहौ ॥ १७ ॥
मू०-वशिष्ठ ॥ बाहेरहूंअतिशुद्धहियेहू । जाहिनलागतकर्म
कियेहू ॥ बाहेरमूढसोअंतसयानो। ताकहँजीवनमुक्तबखानो॥
॥ १८ ॥ दोहा ॥ आपुनसोअवलोकिये, सबहीयुक्तायुक्त ॥
अहंभावमिटिजाहिजो,कौंनबद्धकोमुक्त ॥ १९ ॥ श्रीराम-दो-
धक ॥ सोसिगरेगुणहोतसोजानो । स्थावरजीवनमुक्तबखा-
नो ॥ वशिष्ठ ॥ जानिसबैगुणदोषनछँडै । जीवनमुक्तनकेपद-
मंडै ॥२०॥ राम-दोहा ॥ साधुकहावतकरतहैं, जगमेंसबव्यौ-
हार ॥ तिनकोमीचुनछैंसकै, कहिप्रभुकौनविचार ॥ २१ ॥
टी०-यामें जीवन्मुक्तको लक्षण कहते हैं बाहर कहे तनमें औ हियहूमैं
कहे मनहूमैं शुद्ध होय औ पाप पुण्य कर्म करै सो लागै नहीं औ बाहर मूढ़

(२५२) रामचन्द्रिका-सटीक ।
अज्ञान रहे अर्थ बावरं सन रहे औ अंतमें सयानो रहे ताहीको जीवन्मुक्त
कहियत है॥ १८॥ युक्त कहे योग्य मनुष्यादि अयुक्त कहे अयोग्य सूकरादि
तिनको आपुनसो कहे आपने सम अवलोकिये (देखिये) अर्थ अपने सम
सबको जानिये औ अहंभाव मिटि जाय तौ कौन बद्ध है कौन मुक्त है अर्थ
सबही मुक्त हैं ॥१९॥ योग्यके गुण अयोग्यके दोष जानिकै त्याग करै ॥२०॥
रामचन्द्र कहत हैं कि ज्ञानसों जीवनकी मुक्ति कह्यो सो जान्यो अब यह कहौ
कि जे प्राणी साधु कहावत हैं औ जगमें स्त्री पुत्रादिके सब व्यौहार करत हैं
तिनको मीचु नहीं छुई सकति अर्थ तिनकी मृत्यु नहीं होति है ताको विचार
हे प्रभु ! हे वशिष्ठ ! कहौ ॥ २१ ॥
मू०-वशिष्ठ-पद्धटिकाछन्द ॥ जगजिनकोमनतवचरणली-
न । तनतिनकोमृत्युनकरतिक्षीन ॥ तेहिक्षणहींक्षणदुखक्षीण
होत । जियकरतअमितआनँदउदोत ॥ २२ ॥ जोचाहैजीवन
अतिअनंत । सोसाधैप्रणायामयंत्र ॥ शुभरेचकपूरकनामजा-
नि । अरुकुम्भकादिसुखदानिमानि ॥ २३ ॥ जोक्रमक्रमसाधै
साधुधीर । सोतुमहिंमिलै याहीशरीर ॥ राम ॥ जगतुमते नाहिं
सर्वज्ञआन । अबकहौदेवपूजाविधान ॥ २४ ॥
टी०-हे राम ! जिन प्राणिनको मन तुम्होर चरणमें लीन है ते साधु जगमें
सब व्यवहारहू करत हैं ताहूपर तिनके तनको मृत्यु क्षीण नहीं करि सकति औ
तिहि प्राणीके क्षणमें संसाररूपी दुःख क्षीण होत हैं औ मुक्तिरूपी जो अमित
आनन्द है सो उदोत ( प्रकाश ) करत है ॥ २२ ॥ अंगुष्ठ ते तृतीय अंगुलीको
नाम अनामिका है तासों नासाको बाम रंध्र अंगुष्ठसों रोंकि बाम रंध्रसों वायुको
छोडिये सो पूरक प्राणायाम है; औ दक्षिण रंध्र अंगुष्ठसों औ बामरंध्र
अंगुष्ठसों औ बामरंध्र अनामिकासों साथही रोंकि वायुको हृदयमें स्थापन करिये
सो कुम्भक है औ यथा वायुपुराणे।“प्राणायामस्त्रिधा प्रोक्तो रेचकः पूरकस्तथा ॥
कुम्भको रेचकस्तत्र नासारंध्राच्च दक्षिणात् ॥ निरुध्य वामरंध्रञ्चानामिकया
विसर्जनम् ॥ निरुध्य दक्षिणं रंध्रं वामरंध्राच्च पूरणम् ॥ तथैवानामिकांगुल्या
पूर्ण तु तदुच्यते ॥ रेचकात्पूरणात्पश्चाद्द्वैपुटन्नाशयस्तथा । सन्निरुध्य हृदि-
स्थाप्य वायुं तिष्ठत्स कुम्भकः" ॥ २३ ॥ २४ ॥

मू०-वशिष्ट-तारकछंद ॥ हमएकसयमनिकसेतपसाको ।
तवजाइभजेहिमवंतरसाको ॥ बहुभांतिकरचोतपक्योंकहि
आवै । शितकण्ठप्रसन्नभयेजगगावै ॥ २५ ॥ दंडक ॥ ऊजरे
उदारउरबासुकीबिराजमान हारकेसमानआनउपमानटोहिये।
शोभिजैजटानबीचगंगाजूकेजलबुंदकुंदकीसीकलीकेशोदासम-
नमोहिये।नखकीसीरेखाचंद्रचन्दनसीचारुरजअंजन शृंगारहू-
गरलरुचिरोहिये। सबसुखसिद्धि शिवासौंहैशिवजूकेसाथजाव-
कसोपावकलिलारलाग्योसोहिये ॥ २६ ॥
टी०-रसा (पृथ्वी) जग गावै अर्थ जिनको जगत्‌के प्राणी गान करत
हैं ॥ २५ ॥ उजरे औ उदार कहे बडे उरमें हार मालाके समान वासुकी नाम
सर्प विराजमानहै और उपमाको नहीं टोहिये कहे ढूंढियत अर्थ और उपमाके
सदृश नहीं हैं तासों खोज नहीं करियत रज कहे विभूति अंजन जां शृंगार है
ताकी रुचि गरल जो विष है ता करिके रोहिये कहे धारण करियत है अर्थ लगि-
गयो पार्वतीके नेत्रांजन सम गरल शोभित है सब सुखकी सिद्धि शिवा जो
पार्वतीजी हैं ते संगमें शोभती हैं औ जावक कहे महाउर सम लिलारमें लाग्यो
पावक (अग्नि) शोभित है ऐसे सदा सुरत चिह्नयुक्त प्रसन्न है हमारे समीप
आये इतिशेषः ॥ २६ ॥
मू०-महादेव-तारकछन्द ॥ बरमाँगिकछूऋषिराजसयाने ।
बहुभांतिचलेतपपंथपयाने ॥ वशिष्ट ॥ पुजवोपरमेश्वरमोमन
इच्छा । सिखवोप्रभुदेवप्रपूजनशिक्षा ॥ २७ ॥ शिव-दोहा ॥
रामरमापतिदेवनहिं, रंगनरूपनभेव ॥ देवकहतऋषिकौनको,
सिखऊंजाकीसेव ॥ २८ ॥ वशिष्ट-तोमरछंद ॥ हमकहाजान-
हिंअज्ञ । तुमसर्वदासर्वज्ञ ॥ अबदेवदेहुंबताइ । पूजाकहोस-
मुझाइ ॥ २९ ॥ शिव ॥ सतचित्तप्रकाशप्रभेव । तेहिबेद-
मान तदेव ॥ तेहिपूजिऋषिरुचिमंडि । सबप्राकृतनकोछांडि

यहाँ दिए गए पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति देवनागरी लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

(२५४) रामचन्द्रिका-सटीक ।
॥ ३० ॥ पूजायहैउरआनु । निर्व्याजधरियेध्यातु ॥ योंपू-
जिघटिकाएक । मनुकियोयाजअनेक ॥ ३१ ॥
टी०-चले तपपंथमें अर्थ उचित तपपंथमें तुम बहुभांति पथाने कहे गमन
करचौ है अर्थ बडो तप करचो है ॥ २७ ॥ २८ ॥ २९ ॥ सत कहे सत्यरूप
चित् कहे चैतन्यरूप जो प्रकाश कहे ज्योति जो रामचन्द्रको प्रमेव कहे भेद है
अर्थ रूपांतर है ताको देव वेद मानत हैं प्राकृत कहे लघु गणेशादि ॥ ३० ॥
निर्व्याज कहे निष्कपट ध्यानको धरिये यहै ता देवकी पूजा है अर्थ ताकी पूजा
ध्यानही है और नहीं है ॥ ३१ ॥
मू०-जियजानयहईयोग । सबधर्मकर्मप्रयोग ॥ सबरूप
पूजिप्रकाश । तबभयेहमसेदास ॥ यहबचनकरिपरमान ।
प्रभुभयेअंतर्द्धान ॥ ३२ ॥ दोहा ॥ यहपूजाअद्भुतअगिनि,
सुनिप्रभुत्रिभुवननाथ ॥ सबैश्रुभाशुभबासना, मैंजारीनि-
जहाथ॥ ३३ ॥ झलनाछंद ॥ यहिभांतिपूजापूजिजीवजो-
भक्तपरमकहाइ । भवभक्तिरसभागीरथीमहँदेहिडुबनिबहाइ ॥
पुनिमहाकर्त्तामहात्यागीमहाभोगीहोइ । अतिशुद्धभावरमै-
रमापतिपूजिहैसबकोइ ॥ ३४ ॥ दोहा ॥ रागद्वेषबिनकौसहूं,
धर्माधर्मजोहोइ॥हर्षशोकउपजैनमन,कर्त्तामहासोलोइ॥३५॥
टी०-धर्मके जे दानादि कर्म हैं तिनको प्रयोग कहे यत्न सब प्राणी प्रकाश
जो रूप है ज्योतिरूप ताको पूजिकै हमारे सम दास भये हैं परिमाण कहे निश्चय
॥ ३२ ॥ ३३ ॥ जो जीव या प्रकारसों पूजा पूजिकै परमभक्त कहायकै भव जो
संसार है ताके दुःखिनको भक्तिरसकी जो भागीरथी गंगा हैं तामें बहाइ देइ
अर्थ दूरि करै फेरि महाकर्त्ता औ महात्यागी औ महाभोगी होइ औ शुद्धभावसों
रमापति (ईश्वर) में रमैं कहे प्राप्त होइ औ ताको सब कोउ पूजन करिहैं
॥ ३४ ॥ महाकर्त्तादिकनकें तीनहूके लक्षण क्रमसों कहत हैं जाके राग कहे
प्रीति बिना जीव रक्षणादि कछू धर्म अकस्मात् ह्वै जाइ ताको हर्ष कहे सुख न
होइ औ द्वेष कहे विरोध बिना जीवहिंसादि अधर्म होइ ताको शोक दुःख ना
होइ सो प्राणी महाकर्त्ता हैं ॥ ३५ ॥

पंचविंशप्रकाशः २५. ( २५५ )
मू०-दोहा ॥ भोजअभोजनरतविरत, नीरससरससमान ॥
भोगहोइअभिलाषबिन, महाभोगतामान ॥ ३६ ॥ जोकछु
आंखिनदेखिये, बाणीबर्य्यौजाहि ॥ महात्यागीजानिये,
झूठोजानौताहि ॥ ३७ ॥ तोमरछंद ॥ जियज्ञानबहुव्यौहार ।
अरुयोगभोगबिचार ॥ यहिभांतिहोइजोराम । मिलिहैंसोते-
रेधाम ॥ ३८ ॥ सवैया ॥ निशिबासरवस्तुबिचारकरैमुखसां-
चहियेकरुणाघनुहै । अघनिग्रहसंग्रहधर्मकथानपरिग्रहसाधु-
नकोगनुहै । कहिकेशवयोगजगेहियभीतरबाहेरभोगनसोंतनु-
है । मनुहाथसदाजिनकेतिनकोबनहीघरहैघरहीबनुहै ॥ ३९॥
टी०-भोज कहे भक्ष्य औ अभोज ( अभक्ष्य ) पदार्थमें रत ( अनुरक्त ) औ
विरत ( विरक्त ) न होइ अर्थ भोज्य अभोज्यको समान भक्षण करै औ निरस
कहे स्वादरहित सरस ( स्वादयुक्त ) वस्तु जाको समान होईं औ भोग जाको
अभिलाष बिना होइ सो महाभोक्ता है ॥ ३६ ॥ ३७ ॥ जाके जियमें ज्ञानको
बहुत प्रकारको व्यौहार है औ योग औ भोगको बहु विचार है ऐसो जब होइ
तब तुम्हारो जो धाम ( तेज ) है ज्योतिरूप ताको मिलिहै अथवा धाम कहे
घर वैकुंठ ताको मिलि है ( प्राप्त ) ह्वै है ॥ ३८ ॥ वस्तुविचार कहे ब्रह्मविचार
अथवा सत् असद्वस्तुको विचार निग्रह ( ताडन ), परिग्रह कहे परिजन ( निक-
टवासी ) इति ॥ “परिग्रहः परिजने इति मेदिनी” ॥ ३९ ॥
मू०-॥ दोहा ॥ लेइजोकहियेसाधुअन, लीन्हेकहियेबाम ॥
सबकोसाधनएकजग, रामतिहारोनाम ॥ ४० ॥ राम ॥ मोहिं
नहुतोजनाइबे, सबहीजान्यौआजु ॥ अवजोकहौसोकरिबनै,
कहेतुम्हारेकाज ॥ ४१ ॥
इति श्रीमत्सकललोकलोचनचकोरचिंतामणिश्रीरामचन्द्रचन्द्रिकायामिंद्र-
जिद्विरचितायांजीवोद्धारवर्णनं नाम पंचविंशः प्रकाशः ॥ २५ ॥

( २५६ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

टी०-वाम कहे कुटिल साधन कहे उपाय अर्थ मुक्तिको उपाय केवल तुम्हारे
नामको जप है ॥ ४० ॥ जो आपनो ईश्वरत्व मोहि काहूको जनाइबोई नहीं रह्यौ
सो सबही जान्यौ तासों जो कहौ सो अब करिये अर्थ राज्य लेबेकी कहत
हौ सो लेहैं ॥ ४१ ॥
इति श्रीमज्जगज्जननीजनकजानकीजानकीजानिप्रसादायजनजानकीप्रसादनिर्मितायां
रामभक्तिप्रकाशिकायां पंचविंशः प्रकाशः ॥ २५ ॥
मू०-दोहा ॥ कथाछबीसप्रकाशमें, कह्योवशिष्ठविवेक ॥
रामनामकोतावअरु, रघुबरकोअभिषेक ॥ १ ॥ तोटनकछंद ॥
बोलेऋषिराजभरथतबै । कीजैअभिषेकप्रयोगसबै ॥ शत्रुघ्न-
कह्योचुपह्वैनरहै । श्रीरामकेनामकोतत्त्वगहौ ॥ २ ॥
टी०-जब रामचन्द्र राज्य अंगीकार करचौ तब ऋषिराज-(वशिष्ठ) सों
भरत बोले प्रयोग (यत्न) शत्रुघ्न भरतसों कह्यो कि चुप क्यों नहीं है रहते
अर्थ राज्याभिषेक तौ रामचन्द्र अंगीकार करचौ है तौ हैहैई ॥ १ ॥ जो ऋषि-
राज कह्यौ है कि सबको साधन एक जग, राम तिहारो नाम ॥ तारामनामकी
तत्त्व ऋषिसों गहौ अर्थ सुनिकै धारण करौ ॥ २ ॥
मू०-राम-तोटनकछन्द ॥ श्रद्धाबहुधाउरआनिभई।ब्रह्मासु-
तसोंबिनतीबिनई ॥ श्रीरामकोनामकहौरुचिकै । मतिमानमहा-
मनकोशुचिकै ॥ ३ ॥ वशिष्ठ--स्वागताछंद ॥ चित्तमांझजस
आनिअरुझी । बाततातकहँमैंयहबूझी ॥ योगयागकरिजै
: आवै । स्नानदानविधिमर्मनपावै ॥ हैअशक्तसबभांतिबिचारे
कौनभांतिप्रभुताहिउधारो ॥ ४ ॥
टी०-शत्रुघ्नके उरमें बडी श्रद्धा भई ॥ ३ ॥ अरुझी अर्थ संदेह भई ता
( ब्रह्मा ) मर्म ( सिद्धान्त ) ॥ ४ ॥
मू०-ब्रह्मा-भुजंगप्रयातछन्द ॥ जहाँसच्चिदानन्दरूपैधरैंगे ।
सुत्रैलोक्यकोतापतीन्योंहरैंगे । कहैगोसबैनामश्रीरामताको ।
सदासिद्धहैशुद्धउच्चारजाको ॥ ५ ॥ कहैनामआधोसोआधोन

पड़्विंशप्रकाशः २६. ( २५७ )
शावै। कहैनामपूरोसोबैकूंठपावै॥ सुधारैंदुहूंलोककोवर्णदोऊ।
हियेछद्मछांड़ैकहैवर्णकोऊ ॥ ६ ॥ सुनावैसुनैसाधुसंगीकहावै।
कहावैकहैपापपुंजैनशावै ॥ स्मरावैस्मरैवासनाजारिडारै। तजै
छद्मकोदेवलोकैसिधारै ॥७॥ तामरसछंद ॥ जबसबवेदपुराण
नशैंहैं। जपतपतीरथहूमिटिजैंहैं ॥ द्विजसुरभीनहिंकोउविचारै।
तबजगकेवलनामउधारै ॥ ८ ॥ दोहा ॥ मरणकालकाशीविषे-
महादेवनिजधाम ॥ जीवनकोउपदेशिहैं,रामचन्द्रकोनाम॥९॥
मरणकालकोऊकहै, पापीहोइपुनीत ॥ सुखहीहरिपुरजाइहै,
सबजगगावैगीत ॥ १० ॥
टी०-और मंत्र पुरश्चरणादिसों सिद्ध किये जात हैं औ याके शुद्ध उच्चार
सदाही सिद्ध हैं॥ ५ ॥ आधो नाम रा अथवा म अधोगति (नरक) इति,
पूरे नामके जपसों बैकुंठ प्राप्तिहोतिहै मृत्युलोकमें कहा होत है ता लिये फेरि
कहत हैं कि राम ये जे दुवौ अंक (वर्ण) हैं ते मृत्युलोक, स्वर्गलोक दुवौ सुधा-
रत हैं मृत्युलोकमें यश गौरवादिको लाभ होत है, बैकुंठमें देवसुख प्राप्त होत है
इत्यर्थः ॥ ६ ॥ ७ ॥ ८ ॥ ९ ॥ १० ॥
मू०-रामनामेकतत्त्वको, जानतवेदप्रभाव, ॥ गंगाधरकैध-
रणिधर, बालमीकिमुनिराव ॥ ११ ॥ दोधकछंद ॥ सातहु
सिंधुन्केजलह्वरे। तीरर्थजालनिकेपयपूरे॥ कंचनकेघटबानर
लीने। आइगयेहरिआनँदभीने ॥ १२ ॥ दोहा ॥ सकलरत्न
मयमृत्तिका, शुभऔषधीअशेष ॥ सातद्वीपकेपुष्पफल, पल्ल-
वससविशेष ॥ १३ ॥ दोधकछंद॥आंगनहीरनकोमनमोह्रै॥
कुंकुमचन्दनचर्चितसोहै ॥ हैसरसीसमशोभप्रकाशी ।
लोचनमीनमनोजविलाशी ॥ १४ ॥ दोहा ॥ गजमोतिनयुत
शोभिजैं, मरकतमणिकेथार ॥ उदकबुन्दसोंजनुलसत, पुर-
इनिपत्रअपार ॥ १५ ॥ बिशेषकछंद ॥ भांतिनभांतिनभाज-
१७

नराजनकौनगने । ठौरहिठौररहेजनुफूलिसरोजघने ॥ भूपन-
केप्रतिबिम्बबिलोकतरूपरसे। खेलतहैजलमांझमनोजलदेव-
बसे ॥ १६ ॥ पद्धटिकाछंद ॥ मृगमदमिलिकुंकुमसुरभिनीर।
घनसारसहितअम्बरउसीर । घसिकेशारिसोंबहुबिबिधिनौर ।
क्षितिछिरकेचरथावरशरीर ॥ १७ ॥ बहुवर्णफूलफलदलउ-
दार । तहँभरिराखेभाजनअपार ॥ तहँपुष्पवृक्षशोभैंअनेक ।
मणिवृक्षस्वर्णकेवृक्षएक ॥ १८ ॥ त्यांहिंउपररच्योएकैबितान।
दिविदेखतदेवनकेबिमान । दुहुँलोकहोतपूजाबिधान।अरुनृ-
त्यगीतवादित्रगान ॥ १९ ॥
टी०-धरणिधर ( शेष ) ॥ ११ ॥ हरि जे रामचन्द्र हैं तिनके अभिषेको-
त्सवके आनंदमें भीने इत्यर्थः ॥ १२ ॥ रस ( घृतादि ) ॥ १३ ॥ भांतिन
भांति तीनि छंदमें एक वाक्यता है सरसी तडाग ता आंगनमें प्रतिबिंबत जे
सबके लोचन हैं तेई मनोजके ( कामके ) मीन ( मत्स्य ) हैं अथवा मनोजबि-
लासी कहे कामके खेलिबेके मीन हैं ॥ १४ ॥ ताही तडागमें पात्र पुरइनि पत्र
समहैं ॥ १५ ॥ ताही तडागमें भाजन कहे पात्र सरोज सम फूलि रहे हैं प्रति-
बिंब जलदेव सम हैं॥ १६ ॥सुरभि ( सुगंधित अथवा सुंदर ) “सुरभिर्हेम्नि चंप-
के जातीफले मातृभेदे रम्ये चैत्र वसंतयोः॥ सुगंधौ गवि शलक्यामिति हेमचंद्रः॥”
अम्बर सुगन्ध वस्तुविशेष ॥“अंबरंनद्वयोर्व्योम्निसुगन्ध्यंतरवस्त्रयोरिति मेदिनी॥”
सरिसों ( बराबरिसों ) अर्थ मृगमदादि सब सम घसिकै ॥ १७ ॥ दलपत्र
( भाजन पात्र ) ॥ १८ ॥ एकै अपूर्व वादित्र ( बाजने ) ॥ १९ ॥
मू०-तरुऊमरिकोआसनअनूप । बहुरचितहेममयविश्वरू-
प ॥ तहँबैठेआपुनआइराम । सियसहितमनोरतिरुचिरकाम
॥ २०॥ जनुघनदामिनिआनन्ददेत । तरुकल्पकल्पबल्लीस-
मेत । ह्वैकैधौं विद्यासहितज्ञान । कैतपसंयुक्तमनसिद्धिजान ॥
॥२१॥ कैबिक्रमयुतकीरंतिप्रवीन । कैश्रीनारायणशोभलीन॥
कैअतिशोभितस्वाहासनाथ। कैसुन्दरता शृंगारसाथ ॥ २२ ॥

षड्बिंशप्रकाशः २६. (२५९)
सुन्दरीछंद ॥ केशवशोभनछत्रबिराजत । जाकहँदेखिसु-
धाधरलाजत ॥ शोभितमोतिनकेमतिकेगन । लोकन
केजनुलागिरेहेमन ॥ २३ ॥ दोहा ॥ शीतलताशुभतासबै,
सुन्दरताकेसाथ ॥ अपनीरविक्रीअंशुल, सेवतजनुनिशि-
नाथ ॥ २४ ॥
टी०--ऊमारि (मूर्लारि) हैममय कहे सुवर्णमयी विश्व कहे संसारके रूप अर्थ
संसारके वस्तु स्वरूपन करिके रचित है (चित्रित) है ॥ २० ॥ कै तपसंयुक्त सिद्धि
कहे तपसिद्धि यह मनमें जानु इत्यर्थः ॥ २१ ॥ श्री (लक्ष्मी) सनाथ कहे अग्रि
सहित शृंगाररस अथवा भूषणको शृंगार कियेसों सुन्दरता बढति है तासों जानों
॥ २२ ॥ २३ ॥ ताही छत्रमें तर्क है शीतलता औ शुभता कहे मांगल्य औ
सुन्दरता जो सब कहे पूर्ण है तिनके संग अपनी औ रविकी अंशु (किरणि)
लेके मानों निशिनाथ (चन्द्रमा) रामचन्द्रको सेवत है चन्द्रकिरणि सम मुक्तन-
की किरणि हैं रविकिरणि सम औ जटित जे माणिकादि मणिहैं तिनकी किरणि
हैं औ शीतलतादि हैंही ॥ २४ ॥
मू०--सुन्दरीछन्द ॥ ताहिलियेरविपुत्रसदारत । चमरबिभी-
षणअंगदढारत ॥ कीरतिलैजगकीजनुवारत । चन्द्रकचंदन-
चंदसवांरत ॥ २५ ॥ लक्ष्मणदर्पणकोदेखरावत । पाननिल-
क्ष्मणबंधुखवावत १॥ भरथ॒लैलैनरदेवसदारत । देवअदेवनिपा-
यनपारत ॥ २६ ॥ दोहा ॥ जामवंतहनुमंतनल, नीलभरा-
तिबसाथ ॥ छरीछबीलीशोभिजै, दिक्पालनकेहाथ ॥ २७ ॥
रूपबिक्रमसुरभिसम, बचनरचनबहुभेव ॥सभामध्यपहिचा-
नये, नरनरदेवनदेवः॥ २८ ॥ आईजबअभिषेककी, घटिका
केशवदास ॥ बाजेएकहिबारबहु, दुंदुभिदीहअकाश ॥ २९॥
टी०-रत कहे अनुरक्त है कीर्तिसम चमरहै फिरि चमर कैसे हैं कि चंद्रक जो
कपूरहै औ चंदन औ चंद्रमा है सदा आर्त कहे पीडित जिनसों अर्थ जिनकी

( २६० ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
श्वेततासों अपनी श्वेतताही न समुझि चंद्रकादि दुःखी होतहैं ॥ २५ ॥ २६ ॥
माहीं (मरातिव) प्रसिद्ध है छरी (आशा) ॥ २७ ॥ सुरभि (सुगंधि)
॥ २८ ॥ २९ ॥
मू०-झूलनाछंद ॥ तबलोकनाथविलोकि कैरघुनाथकोनि-
जहाथ । सबिशेषसोंअभिषेककीपुनिउचरीशुभगाथ ॥ ऋषि
राजइष्टवशिष्ठसोंमिलिगाधिनन्दनआइ। पुनिबालमीकिबिया-
सआदिजितेहुतेमुनिराइ ॥ ३० ॥ रघुनाथशंभुस्वयंभुकोनिज
भक्तिदीसुखपाइ । सुरलोककोसुरराजकोकियदीहनिर्भयराइ ।
बिधिसोंऋषीशनसोंबिनयकरिपूजिऔपरिपाई । बहुधाइईत-
पव्रक्षकीसबासिद्धि सिद्धसुभाइ ॥ ३१ ॥
टी०-लोकनाथ जे ब्रह्मा हैं तिन अभिषेककी घटिका आई बिलोकिकै निज
हाथसों रघुनाथको अभिषेक की कहे कर

सप्तविंशप्रकाशः २७. ( २६१ )
शुद्ध ॥ ३५॥ बिधिसोंपाँयपखारिकै,रामजगतकेनाह॥दीन्हे-
उगाउंसनौढियन, मथुरामण्डलमाह ॥ ३६ ॥
इतिश्रीमत्सकलोकलोचनचकोरचिन्तामणिश्रीरामचन्द्र
चंद्रिकायामिंद्रजिद्विरचितायांरामस्यराज्याभिषेकव-
र्णननामषड्विंशःप्रकाशः ॥ २६ ॥
टी०-॥ ३२ ॥ आफियो कहे दियो तिन सीताजू ॥ ३३ ॥३४॥३५॥३६॥
इति श्रीमज्जगज्जननीजनक जानकी जानकी जानिप्रसादायजन जानकीप्रसादनिर्मिताया
रामभक्तिप्रकाशिकाया षड्विंशः प्रकाशः ॥ २६ ॥
मू०-दोहा ॥ सत्ताइसैंप्रकाशमें, रामचन्द्रसुखसार ॥ ब्रह्मा
दिकअस्तुतिबिबिधि, निजमतिकेअनुसार॥ १॥ ब्रह्मा-झूलना
छन्द॥ तुमहौअनन्तअनादिसर्वगसर्वदासर्वज्ञ। अबएकहौ कि
अनेकहौमहिमानजानतअज्ञ ॥ भ्रमिबोकरैंजगलोकचौदहलो-
भमोहसमुद्र । रचनारचीतूमताहिजानतहौंनब्रह्मानरुद्र ॥ २ ॥
टी०-॥ १ ॥ सर्वग कहे सर्वत्र व्याप्त लोभ मोहके समुद्र अर्थ लोभ मोहसों
भरे जे चौदहलोक कहे चौदहों लोकके प्राणी जा रचनामें भ्रमिबो करत हैं अर्थ
संदेहको प्राप्त भयो करत हैं ता रचनाको नहीं जानत हौं न ब्रह्म ( वेद ) जानत
हैं न रुद्र जानत हैं अथवा चौदहलोकमें लोभ औ मोहके समुद्रमें हम भ्रम्यो
करत हैं तासों तुम्हारी रचनाको नहीं जानत ॥ २ ॥
मू०-शिव-दण्डक ॥ अमलचरिततुमबैरिनमलिनकरौसा-
धुकहैंसाधुपरदारप्रियअतिहौ । एकस्थलस्थितपैबसतजगजन-
नाप्रियकेशोदासद्विपदपैबहुपदगतिहौ ॥ भूषणसकलयुतशीश
धरेभूमिभारभूतलफिरतपैअभूतभुवपतिहौ । राखौगाइब्राह्मणन
राज सिंहसाथचिरुरामचन्द्रराजकरौअद्भुतगतिहौ ॥ ३ ॥
इन्द्र ॥ बैरीगाइब्राह्मणकोअन्यनमेंसुनियतुकविकुलहीकेसु-
वरणहरकाजहै । गुरुशय्यागामीएकबालकैबिलोकियतूमान्

( २६२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
गनहीकेमतवारे कैसोसाजहै ॥ अरिनगरीनप्रतिहोतहै अगम्या
गौनदुर्गननहिंकेशोदासदुर्गतिसी आजहै । देवताईदेखियतसुगढ़
निगठोईजीवो चिरु चिरु रामचन्द्रजाकोऐसोराजहै ॥ ४ ॥
टी०-याहूमें विरोधाभास है अनल ( निर्मल ) चरितनसों बैरिनको मलिन
करत हौ इत्यर्थः पर कहे उत्कृष्ट दार अर्थ लक्ष्मीजू । “राघवत्वे भवेत्सीता
रुक्मिणी कृष्णजन्मनीति पुराणात्।।” जा भूमिकौ शीशमें धरै हैं ताही पर फिरिबो
विरोध है गाय सदृश जे ब्राह्मण हैं तिनहूंको राखत हौ रक्षा करत अथवा गाय
औ ब्राह्मणनको राखत हौ औ राजसिंह कहे राजरूपी जे सिंह हैं तिनसों साथ
कहे मित्रता है तौ सिंहसों मित्रता औ गायकी रक्षा यह विरोध है ॥ ३ ॥ यामें
परिसंख्यालंकार है ग्रंथनमें लिख्यो है कि गाइ ब्राह्मणके बैरसों ऐसो पाप होत
है सुंदर वर्ण ( अक्षर ) कवितामें धरिबेको देवताई कहे देवताकी प्रतिमाही ठांकी
आदिकी गढ़नि सों गढ़ी देखियत है और कोऊ प्राणी नहीं गढ़चो जात अर्थ
ताडनाको नहीं प्राप्त होत ॥ ४ ॥
मू०-पितर । बैठेएकछत्रतरछाँहसबछितिप रसूरकुलकलश
सुराहुहितमतिहौ । त्यक्तबामलोचनकहतसबकेशोदासबिद्य
मानलोचनद्वैदेखियतुअतिहौ ॥ अकरकहावतधनुषधरेदेखि-
यतुपरमकृपालुपैकृपाणकरपतिहौ । चिरुचिरुराजकरोराजा-
रामचंद्रसबलोककहैंनरदेवदेवदेवगतिहौ ॥५॥ अग्नि । चित्र-
हीमें आजवर्णसंकरविलोकीयतुव्याहहीमेंनारिनकेगारिनसों-
काजहै । ध्वजैकंपयोगीनिशिचक्रैहैबियोगीद्विजराजमित्रद्वेषी
एकजलदसमाजहै । मेघैतोगगनपरगाजतनगरघेरिअपयश
डरयशहीको लोभआजहै । दुःखहीकोखंडनहैमंडनसकल-
जगचिरुचिरुराजकरैजाकोऐसोराजहै ॥ ६ ॥
टी०-यामें विरोधाभास है बिरोधपक्ष राहु ( ग्रह ) अविरोध सुराहु कहे
मार्ग त्यक्त कहे त्यागे वामलोचन औ वाम कहे कुटिल लोचन अर्थ काहूसों
वंशोचन करि नहीं ताकत विद्यमान प्रत्यक्ष अकर कहे दंडरहित अर्थ

सप्तविंशप्रकाशः २७. ( २६३ )
काहूको तुम दंड द्रव्य नहीं देते कृपाण जो करवाल है सो है करमें हाथमें
जिनके ॥ ५ ॥ यामें परिसंख्या है वर्ण जे अरुणादि हैं तिनको संकर मिलाइबो
द्विजराज (चन्द्रमा) मित्र (सूर्य) जाको राज सकल जगको मंडन (भूषण)
है ऐसे जे तुम हौ ते चिरु चिरु कहे बहु काल पर्यंत राज करौ ॥ ६ ॥
मू०-वायु । राजारामचंद्रतुमराजहुसुयशजाकोभूतलकेआ-
सपाससागरकोपाससो। सागरमेंबड़भागबेषशेषनागजूकोजैपै
सुखदानिसोईबिष्णुकोनिवाससो ॥ बिष्णुजूमेंभूरिभावभाव-
कोप्रभावजैसेसोभवजूकेभालमेंबिभूतिकोविलाससो । भूतिमा-
हचंद्रमासोचंद्रमेंसुधाकोअंशुअंशुनिमेंकेशोदासचंद्रिकाप्रका-
शसो ॥७॥ देवगण। राजारामचंद्रतुमराजकरोसबकालदीरघ-
दुसहदुखदीननकोदारिये । केशोदासमित्रदोषमंत्रदोषब्रह्मदोष
देवदोषराजदोषदेशतेनिवारिये ॥कलहकृतघ्नमहिमंडलकेवरि-
बंडपाखंडअखंड खंडखंडकरिडारिये। वंचककठोरठेलिकीजै-
बाटआटझूठपाठकंठ पाठकारीकाठमाहिंमारिये॥८॥ऋषिगण।
भोगभारभागभारकेशवविभूतिभारभूमिभारभूरिअभिषेकनके
जलसे।दानभारगानभार सकलसयानभारघनभारधर्मभारअ-
क्षतअमलसे॥ जयभारयशभारराजभारराजतैहरामशिरआशि-
षअशेषमंत्रबलसे । देशदेश यत्रतत्रदेखिदेखितेहिदुखफाटतहैं
दुष्टनकेशीशदाह्योफलसे ॥ ९ ॥
टी०-पास कहे फांस अंशु (किरणि) ॥ ७ ॥ दारिये कहे नाश करत हौ
वंचक (ठग) कठोर (निर्दय) झूठरूपी जो पाठहै ताके जे कंठपाठकारी हैं अर्थ
जे गूढ़ही कहौ करत हैं विभूति (ऐश्वर्य) ॥ ८ ॥ ९ ॥
मू०-केशव-विजयाछंद ॥ जाइनहींकरतूतिकहीसबश्री
सविताकविताकरिहारो । याहीतेकेशवदासअशीषपढ़ैअपनो
करिनेकुनिहारो।कीरतिदेवनिकीदुलहीयशदूलहश्रीरघुनाथति-
र