रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तविंशप्रकाशः २७. ( २६१ )
शुद्ध ॥ ३५॥ बिधिसोंपाँयपखारिकै,रामजगतकेनाह॥दीन्हे-
उगाउंसनौढियन, मथुरामण्डलमाह ॥ ३६ ॥
इतिश्रीमत्सकलोकलोचनचकोरचिन्तामणिश्रीरामचन्द्र
चंद्रिकायामिंद्रजिद्विरचितायांरामस्यराज्याभिषेकव-
र्णननामषड्विंशःप्रकाशः ॥ २६ ॥
टी०-॥ ३२ ॥ आफियो कहे दियो तिन सीताजू ॥ ३३ ॥३४॥३५॥३६॥
इति श्रीमज्जगज्जननीजनक जानकी जानकी जानिप्रसादायजन जानकीप्रसादनिर्मिताया
रामभक्तिप्रकाशिकाया षड्विंशः प्रकाशः ॥ २६ ॥
मू०-दोहा ॥ सत्ताइसैंप्रकाशमें, रामचन्द्रसुखसार ॥ ब्रह्मा
दिकअस्तुतिबिबिधि, निजमतिकेअनुसार॥ १॥ ब्रह्मा-झूलना
छन्द॥ तुमहौअनन्तअनादिसर्वगसर्वदासर्वज्ञ। अबएकहौ कि
अनेकहौमहिमानजानतअज्ञ ॥ भ्रमिबोकरैंजगलोकचौदहलो-
भमोहसमुद्र । रचनारचीतूमताहिजानतहौंनब्रह्मानरुद्र ॥ २ ॥
टी०-॥ १ ॥ सर्वग कहे सर्वत्र व्याप्त लोभ मोहके समुद्र अर्थ लोभ मोहसों
भरे जे चौदहलोक कहे चौदहों लोकके प्राणी जा रचनामें भ्रमिबो करत हैं अर्थ
संदेहको प्राप्त भयो करत हैं ता रचनाको नहीं जानत हौं न ब्रह्म ( वेद ) जानत
हैं न रुद्र जानत हैं अथवा चौदहलोकमें लोभ औ मोहके समुद्रमें हम भ्रम्यो
करत हैं तासों तुम्हारी रचनाको नहीं जानत ॥ २ ॥
मू०-शिव-दण्डक ॥ अमलचरिततुमबैरिनमलिनकरौसा-
धुकहैंसाधुपरदारप्रियअतिहौ । एकस्थलस्थितपैबसतजगजन-
नाप्रियकेशोदासद्विपदपैबहुपदगतिहौ ॥ भूषणसकलयुतशीश
धरेभूमिभारभूतलफिरतपैअभूतभुवपतिहौ । राखौगाइब्राह्मणन
राज सिंहसाथचिरुरामचन्द्रराजकरौअद्भुतगतिहौ ॥ ३ ॥
इन्द्र ॥ बैरीगाइब्राह्मणकोअन्यनमेंसुनियतुकविकुलहीकेसु-
वरणहरकाजहै । गुरुशय्यागामीएकबालकैबिलोकियतूमान्