रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २६२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
गनहीकेमतवारे कैसोसाजहै ॥ अरिनगरीनप्रतिहोतहै अगम्या
गौनदुर्गननहिंकेशोदासदुर्गतिसी आजहै । देवताईदेखियतसुगढ़
निगठोईजीवो चिरु चिरु रामचन्द्रजाकोऐसोराजहै ॥ ४ ॥
टी०-याहूमें विरोधाभास है अनल ( निर्मल ) चरितनसों बैरिनको मलिन
करत हौ इत्यर्थः पर कहे उत्कृष्ट दार अर्थ लक्ष्मीजू । “राघवत्वे भवेत्सीता
रुक्मिणी कृष्णजन्मनीति पुराणात्।।” जा भूमिकौ शीशमें धरै हैं ताही पर फिरिबो
विरोध है गाय सदृश जे ब्राह्मण हैं तिनहूंको राखत हौ रक्षा करत अथवा गाय
औ ब्राह्मणनको राखत हौ औ राजसिंह कहे राजरूपी जे सिंह हैं तिनसों साथ
कहे मित्रता है तौ सिंहसों मित्रता औ गायकी रक्षा यह विरोध है ॥ ३ ॥ यामें
परिसंख्यालंकार है ग्रंथनमें लिख्यो है कि गाइ ब्राह्मणके बैरसों ऐसो पाप होत
है सुंदर वर्ण ( अक्षर ) कवितामें धरिबेको देवताई कहे देवताकी प्रतिमाही ठांकी
आदिकी गढ़नि सों गढ़ी देखियत है और कोऊ प्राणी नहीं गढ़चो जात अर्थ
ताडनाको नहीं प्राप्त होत ॥ ४ ॥
मू०-पितर । बैठेएकछत्रतरछाँहसबछितिप रसूरकुलकलश
सुराहुहितमतिहौ । त्यक्तबामलोचनकहतसबकेशोदासबिद्य
मानलोचनद्वैदेखियतुअतिहौ ॥ अकरकहावतधनुषधरेदेखि-
यतुपरमकृपालुपैकृपाणकरपतिहौ । चिरुचिरुराजकरोराजा-
रामचंद्रसबलोककहैंनरदेवदेवदेवगतिहौ ॥५॥ अग्नि । चित्र-
हीमें आजवर्णसंकरविलोकीयतुव्याहहीमेंनारिनकेगारिनसों-
काजहै । ध्वजैकंपयोगीनिशिचक्रैहैबियोगीद्विजराजमित्रद्वेषी
एकजलदसमाजहै । मेघैतोगगनपरगाजतनगरघेरिअपयश
डरयशहीको लोभआजहै । दुःखहीकोखंडनहैमंडनसकल-
जगचिरुचिरुराजकरैजाकोऐसोराजहै ॥ ६ ॥
टी०-यामें विरोधाभास है बिरोधपक्ष राहु ( ग्रह ) अविरोध सुराहु कहे
मार्ग त्यक्त कहे त्यागे वामलोचन औ वाम कहे कुटिल लोचन अर्थ काहूसों
वंशोचन करि नहीं ताकत विद्यमान प्रत्यक्ष अकर कहे दंडरहित अर्थ