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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

सातवां समय २७ ] पृथ्वीराजरासो । ३५५

छिल्लोरे पग्गं, अरि घट जग्गं, करिन अनभग्गं, जुधमोरं ।
परिच्छार सु आपं, अरि डर ढापं, रुपि रन धापं, पग छोरं ॥
चानुकक्क सुभानं, जुद्ध समानं, अरि हरि मानं, गुमांनं । कुं० ॥१३१॥
पर मध्य पबारं, असि बहु झारं, अच्छरि तारं, सो रानं ॥
कूरभ पग जग्गी, दस काम भग्गी, फिर रन लग्गी, परिच्छारं ॥
दाछिम पग पुल्लं, बीर सु वुल्लं, नच मन डुल्लं, भर सारं ॥
कन्द कुंमारं, रन परि भारं, सार सुमारं, नच छल्लँ ॥ कुं० ॥१३२॥
आवध नच फुट्टै, गुरजनि छुट्ठै, सीसय फुट्टै, कर चल्लं ॥
रन जैन सरीसं, तुष्टिय सीसं, लगि घन रीसं, परि वध्यं ॥
रन लुथ्यि अलुथ्यं, गुन कवि कथ्यं, अचरिज सथ्यं, रवि रथ्यं ॥
कुं० ॥ १३३ ॥ रु० ॥ ७८ ॥

छंद भुजंगी ॥ पक्कायौ जुसूरं विराजंत बीरं । स्वयं कंठ आभूषनं छंद नीरं ॥
पया खेस मत्ता चवं पंच अच्छी । कितौ छंद नामं बिराजै सु लच्छी छंद ॥१३४॥
नवं नेह नारी लछी देह दूनौ । करी सूर नांची विराजंत सूनौ ॥
इयं कूंडि राजं लरे सूर तेजं । मनौं जुद्ध आकूत भारत्थ एजं ॥ कुं० ॥ १३५ ॥
चत्तै चाल बंधे तनं मंड आसं । कहै चंद कच्ची तिनं जुद्ध भासं ॥
कुं० ॥ १३६ ॥ रु० ॥ ७९ ॥

गाथा ॥ हंकारे विप सेनं । बजे बज्जाईं पंच सद्दायं ॥
सद्दे नव रँडा रंगं । भगं कन्ह चितयं बलयं ॥ कुं० ॥ १३७ ॥ रु० ॥ ८० ॥


७८ पाठान्तर—हकारे । घजस । नंचत ॥ १२६ ॥ केसरि । नचल । गंग । सिरमन । खबकारै ॥ १३० ॥ त्रुटि । प्रमानं । हिल्लोरे । पगं । जगं । करि अनभग्गं । चालुक । गुमान । गुमांनं ॥ १३१ ॥ अच्छरि । सोनारनं । कूरंभ । कूरभं । क्रूरं । भगी । फिरि । लगी । पुलं । वुलं । डुलं । झाल भारं सिरं । कुमारं । हलं ॥ १३२ ॥ फुट्दै । विछुट्दै । फुट्टै । चलं । शीसं । वध । लुथ उ लुथ । कथं । सथं । रथं ॥ १३३ ॥
७९ पाठान्तर—सौ सु । पटं । अछी । किनौ । नांमं । लछी ॥ १३४ ॥ लरैं । मनौ । भारथ ॥ १३५ ॥ कहैं । कवी ॥ १३६ ॥
८० पाठान्तर—हकारे । बीय । बजाइ । सद्दाई । सदे । रंगं रंगं । रंग रंग । अगं ॥

३५६ पृथ्वीराजरासो। [ सातवां समय २८
दूहा ॥ उत मंडोवर वीर कौं, इत संभरि वै राव ॥
दुअ लग्गा अस रार जुध, सुकवि चंद करि कावं ॥
छं० ॥ १३८ ॥ रू० ॥ ८१ ॥
छंद भुजंगी ॥ सलुथ्यं सलुथ्यं अलुथ्यं तिलुथ्यं । इयानं उषानं समानं पलत्थं ॥
हयगं रथंगं धरं धार तुहैं । धरं धार धीरं मघा वीर लुहै ॥
छं० ॥ १३६ ॥
छबकै रुधिंगा प्रवाहं सिरज्जं । धरं घाम चापं रनं केन रज्जं ।
भनकंतं भेरी चिक्कारैं सुछथ्यी । नचैं रंग भैरूं ततय्ये ततय्यी ॥
छं० ॥ १४० ॥
प्रचारं सुदंती सुअंती अलुभकं । अलुझैं सुदंती उड़ैं किंक झुलकं ॥
मनं झारते जान हेभं हयनं । परज्वाल तुहैं तनंजा विननं ॥
छं ॥ १४१ ॥ रू० ॥ ८२ ॥
लोहाना आजानु बाहु के युद्ध का वर्णन ॥
कवित्त ॥ लोहानौ आजानं । बांह लंबी पसारै ॥
लंबी बांच पसारि । तेग खंबी उब्भारै ॥
उब्भारै विब्भार । बीर बाधै बद्धाली ॥
अद्धाली अर बद्धि । कंध सोहैं सुद्धाली ॥
सुद्धाल कंध विव षंड धुअ । विधि ओपम कवि चंद कहि ॥
आउत्त घत्त आजान भुअ । मनु कजल कोटक विज लहि ॥
छं० ॥ १४२ ॥ रू० ॥ ८३ ॥
८१ पाठान्तर-कौं । दोउन के असराल युद्ध । सो चंद करीय सु काब ॥
८२ पाठान्तर--अलुथं सलुथं । सलुथं सलोथं । अलुथं तिलुथं । उयानं । पलथं । हयं
गंरथं । तुहैं । लुहैं ॥ १३६ ॥ पलकैं । रुधिजा । प्रबाहं । कंन । भनकंत । चिकारे । सुहथी ।
नचै । भैरौं । ततथे । ततथी ॥ १४० ॥ अलुभं । अरुझैं सुदंती । अलुझंत । उड्डे । झुकं । हयनं ।
गयनं । परै । तुटें ॥ १४ ॥
८३ पाठान्तर-आजान । वाह । पसारे । उभारै । उभारै । विभार । बढाली । वढाली ।
अरिकट्टि । सोहैहैं । सुढाली । सुढालि । पंघ किक्कि षंड हुअ । उपम । आवत । छत आजानु ।
मनौं । मनौ ॥

कवित्त ॥ लोहांनै अरि फौज । चक्क चिहुँकोद फिरांइय ॥
ज्यौं तूल मध्य वातुल । पवन जिम पत्त भ्रमाप्य ॥
मारुत वलि आरिष्ट । बापू चिहुँ कोद भुलावय ॥
कै वाय पुरातन धज्ज । बिबिधि विध तुंग दखायय ॥
कै कुद्धान्त चित चक्कित भौ । चक्र चिहूं दिसि फेरइय ॥
मृगराज मृगनि ज्यौं क्रोध बल । दल सम्मृह अरि घेरइय ॥
छं० ॥ १४३ ॥ रु० ॥ ८४ ॥
कवित्त ॥ तहां बिख्फि पिथ कुँअर । लोह भारै गज मध्यं ॥
भय भसुंड विपंड । अंम सोभंत सुतथ्थं ॥
कै * जलधि तह छवि सोम । धोम धारा घृत सिंचिय ॥
कै * तडित तेज नव घंन प्रमान * । भान चलि बहल संचिय ॥
कज्जल प्रमान प्रब्बत ढल्यौ । रत्त धार बुट्ठंत जलु ॥
कंचन प्रनार दै सुर अवकि । इह ओपम दीसंत षलु ॥
छं० ॥ १४४ ॥ रु० ॥ ८५ ॥
दूहा ॥ जावक ओन प्रनार जल । इंगुर फटिक वछात ॥
जीवत रद कढि रुचिर तिन । दंतू सर दररात ॥
छं० ॥ १४५ ॥ रु० ॥ ८६ ॥
कवित्त ॥ लोहांनी आजान बाहु* । जित आरनि जस लिन्नौ ॥
ज्यौ इक लेई कन्द । दंग दावा नल पिन्नौ ॥
ज्या इकले हनुवंत । बंक लंका गढ ढाथ्यौ ॥
ज्यौं इकलेई भीम । सित्त कौरव तन गायौ ॥
८४ पाठान्तर-लोहांनौ । चिहु । काँद । ज्यौं । तुल । मधि । भ्रमाइय । बलि । चिहु ।
ध्वज । विधितुंग । भयौ । चिहुं । फेरर्दय । ज्यौँ । घेरिईय ॥
८५ पाठान्तर-पिन्नि । कुंआर । मथं । भईय । तथं । कें । तरह । चिंचिय ! चिंचीय । *
यह सब अधिक पाठ हैं । भांम । बहूलह । फजल । प्रमांन । प्रबत ।
८६ पाठान्तर-प्रनाल ॥

३५८ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय ३०
ज्यौं पुनि अगस्ति अप डुक्कलि । खोषि सब्ब सायर खयौ ॥
दांनव क्ति चंपि अंगद वलिय । नंपि उदधि परसैं गयौ ॥
छंदं० ॥ १४६ ॥ रु० ॥ ८७ ॥
कवित्त ॥ वल बंध्यौ नाहर नारिंद * । इंद्र जनु वज्र छह्य ऋषि ॥
सुकति सुफल बड्डीय । बोर ब्रह्मांड तार पुत्ति ॥
नर नाहर ज्यौं लस्यौ । लज्ज पंकल्ल आनुभयौ ॥
सार धार निह्तार । पार सुक्कियग जग सुस्रथौ ॥
कुलछंत केल्लि परिचाररिन । चिसल तेज लग्गिय चिसुक ॥
भग्गौ न भूमि रजपूत हैं। करौं नाम जिम अटल धुव ॥
छंदं० ॥ १४७ ॥ रु० ॥ ८८ ॥
कवित्त ॥ सुनिय मंच सेवकक प्रमांन * । रघट घही फेरहि एम ॥
पेट भरन * चह्यंत । पुठ्ठि दै भार चलचि कम ॥
ते नह गनियै सूर । अंत किचिन कौ नांची ॥
स्वांमि संकरैं छंडि । लो अन्नप्पन घर जांची ॥
गनियै न सूर अरि जूझ बल । अप्प सेन इषि घट्ठियै ॥
जै अजै भाग भूपति कमह । अप्पु दोस अप मिट्टियै ॥
छंदं० ॥ १४८ ॥ रु० ॥ ८६ ॥
कवित्त ॥ वाय रूप प्रथिराज । गज्जि गयो असि झुक्कं ॥
सार धार उक्तार । गुरज भंज्यौ सिरभूक्कं ॥
रच्यौ आन रथ पंहि । पवन रच्यौ गति कुंडि थिर ॥
रहे देव टग चाहि । नथै वैताल बीर भर ॥
८७ पाठान्तर-* अधिक पाठ है । जिति । लौनौ । ज्यौं । दुकलेइ । इक्कलेंद । ज्यौं ।
इक्कलेंद । हनवंत । हनुमंत । ज्यौं । इकले । सत्त इकले । सब । दांनव । परसों ॥
८८ पाठान्तर-नाहर । * अधिक पाठ है। हथि । हथ । सुगति । ब्रह्मंड । ज्यौं । जल
पंकल्ल । निभार । मुक्किग है। । करौ। नांम ॥
८६ पाठान्तर-सेवक । * अधिक पाठ हैं। घटी। घटिका पुठि । चलि । कौं। स्वामी ।
जांहीं । रखि । भुञ्चाति ॥

सातवां समय २१ ] पृथ्वीराजरासो । ३५६
लंपे जु राज कित्ती प्रवछ । लोह मरन हुल्लंत दिन ॥
पछ पंद राज पच्छै चढी । नाहरराउ नरिंद रन ॥
छं० ॥ १४८ ॥ दृ० ॥ ८० ॥
कवित्त ॥ नाहर राउ नरिंद । चित्त चिंता उत्तारिय ॥
मन वध्यौ घन घय्यौ । मरम केवल विचारिय ॥
सुनहूं तौ * कहूं कवित्त । सुथिर जीवन जग नांची ॥
एह संसार असार । सार कित्ती कलु मांची ॥
ज्यौं उरगए सुप उंदर परै । यौं सुदेस नाहर कधै ॥
सपनव्य बात भिक्षै नहीं । नाम एक जुग जुग रचै ॥
छं० ॥ १५० ॥ ६० ॥ ८१ ॥
दूहा ॥ दूप कपि रचि रन मंड रूपि । ज्यौं कपि रक्खस सेन ॥
कोपि कान्ह धायौ बली । ज्यौं अगि विकुठिय गेन ॥
छं० ॥ १५१ ॥ ६० ८२ ॥
कान्ह चौहान के युद्ध का वर्णन ॥
विराज ॥ धप्प्यौ कान्ह घही। फुटी अंधिपही ॥ खरी सेन फही। मनौं दूध षही ॥ छं० ॥ १५२
षगंगे उछही । मनौं कठ कही । परे भूमि लही । मनौं मद जही ॥ छं० ॥ १५३ ॥
बद्दै पग्ग घही । मनौं चक्क मही । तरफैं कि नही । मनौं लागि नही ॥ छं० ॥ १५४
खरै यों सुभही । मनौं लौन नही । सुरैं मारि रूही । मनौं लत्त तही ॥ छं० ॥ १५५ ॥
पसू पंष ठही । पषं ओन चही । कषीचंद भही । मुषं कित्ति रही ॥
छं० ॥ १५६ ॥ रु० ॥ ८३ ॥
८० पाठान्तर-प्रथीराज । गजि । उद्भार । भांन। गषन । मंडै । यु । रासि । कित्ति । सोई । पक्कै । नाहरराव ॥
८१ पाठान्तर-नाहरराय । चिंत चिंता । उतारीय । केवलह । विचारीय । सुनहु । सुन हूं । * अधिक पाठ है । नांहीं । ज्यां । उरगह सुमुप । यों । सुमिट्टै ।
८२ पाठान्तर-हनं । ज्यां । रंपस । कन्ह । ज्यो । विकुट्ठिय ॥
८३ पाठान्तर-* सं० १६४७ की प्रति में शुद्ध नाम विराज है और इतर में छंद रसावला है ॥ १५२ ॥ मनं । कठ । परैं । मनौं । मनौ । मद ॥ १५३ ॥ बहै । मनं । तरफै । लाग ॥ १५४ ॥ लरैं । यों । मनं । लांन । मनं । लत ॥ १५५ ॥ पसूं । घट्टी । कवि ॥ १५६ ॥
१४

३६० पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय ३२
कवित्त ॥ नाहर नाहर राव । कन्हर नाहर सुकन्ह कर ॥
दिठ्ठ दिठ्ठ अंकुरिय । अरिय विस जांनु बिखद्दर ॥
उमसि कन्ह असिरीस । सीस चुकि परिय बांम भुज ॥
पुनि उक्कुटि परिच्छार । सार सिर कन्ह टोप धुज ॥
लग्गे सुटोप उड्डिय किरच । बढ़त धार उन संग बचि ॥
जैजया सद् जुग्गिन करचि । दुअन जुद्ध अदभूत सचि ॥
छं० ॥ १५७ ॥ छ० ॥ ८४ ॥
डारि कंन्द तरवारि । कट्ठि जम दढ़ मिल्यै चिय ॥
सचि जुद्ध दूत बीच । धप्प भतीज दिषि निय ॥
गचि सुसिष्ष पुठि आइ । घाइ जम दढ़ कियै तिय ॥
छंडि प्रान परिच्छार । परे पाल्हन ऊपर जिय ॥
गचि रोस नंपि नर भूमि पर । अनि अनियारिय उभय कसि ॥
तिन अनत घाय घुंमत झुमत । गयौ निठ्ठि नाहर निकास ॥
छं० ॥ १५८ ॥ रु० ॥ ८५ ॥
बर नाहर जिम लखै । गयौ नाहर जिम नाहर ॥
घाव घट घन घुंसि । झुंसि निक्कसिय बल नाहर ॥
कन्ह कंक किय नन्द । बंक भर भूमि पछारिय ॥
जनु कि लँगूरह लंक । तोरि बारा धर डारिय ॥
सादान बज्जि रन रज्जि सच । तत्त सु सस्थरकत करिय ॥
सोमेस सूर चहुआन सुअ । कित्ति चंद कंदच धरिय ॥
छं० ॥ १५९ ॥ रु० ॥ ८६ ॥
८४ पाठान्तर-कंन्द। दिठ दिठ। जांनि । परीय। बांम । फुनि । उक्कंटि । उकुटि । कन्द ।
उडिय । सबद । जुगिन ॥
८५ पाठान्तर- कन्ह । जमदठ । मचि । जुध । वीचि । धपि । भतीज । दिषिनीय ।
सिषि । पुष्ठि । जमदठ । प्रांन । पल्हन । उपर । अनिथारीय । निठि ॥
८६ पाठान्तर-घट । धूमि । भूमि । नन्ह । भूमि । लंगूरह । डारीय । सादांन । ब्रजि ।
रजि । सथ । करीय । चहुवांन । चहुवांन । सुय । कंदहि ॥

सातवां समय ३३ ] पृथ्वीराजरासो । ३६१
दल घट्क्यौ सब सथ्य । जुद्ध धायौ तत्तंरिय ॥
चाहुआन कौ साथ । तेग तुंगह विडारिय ॥
उंच गात अरु हत्थ । वीर कही पट भारिय ॥
एइ ओपम कविचंद । चिंति मन मझ्झ विचारिय ॥
पल्लव सुवीर केतुक नवन । षरबंसंत वायद्द चल्लै ॥
तम तेज रुधिर भींज्यौ बहुल । कज्जह कित्ति जावक घुलै ॥
कूं० ॥ १६० ॥ छं० ॥ ९७ ॥
दूहा ॥ नाहर नाहर जिम निकसि । भिरि नाहर के भेष ॥
कहर कन्ह धपि कुप्पि पुठि । वली मीर चष लेष ॥
कूं० ॥ १६१ ॥ दू० ॥ ९८ ॥
कुंडलिया ॥ फिरि जुझार किय स्वामि कौं । मुक्तियं काम धमारि ॥
बली मीर गढ्ढौ लयौ । मरन सरन विचारि ॥
मरन सरन विचारि । मिलन अंतहपुर किन्नौ ॥
बँधि चिय सांइ सुभित्त । करि सांई सौं दिन्नौ ॥
सार धार तन षंड । षंडि मायौ रिपु जुर जुरि ॥
तिल तिल तन तुट्ट्यौ । रंभ ढुंढ्ढौ चित फिरि फिरि ॥
कूं० ॥ १६२ ॥ कुं० ॥ ९९ ॥
दूहा ॥ सिर तुट्टै परि भूमि पर । यौं राजै कविचंद ॥
कमल जानि नचंत सर । सरद चंद पर कंध ॥
कूं० ॥ १६३ ॥ दू० ॥ १०० ॥
कुंडलिया ॥ कमल जानि नच्यौ जु सर । दिसि सोभै संग्राम ॥
मानहु जलद कमोद तजि । थल आए ए ताम ॥
९७ पाठान्तर-सथ । तत्तारीय । चाहुवान । विडारीय । हाथ । कट्टी । भारीय । उपम ।
मन सों । विचारीय । विच्यारिय । बायह । भंज्यौ ॥
९८ पाठान्तर-नाहर कै । लेषि ॥
९९ पाठान्तर-स्वामि कों । मुक्तिय । काम । गल्लौ । शरन । विचारि । अन्तरपुर । बंधि ।
चीय । सांई । सुभित । सुभृत । तिल तिल्ल । ढंढ्यौ ॥
१०० पाठान्तर-तुट्टै । यों । राजि । राजै । जानि । नाचंत । शरद कंच ॥

३६२ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय ३४
थल जए ए ताम । चंद ओपम तहां पाई ॥
मांनहु वीर समुद्र । दयौ फत्त ध्य्य बधाई ॥
धार धार चढि सूर । सूर कीर्त्ति विमलं ॥
धंनि धंनि उच्चार । सीस नच्चौ सुकमलं ॥
छं० ॥ १६४ ॥ रू० ॥ १०१ ॥
नाहरराय का भागना और पृथ्वीराज का पीछा करना ॥
कवित्त ॥ भग्गा नाहर राई । पाई मुक्कै नाहर जिम ॥
जिम जिम भर कह्रई । रोस लग्गा वर तिम तिम ॥
बेत सोधि चहुआनं । पर्यो तूंवर पाछारी ॥
बर* परस्यौ तहां गोइंद । पर्यौ भट्टी अधिकारी ॥
षांची प्रसंग बंधव उसै । मोह सुबंधा बंध वर ॥
तिम तिम सु तेग तारून षसै । तिस तिम बुट्ठे सार नर ॥
छं० ॥ १६५ ॥ रू० ॥ १०२ ॥
चिविध सहस्र नाहर * बसंत । पच कायर तन झारिय ॥
वीर रूप तप भान । नीर सूखै षत्त भारिय ॥
तत्तरि तुंअर नरिंद । भयौ तरु गहर पत्त कूँछ ॥
छांच स्वांमि संमूह । जूझ टारिय सुअंग तच्छँ ॥
फल फूल कित्ति पंषी वरन । विमुख न भौ संमुह लख्यौ ॥
गंधर्व वीर चालुक वरन । मरन वीर अच्छरि बरयौ ॥
छं० ॥ १६६ ॥ रू० १०३ ॥
१०१ पाठान्तर-जांनि । जानैं । नच्चैौ । सुर । मानहु । थल ए उए तांम । उपम । पाइय ।
मानहु । हथ । बधाइय । किए ति । किए सु । धनि २ । उच्चार । नंच्यौ ॥
१०२ पाठान्तर-नाहरराय । पाय । मुक्या । कह्रई । रोस । चहुवान । चाहुआनं । तूंवर ।
तूंअर । पहारी । परहारी । * अधिक पाठ है । तथा उलट पुलट पाठ ऐसा है-बर गोइंद तहां
पस्यौ । बध्या बंधवर । तेज ॥
१०३ पाठान्तर-सस्त्र । * अधिक पाठ है । झारीय । भांन । सुक्कै । झारीय । तत्तारी ।
तूंअर । तोअर । पंत्त सह । पत्त कूंह । छाह । स्वांमि । टारीय । तहां । भौं। गंधर्व्व वीर चारन
वरन । अक्करि ॥

सातवां समय ३५ ] पृथ्वीराजरासौ । ३६३
गुज्जर वै परधान । जैन धुम्मी मत लड्ढी ॥
एकादस चहुआन । धर धारह आलुड्डी ॥
सहस एक असवर । धार वै गै घर मंड्यौ ॥
नाहर राइ नरिंद । कोट पहन वै चढ़क्यौ ॥
ढुंढयौ षेत चहुआन बर । अरु भारथ आहुह्यौ ॥
चामर सु कवच धरि षेत में । सुधा विविध विधि लुह्यौ ॥
छं० ॥ १६७ ॥ रु० ॥ १०४ ॥
डोला पंच पचीस । स्वामी संजुत्त चढाइय ॥
घाइ कन्ह घट घुम्मि । घाइ एकादस राइय ॥
चंपि बीर चालुक्क । राज मेलान तुच्छ करि ॥
गल गज्जै सामंत । बरै बरनी नाहर बरि ॥
रविवार बीर पंचमि दिवस । एकादस रविभुअन ग्रह ॥
अष्टम सु चक्र जोगिनि ग्रहण । बर बज्जेति नरिंद तह ॥
छं० ॥ १६८ ॥ रु० ॥ १०५ ॥
पट्टन में पृथ्वीराज का राज्याभिषेक होना ॥
देव दसमि कै दीह । नयर पहन चहुआनं ॥
गुर पंचम रवि नवम । सुवर ग्यारह ससि धानं ॥
तीय थान बर भौम । सुक्र सप्तम बल किन्ना ॥
केंद्री बर बुद्ध । राह सब कौंद अहिन्ना ॥
आनंद चंदं बरदाइ घन । राजभिषेकन पहि करि ॥
साजंत भूमि जीते सुपत्ति । तेज तुंग दुज्जन सुहरि ॥
छं० ॥ १६९ ॥ रु० ॥ १०६ ॥
१०४ पाठान्तर—गुज्जर । परघांन । धुंम्मो । धुमी । चहुवांन । आलुही । नाहरराय । चढ्यौ ।
चहुवांन । आहुट्यौ । लुट्यौ ॥
१०५ पाठान्तर—डोंला । स्वांमी । स्वांमि । घाय । घूंमि । घुंम्मि । धाय । ईकादस ।
मेलांन । तुछ । बरैं । बरौ । बजेति ॥
१०६ पाठान्तर—चहुवांनं । चहुआनं । यांन । कीनो । केंद्री । सबकोद अहिना । बरदय
धनं । पट । दुजन ॥

३६४ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय ३६
दूहा ॥ तिरिय वक्र अधचक्र नन । ऊरध वक्र प्रमान ॥
पून नखिच चहुआन वै । पट अभिषेक समान ॥
छंद ॥ १७० ॥ छ० ॥ १०७ ॥
कवित्त ॥ पून नखिच कविचंद । कौन वान् उपावै ॥
पटभिषेक राजान । बहुत आगम प्रभावै ॥
ग्रच प्रसाद * तोरन उतंग । कूच जंचह सक ठावै ॥
ध्वजा बंधि पत्ताक । संष चामर मंडावै ॥
उद्यत्त परब पनि अर्चन । बहु विवेक घंमच सुधरि ॥
नन कूप तडागन वापियन । धन सुकियन सुकियन बरि ॥
छंद० ॥ १७१ ॥ छ० ॥ १०८ ॥
नाहरराय का हारकर अपनी कन्या के विवाह का
लग्न लिखवाकर भेजना ॥
छंद पहरि ॥ सब सथ्थ तथ्य हुअ एक ठांम । मुक्कांम कीन गिरिनार गांम ॥
सब लोक महाजन मिले आइ । चिंत्यौ सुचित्त नाहर सुभाइ ॥छं॥१७२॥
जिणि मेल होइ सो करि उपाइ । दिप्पियै दीप ल्हो नहीं खाइ ॥
पहुमी सुकाज अर तजत प्रान। पहुमीस काज धन देत दान ॥ छंद॥ १७३ ॥
पहुमीय काज जग बाजि देत । उपाइ नेक पहुमी सुलेत ॥
पुत्री सुएक तिन तन कुआरि । दीसंत देह जनु मदनधारि ॥ छंद ॥ १७४ ॥
बुल्लाइ विप्र लिखि लगन तथ्य । पठाइ दीन नृप पिथ्थ जय्थ ॥
आनंद राज सब सेन अंग । फुल्ले कि कमल जनु दिषि पतंग ॥
छंद० ॥ १७५ ॥ छ० ॥ १०९ ॥
१०७ पाठान्तर=तिरीय । प्रमाणं । चहुआन कौं । पटभिषेक । समांन ॥
१०८ पाठान्तर-कौन । उपावै । पाट विभेक रजांन । पाटभिषेक राजांन । आरांम ।

  • अधिक पाठ है ॥ उतंग । पताक । उदयं । उद्यंत । पांनिं । पांनि । घुंम्मह । तटांकने । धन
    मुकियन मुकियन वरि । मुकियन चुकियन वर ॥
    १०९ पाठान्तर-सब्ब । सर्थ । तथ । हूष । ठांम । मुकाम । गिरनारि । गांम । सब्ब । मिलियं ।
    आय । चिंत्यौ । सुभाय ॥ १७२ ॥ जिंहिं । होय । उपाय । दिषियै । नही । लाय । पुहमी । प्रांन ।
    दांन ॥ १७३ ॥ उपाय । कुवार । धार ॥ १७४ ॥ बुलाय । तच्छ । पठाइ । पिथ । जय । फूले ॥ १७५ ॥

सतवां समय ३७ ] पृथ्वीराजरासो । ३६५
पृथ्वीराज का ब्याहने को जाना ॥
कवित्त ॥ नट्ठा नाहरराइ । सेन ढूंक्यौ चहुआनं ॥
राज जीति गज लब्धि । सीस लग्गा असमानं ॥
सुम मल्लह परिछार । मत्त कीनौ अमिस जुध ॥
बरन बीर संमुहौ । राज लग्गे सुमंत सुध ॥
पंचमी बार रवि रात दिन । मंज नाम बर जोग गुर ॥
गिरि नाम करन राजन बर । चह्यौ बीर बारंस डर ॥
छं० ॥ १७६ ॥ ११० ॥
पृथ्वीराज का तोरन की बंदना करना ॥
कवित्त ॥ बंदिं राज तोरन्न सुचंग * । मुति नख्यै अच्छित अलि ॥
मनां * चंद किरनि छूटंत । भान नखै मयूष छबि ॥
ठाम ठाम घिय गान । जानि अच्छरि कैलासच्च ॥
सुभ सिंगार सोभंत । भूमि रचि अलि रस बासच्च ॥
तोरन सुचरु आचार करि । कै जनवासत मंडपहि ॥
दिष्षंत नयन भुल्लहि चरित । काः कवि ब्रन्दहि आव कहि ॥
छं० ॥ १७७ ॥ रु० ॥ १११ ॥
पृथ्वीराज का नाहरराय की कन्या से विवाह होना ॥
दूहा ॥ करि आचार सब पंडित । पानि ग्रहन फुनि व्याह ॥
सोम बास ससुनाइकै । धनि नाहर कत्याह ॥
छं० ॥ १७८ ॥ रु० ॥ ११२ ॥
११० पाठान्तर-नठा । नाहरराय । ढूंक्यौ । चहुआनं । लभि । मल्लह । मत्तह । मत । अमित ।
जुधु । लगा । राति । नाम । गिर । नांम । बरन । चढौ । बीरंसु ॥
१११ पाठान्तर-तोरन । * अधिक पाठ रै । मुति । नयें । छुट्ठत । नंपै । ठांम ठांम ।
जीय । गांन । गांम ॥
११२ पाठान्तर-पंडितन । पांनि । फुनि । सोबास्रब सुनायकैं । सोबास ससुनाइकै ।
धंनि । कत्याह ॥

३६६ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय ३८
नाहरराय का कहना कि आपके काम में सीस देने के
सिवाय और कुछ देने के योग्य हम नहीं हैं ॥
दूहा ॥ नाहर बोलू नरिंद कहि । का तुम जोग जगीस ।
और देन हम है कहा । काम सीस हम ईस ॥
छंद० ॥ १७८ ॥ रु० ॥ ११३ ॥
नाहरराय की कन्या का गुण और रूप वर्णन ॥
साटक ॥ तन्जे स्याम सुरंग वाम तनयं, मन्मध्य वल्ली कळा ।
सुषं धामय तेज दीपक कळा, तारुन्य लच्छी ग्रहा ॥
रूपं रंजित मंजु माल कळया, वासंत पंचावली ।
श्रवं लक्कन काम धीरज गुणै, धन्यौ दुती दंपती ॥
छंद० ॥ १८० ॥ रु० ११४ ॥
पृथ्वीराज का जीतकर स्त्री के साथ लौटना ॥
कवित्त ॥ संभारि बैरन जीत । पीर चालुक्क काम बच ॥
उभै जोध खो जितै । जोरू कर बत्त कालि कल ।
बीर निसानति सग्ग । बगिग आनन्द निसानं ॥
प्रान चेत बर बीर । चक्र्यौ संभरि दिसि थानं ॥
अर विब्भर खग्ग मग गय गएय । रचिय तिम्मगत जुद्ध इक्छ ॥
काकंक कोटि भंजै विषछ । सुबर बीर बीरछ जु पुछ ॥
छंद० ॥ १८१ ॥ रु० ॥ ११५ ॥
अरिल्ल ॥ लै तरुनी डोला चढि राजं । डोला लंगरिरारु बिराजं ॥
धन रंगा तोर त्तिय धन्यं । जिन रख्यौ जीवत नृप मन्यं ॥
छंद० ॥ १८२ ॥ रु० ॥ ११६ ॥
११३ पाठान्तर—नाहरराव । नाहरराय । कहा । देन । और । दैन । है । कांम ॥
११४ पाठान्तर-तन्मं । स्यामं । वांम । मनमथ । वाली । सुषं । लछी । गृहा । पचावली ।
श्रवं । लक्षन । कांम । गुनै ॥
११५ पाठान्तर-रिन । जोत । करवत । कालिकल । निसानं । बगिग । निसानं । थानं ।
विप्भर । अगमगह गइय । तिम । भंजे । एच्छ ॥
११६ पाठान्तर-लंगरीराय । धनि लंगा तोर तीय धन्यं । जीवित । मंन्यं ॥

सातवां समय ३६ ] पृथ्वीराजरासो । ३६७
संग वरनि डोला चढ़ि गजं । सनौं रत्ति दुति काम समाजं ॥
को अलि डोलनि सथ्य सुसाजं । चढ़ि सब सथ्य बजावत बाजं ॥
छं० ॥ १८३ ॥ रु० ॥ ११७ ॥
पृथ्वीराज का ग्यारह डोलों सहित होना ॥
गाहा ॥ करी जर्जन सरीरं । भीरं भंजि स्वामि का खेवं ॥
ग्यारह डोल सुसथ्यं । कथं पत्तेव संभरि गेहं ॥
छं० ॥ १८४ ॥ रु० ॥ ११८ ॥
पृथ्वीराज का विवाह कर घर पहुँचना ॥
दूहा । ग्रह पत्तै जित्तौ सथन । परनि सुचंगी बाज ॥
जंभा वीनं न्निम्मयौ । कुँअरप्पन सुचि लाज ॥
छं० ॥ १८५ ॥ रु० ॥ ११९ ॥
पृथ्वीराज की प्रशंसा ॥
कवित्त ॥ वंस अनन्त चहुआन । भयौ न पिथ समकोई ॥
जिन षंडे छत्र षग्ग । दीन वंदै सब खोई ॥
जिन नाहर राइ नरिंद । पंडव सच पञ्जारिय ॥
जिन वंभनवा सो सिंघ । वान ढल्यो गंजाड्य ॥
अरि घरन घरनि घर चैन नहि । सयन निसंकन संचरहि ॥
वन गहन बहन विह्वल फिरहि । बंदर ज्यौं कंदर वसहि ॥
छं० ॥ १८६ ॥ रु० ॥ १२० ॥
इति श्री कविचंद विरचिते पृथिराजरासके नाहरराइ
कथा वर्णनं नाम सप्तमो प्रस्तावः ॥ ७ ॥
॥ इति ॥
११७ पाठान्तर- बरनि । मनो । रति । डोलन । सथ ॥
११८ पाठान्तर-करि । भंजि । सुसथं । संभरी ॥
११९ पाठान्तर-गृह । विमयो ॥
१२० पाठान्तर-चहुवांन । भय । पियह । नाहरराय । नाहरराव । पंजायीय । सैं ।
बांन । ठट्ठौ । ठढौ । चैन नह । ज्यो ॥

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अथ सेवाती मुंगल कथा लिख्यते ॥
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( आठवां खण्ड । )
—:-o-:-—
सोमेश्वर के मंडोवर जीतने और लूट को सरदारों में
बांट कर प्रबल प्रताप के साथ राज्य
करने का वर्णन ॥
कवित्त ॥ सुभसि देस सोमेस । पेस मैवास महीपन ॥
सुभट यह संघट्ट । दिठ्ठि कुँवरं किय जीपन ॥
मंडोवर परिहार । मारि उज्जारि जेर किय ॥
सामतंन सस रंग । लच्छि लब्भी सुवंटि दिय ॥
दिन दसा देस दरबार दुति । दान जग्ग रत्ता रचै ॥
पहु प्रबल पारि पच्छारि करि । अदट दह जगवनि गरै ॥
छं० ॥ १ ॥ रू० ॥ १ ॥
सोमेश्वर के गुणों और उसकी गुणग्राहकता का वर्णन ॥
कवित्त ॥ अरिद्द दंड बल संड । गर्भ गर्भन डर कंडहि ॥
सगपन एक पग चास । पञ्चक सेवा सिर मंडहि ॥
दुजनि देव गुरु गाहू । पाइ पुज्जियहि निरंतर ॥
पंडित गुनी गुनग्य । द्रव्य चै वञ्चहि दिसंतर ॥
दरबार भीर सुभटन घटन । कला कवित्त नाटिक्क नटहि ॥
छत्तीस राग रागनि रसनि । तंत ताल कंठन ठटहि ॥
छं० ॥ २ ॥ रू० ॥ २ ॥
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१ पाठान्तर-सुभट्ट । दिट्ठ । कुअ्रं । कुंवरं । जिप्पन । उजारि । लछि । लभि । लभी । लीय ।
दांन । पछारी । हन ॥
२ पाठान्तर-कंडह । दुजन । गाई । गाय । पाय । पुजहि । पुजियहि । रागन । रसन ।
तंत ताठ ॥

३७० | पृथ्वीराजरासो । | [ आठवां समय २
सोमेस्वर का मेवात के राजा मुग्गल (मुङ्गलराय) के
पास कर लेने के लिये दूत भेजना ॥
कवित्त ॥ एक सुदिन सोमेस । दूत हज्जूर बुलाइय ॥
मैवाति सुगल नरिंद । पत्त पठ्ठइ लिपिदिय ॥
भूमि आस जौ करहि । भरहि तौ दंड सेव करि ॥
नतर समर डर डरपि । समुद उत्तरहि पारं तरि ॥
फिर धारि हुकुम चर चलिय तहँ । जहां मुग्गल संडल मची ॥
सोमेस सूर प्रथिराज कल । तिम संमुच चर वर कछी ॥
छं० ॥ ३ ॥ रू० ॥ ३ ॥
राजा मुङ्गल का यह पत्र पाकर क्रोध प्रगट करके दूत को
लौटा देना और सोमेस्वर का पत्रोत्तर पाकर क्रोध
करना और उस पर चढ़ाई करने की आज्ञा देना ॥
छंद पद्धरी ॥ पढ़ि पत्त पिच्छ मुग्गल नरिंद । प्रज्जरिंग रोस मैवात इंद ॥
बहु दिवस सोमंनृप हुअ सुषंग । किम उज्झवत्त कट्टी मुषंग ॥ छं० ॥ ४ ॥
किम सलिल उंट मुष चढै नीर । किम पवन गवन गति धरै धीर ॥
किम सूर सीत गुन गह्रै अंग । किम धर्मराज धरै दया अंग ॥ छं० ॥ ५ ॥
किम तजै ब्याल बल विषम मुष । किम तजै जटी गल्ल गरल दुष ॥
किम तजै उदधि उर अगनि दाह । किम तजै चंद रवि राह ग्राह. छं ॥६॥
धरि नाम कचि कौं दंड देहू । इह बत्त मुष कौं राज लेहू ॥
अरु करन सेव कचि चहुआन । मन मंझझ हँसि मति राज कान ॥ छं ॥
सेवामु साँचि श्रीनाथ पाइ । तिहि चरन चित्त लग्यौ सदाइ ॥
भंडार दंड कौ सस्त्र पान । जब तब सुलेखु पाजुर निदान ॥ छं० ॥ ८ ॥
सिर पाव मंगि बुद्धिक प्रवीन । पछिराइ चरन बर बिदा दीन ॥
फिरि दूत पच्छ अजमेर आइ । दिय पत्त लग्गि सोमेस पाइ ॥ छं ॥ ९ ॥
बंचिय सुलेख कायथ प्रमान * । सुनि सोम राज चहुआन भान ॥
३ पाठान्तर-हजूर । मेवाती । नरिंद । पठाय । लिपि । भूमियांास । उतराहि । हुकम ।
तहां । तह ॥

  • प्रमान = प्रमानराय नामक कायथ सोमेसराज की पेशी का मुंशी था ॥

करतार छय्य पग दान दोइ । धन सह गर्व जिन करौ कोइ ॥ कं० ॥ १० ॥
अनसंक कंक सम बंक धीर । तिहि दान दंड सो जुद्ध श्रीर ॥
प्रज्जरिग सोम सुनि श्रवन दूत। जिहि गेह पिथ्थ अवतार भूत ॥ कं० ॥ ११ ॥
बुल्लाइ सूर सामंत राज । दुय घटी सुहूरत सधौ आज ॥
मेवात मही ऊजारि जारि । पुर ग्राम नैर दीजै प्रजारि ॥ कं० ॥ १२ ॥
पन खोदि बंक गढ ढाचि होहिं । इम करिय भूमि मैवात लेहिं ॥
कित्तीक सहिप मुंगल नरेस । वन बंधि संधि बिन करि अभेस ॥ कं० ॥ १३॥
पज्जन बोलि कूरंभ राव । पुंडीर चंद जनु अग्नि वाव ॥
दाहिम नरिंद कैमास संग । चामंड गव अरि दन्त अभंग ॥ कूं० ॥ १४ ॥
गुज्जर कनं क बड़ राम देव । गहिलेोत राव गोइंद खेव ॥
इतने सुभट सजि जूझ धार । वजि पंच सबद वाजे करार ॥ कं० । १५ ॥ रु०॥ ४॥
ज्योतिषियों से मुहूर्त दिखोवार पुष्य नक्षत्र से चढ़ाई
के लिये निकलना ॥
दूहा ॥ बोलिय जोतिग गनिक दुज । परी मुहूरत सद्द ॥
तेरसि पुष्य रु भ्रगु दसा । चढि चल्ले निसि अद्ध ॥ कं० ॥ १६ ॥ रु० ॥ ५ ॥
घर की रक्षा के लिये पृथ्वीराज को घर पर छोड़ा ॥
दूहा ॥ रत्तजु इह विधि गेह भय । सुनि सोमेस सुभाल ॥
सिसु रख्खि रु संगृह्ही वछौ । मुंभत दिसा विसाल ॥कं० ॥ १७ ॥ रु० ॥ ६॥
४ पाठान्तर-पिथ । मुंगल । नरिंद । पजरिग । प्रज्जरिंग । रोम । मेद्वात । सुपग ।
उछ्रवत्त । कठी ॥ ४ ॥ सूलित उलटी । शीत ॥ ५ ॥ व्यांल । मुख । मुंष । दुःद । दुष ॥ ६ ॥ नांम ।
छित्री । मुःप । चाहुश्रांत । चाहुश्रांत । मक्त । होत । होस । आंन ॥ ७ ॥ पाय । तिहिं । दंड मेा
भंडार वर सस्त्र पांति । निदान ॥ ८ ॥ बुलिक प्रवीन । पहिराय । पछ । आप । हीय । लगि ।
पाय ॥ ९ ॥ कायध प्रमांन । चहुवान । भांनं । हय । दांत । दोय । मदहिं । कोय ॥ १० ॥ तिहिं
दांन । प्रजरिग । जि.हिं । गेह । पिथ ॥ ११ ॥ बोलाय । दुग्र । महूरत । उजारि । यांम । नयर
१२ ॥ पनि । करिय । करितु । मेवात । कित्तक । सुभूंम ॥ १३ ॥ पजूं । जनुं । चामंडराव ।
॥ जर । रामदेव । गोयंद । भट ॥ १५ ॥
५ पाठान्तर-बोलिय । धरी । पुरूष । भृगु दशा । चले । निशि ॥
६ पाठान्तर-रति यु विधि इह येह भय । रषे संगृह । दिशा विशाल ॥

३०२ पृथ्‍वीराजरासो। आठवां समय ४]
यात्रा के समय अच्छे शगुन मिलने ॥
दूहा ॥ प्रथम प्रयानच सुंदरी । मिली अंक लिय बाल ॥
पीतांबर अंबर धरै । दीप जोति रचि थाल ॥
छंद० ॥ १८ ॥ रु० ॥ ७ ॥
दूहा ॥ कलस कामिनी इक्क सिर। प्रात होत नृप पिख्ख ॥
मच्छ कंध काछार करि । खुर धुनि बाहम इक्ख ॥
छंद० ॥ १९ ॥ रु० ॥ ८ ॥
दूहा ॥ अन्य सगुन सुभ पिख्खि सब । गुंज गचर नीसान ॥
तमचर कर उज्जल्ल अवनि । प्रगटे पुब्ब दिसान ॥
छंद० ॥ २० ॥ रु० ॥ ९ ॥
पृथ्‍वीराज को राज्य में छोड़कर सोमेश्वर का मेवात
पर चढ़ाई करना और उसकी सूचना पत्र
द्वारा मुङ्गदलराय को दे कहना कि
लड़े वा दंड दे आधीन हो ॥
छंद भुजंगी ॥ चल्यौ चंपि सोमेस मेवात थानं । रच्यौ राज प्रिथराज गेहं निधानं ॥
फटी फौज बैरीन की झाल दिक्खी । तबै कग्गदं प्रेषराजं विसख्खी ॥ छंद० ॥ २१ ॥
वरं बीर धीरं मछा बैर पुत्त्रं । मगै राज सोमेस सौं जुद्ध अब्बं ॥
मछा तेज जाजुल्य भारी सुषग्गं । करै बैर सारथ्थ पारथ्थ जग्गं ॥ छंद० ॥ २२ ॥
इसौ सूर सोमेस दीपौ म्लानं । दियं कग्गदं मुंगलं राजथानं ॥
करो छेय छेयं किधौ अप्पि दंडं । तजौ आज पच्छै षगं षंडि कुंडं ॥
छंद० ॥ २३ ॥ रु० ॥ १० ॥
७ पाठान्तर-पयानह । प्रयांनह । लियें । पीतंबर ॥
८ पाठान्तर-एक शिर । पिषि । मल्ल । वामस ॥
९ पाठान्तर-सुभुन सब । निसांन । उजल । प्रगटी । दिसांन ॥
१० पाठान्तर-मेवात । प्रिथिराज । प्रिथिराज । गेहं । निधानं । दीषी । तबैं । विसषी ॥ २१ ॥
मगैं । युद्ध । अंब्बं । भारी सुजाजुल्य षग्गं । सारथ पारथ ॥ २२ ॥ इसो । मेला नं । दीयौ । पक्के ।
कुंडि ॥ २३ ॥

आठवां समय ४] पृथ्वीराजरासो । ३०३
मुद्दलराय का पत्तोत्तर देकर सोमेस्वर और पृथ्वीराज
दोनो से लड़ाई मांगना ॥
साटक ॥ स्वस्ति श्री सउमेस राजन बरं । प्रिथ्राज राजं बरं ॥
तो पत्तं सुनि अन्न कग्गद बरं । पल्यंज आकृतयं ॥
जाजा भंजन सेन साहस रने । प्रातं प्रतं जुद्धयं ॥
नां किज्जै तिन टाम पचिय घरं । छिभ्या किमा कामनं ॥
छं० ॥ २४ ॥ रु० ॥ ११ ॥
सोमेस्वर का अपने लड़के के बध के विषय में संशय करना ॥
दूहा ॥ सिसु संसौ सम्ही फिख्यौ । उभय काम बध बीर ॥
जौ मुक्कै चिय अधम छत । तौ दल सद्धि सरीर ॥
॥छं० २५ ॥ रु० ॥ १२ ॥
और पृथिराज के पास मुद्दलराय के पत्र का संदेसा
भेजना और उसका रोस में आकर पिता के
पास रण में आ मिलना ॥
कवित्त ॥ छह भग्गा तिय पुच्छ । तात मुक्यौ संदेसं ॥
अरिन सयन संमुद्धौ । जुद्ध मंगन अंदेसं ॥
बाल कठिन कर ग्रह्यौ । भ्रम रखन पित कागर ॥
जु कछु अग्ग संभवै । सोइ किज्जै सुमंत नर ॥
चढि बाल वियोगन कंत अप । सो निस रख्यै राज सिसु ॥
सामंत दोह भय प्रात बर । चढि चल्ल्यौ संग्राम किसु ॥
छं० ॥ २६ ॥ रु० ॥ १३ ॥
कवित्त ॥ सुन्यौ राज प्रथिराज । तात मुक्यौ संदेसं ॥
भयौ रोस जाजुल्य । तुल्य पावक सुमिसं ॥
११ पाठान्तर-स्वस्तश्रो । सोमेस । प्रथीराज । प्रथिराज । तो । श्रवन । पलपंच । पल्यंन ।
प्रात । प्रातं । नां । किजै । ठाम । पिञ्जिय । छिमया ॥
१२ पाठान्तर-दोहरा । संह्री । पर्यौ । उभै । मुकै ॥
१३ पाठान्तर-भगा । पुछ । पुद्धि । मुक्यो । संदेस । अरिय । सैनं । अंदेस । रखन । यु ।
आप । निशि । रख्यो । राजें । सामंत । राज बर । चढे । चल्पो । संगाम ॥

३७४ | पृथ्वीराजरासो । | [ सातवां समय ६
कवन षत्त कूह तत्त । मत्त बंधौ अरि गेहं
मक्खिम जुद्ध चिन मुझ्झ । करे नह सेष रनेहं ॥
बुल्लाइ अप्प भर अप्प सँग । चढि चल्यौ निसि चय्य सह ॥
पत्तौ सुजाइ तिन ठाम तब । सुष्ष सयन सोमेस सह ॥
छंदं ॥ २७ ॥ छ० ॥ १४ ॥
पृथ्वीराज का पिता के पास पहुंच कर सब सेना को सोते
हुए पाना और सोमेस का उससे न बोलना ॥
गाथा ॥ पत्तौ पहु ढिग तातं । दिष्यौ सोतय्य सब्ब सेनायं ॥
न बुल्यौ सोमेसं । पृथिराजं मिष्टयं बैनं ॥ छं० ॥ २८ ॥ रू० ॥ १५ ॥
उसका पिता को निद्रा में और शत्रु की सेना को
देख भाल कर उत्तापित होना ॥
अरिल्ल ॥ मच्चा तेज तन जग्गिय बीरं । तात दिषि निद्रा घन श्रीरं ॥
पहिलोइ अरि सेन सँपत्तिय । ज्यौं अरियं घन बीज पिवत्तिये ॥
छं० ॥ २९ ॥ रू० ॥ १६ ॥
और उस का शत्रु की सेना पर झपटना ॥
दूहा ॥ सयन कुंडि पति सयन सैं। झपल्लौ इन उन मान ॥
खीनर तीतर देखि कै । झपत्यौ जानि सिचांन ॥ छं० ॥ ३० ॥ ६० ॥ १७ ॥
पृथ्वीराज और मुद्दलराय का युद्ध ॥
कवित्त ॥ जनु कि सिंघ बण गज्जि । झपटि करि करनि जुथ्य पर ॥
जनु कि अंजनिस जात । पात दनु दिषि बुध्यबर ॥
जनु कि भीम भीमंडा । दंत हंतीय उखारन ॥
१४ पाठान्तर-सुन्या । पावक । करे । बुलाय । अप । आप संग । चल्यौ । निशि । ब्यमह । पत्तौ । ठांम सुप्र । सेंन । सोमेस जहां ॥
१५ पाठान्तर-सो सब्ज सच्छ सेनायं । तथ । सब । नहं । बुल्यौ । पृथीराजं ॥
१६ पाठान्तर-बीर । दिषि । निंद्रा घट श्रीर । पहिलौ । अरि । संपतिय संपत्तिय । पिवंत्तिय ॥
१७ पाठान्तर-सेंन कुंडि पति सेंन सो । उनमांन । लीनेर । जांनि ।