पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५६ पृथ्वीराजरासो। [ सातवां समय २८
दूहा ॥ उत मंडोवर वीर कौं, इत संभरि वै राव ॥
दुअ लग्गा अस रार जुध, सुकवि चंद करि कावं ॥
छं० ॥ १३८ ॥ रू० ॥ ८१ ॥
छंद भुजंगी ॥ सलुथ्यं सलुथ्यं अलुथ्यं तिलुथ्यं । इयानं उषानं समानं पलत्थं ॥
हयगं रथंगं धरं धार तुहैं । धरं धार धीरं मघा वीर लुहै ॥
छं० ॥ १३६ ॥
छबकै रुधिंगा प्रवाहं सिरज्जं । धरं घाम चापं रनं केन रज्जं ।
भनकंतं भेरी चिक्कारैं सुछथ्यी । नचैं रंग भैरूं ततय्ये ततय्यी ॥
छं० ॥ १४० ॥
प्रचारं सुदंती सुअंती अलुभकं । अलुझैं सुदंती उड़ैं किंक झुलकं ॥
मनं झारते जान हेभं हयनं । परज्वाल तुहैं तनंजा विननं ॥
छं ॥ १४१ ॥ रू० ॥ ८२ ॥
लोहाना आजानु बाहु के युद्ध का वर्णन ॥
कवित्त ॥ लोहानौ आजानं । बांह लंबी पसारै ॥
लंबी बांच पसारि । तेग खंबी उब्भारै ॥
उब्भारै विब्भार । बीर बाधै बद्धाली ॥
अद्धाली अर बद्धि । कंध सोहैं सुद्धाली ॥
सुद्धाल कंध विव षंड धुअ । विधि ओपम कवि चंद कहि ॥
आउत्त घत्त आजान भुअ । मनु कजल कोटक विज लहि ॥
छं० ॥ १४२ ॥ रू० ॥ ८३ ॥
८१ पाठान्तर-कौं । दोउन के असराल युद्ध । सो चंद करीय सु काब ॥
८२ पाठान्तर--अलुथं सलुथं । सलुथं सलोथं । अलुथं तिलुथं । उयानं । पलथं । हयं
गंरथं । तुहैं । लुहैं ॥ १३६ ॥ पलकैं । रुधिजा । प्रबाहं । कंन । भनकंत । चिकारे । सुहथी ।
नचै । भैरौं । ततथे । ततथी ॥ १४० ॥ अलुभं । अरुझैं सुदंती । अलुझंत । उड्डे । झुकं । हयनं ।
गयनं । परै । तुटें ॥ १४ ॥
८३ पाठान्तर-आजान । वाह । पसारे । उभारै । उभारै । विभार । बढाली । वढाली ।
अरिकट्टि । सोहैहैं । सुढाली । सुढालि । पंघ किक्कि षंड हुअ । उपम । आवत । छत आजानु ।
मनौं । मनौ ॥