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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 370, कुल 470 में से

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पृष्ठ 370

३६० पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय ३२
कवित्त ॥ नाहर नाहर राव । कन्हर नाहर सुकन्ह कर ॥
दिठ्ठ दिठ्ठ अंकुरिय । अरिय विस जांनु बिखद्दर ॥
उमसि कन्ह असिरीस । सीस चुकि परिय बांम भुज ॥
पुनि उक्कुटि परिच्छार । सार सिर कन्ह टोप धुज ॥
लग्गे सुटोप उड्डिय किरच । बढ़त धार उन संग बचि ॥
जैजया सद् जुग्गिन करचि । दुअन जुद्ध अदभूत सचि ॥
छं० ॥ १५७ ॥ छ० ॥ ८४ ॥
डारि कंन्द तरवारि । कट्ठि जम दढ़ मिल्यै चिय ॥
सचि जुद्ध दूत बीच । धप्प भतीज दिषि निय ॥
गचि सुसिष्ष पुठि आइ । घाइ जम दढ़ कियै तिय ॥
छंडि प्रान परिच्छार । परे पाल्हन ऊपर जिय ॥
गचि रोस नंपि नर भूमि पर । अनि अनियारिय उभय कसि ॥
तिन अनत घाय घुंमत झुमत । गयौ निठ्ठि नाहर निकास ॥
छं० ॥ १५८ ॥ रु० ॥ ८५ ॥
बर नाहर जिम लखै । गयौ नाहर जिम नाहर ॥
घाव घट घन घुंसि । झुंसि निक्कसिय बल नाहर ॥
कन्ह कंक किय नन्द । बंक भर भूमि पछारिय ॥
जनु कि लँगूरह लंक । तोरि बारा धर डारिय ॥
सादान बज्जि रन रज्जि सच । तत्त सु सस्थरकत करिय ॥
सोमेस सूर चहुआन सुअ । कित्ति चंद कंदच धरिय ॥
छं० ॥ १५९ ॥ रु० ॥ ८६ ॥
८४ पाठान्तर-कंन्द। दिठ दिठ। जांनि । परीय। बांम । फुनि । उक्कंटि । उकुटि । कन्द ।
उडिय । सबद । जुगिन ॥
८५ पाठान्तर- कन्ह । जमदठ । मचि । जुध । वीचि । धपि । भतीज । दिषिनीय ।
सिषि । पुष्ठि । जमदठ । प्रांन । पल्हन । उपर । अनिथारीय । निठि ॥
८६ पाठान्तर-घट । धूमि । भूमि । नन्ह । भूमि । लंगूरह । डारीय । सादांन । ब्रजि ।
रजि । सथ । करीय । चहुवांन । चहुवांन । सुय । कंदहि ॥