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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

१६ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
॥ चंद की स्त्री अपने पति से अष्टादश पुराणों की
अनुक्रमणिका पूछती है ॥
दूहा ॥ सुनत काव्य कवि चंद कौ । चित आनन्दी नारि ॥
तुम वानी बानी प्रसन । हसन हुवंत निवारि ॥
छं० ॥ २९ ॥ रु० ॥ १२ ॥
कवित्त ॥ कहै कंति मतिवंत । तंत रसना रस सागर ॥
तुम गुन श्रवन सुहंत । जानि चमकंत कलाधर ॥
तुम देवी वरदान । दान दीजै मुहि कब्बिय ॥
अष्टादसच पुरान । नाम परिसानह सब्बिय ॥
तुम कथत कथन आनन्द मुहि । अग्ग पच्छ भव सुद्धरै ॥
अग्यान तिमर नट्ठय सुनत । अध्य कमन्न चिय उड्डरै ॥
छं० ॥ ३० ॥ रु० ॥ १३ ॥
॥ चंद अष्टादश पुराणों की अनुक्रमणिका का कथन करता है ॥
पद्धरी ॥ ब्रह्मान्यदेव सम वासुदेव । अष्टदस पुरान तिन कहि सुभेव ॥
तिन कहैं नाम परिमान बन्न । जिन्न सुनत सुद्ध भव होत तन्न ॥ ३१ ॥
ब्रह्मच पुरान दस सहस जुद्दि । जिद्दि पढ़न सुनत तन तप्प छुद्दि ॥
पञ्चास पंच हजार गन्नि । पद्मच पुरान तिन कह्यौ बन्नि ॥ ३२ ॥
तेतीस सहस सैं चारि जानि । विष्णू पुरान विष्णू समानि ॥
साहब ने जो अरबी صبر सब्र शब्द होना अनुमान किया है वह अयुक्त है क्योंकि अरबी صبر सब्र
शब्द का अर्थ यहां सर्वरीत्या अघटित है किन्तु मानना चाहिये कि चंद ने हिन्दी सवरि शब्द का छंद
टूटने के कारण सबरि प्रयोग किया है और रासे की किसी २ पुस्तक में ऐसा पाठ भी मिलता है ।
जो इस शब्द को रकार और बकार के उलट पुलट लिखे जाने से सरब शब्द होना भी हम माने
तथापि यह कुछ असंगत नहीं है ॥
१२ इस में प्रसन्न शब्द का पाठ किसी २ पुस्तक में मिलता है परंतु यहां छंद टूटने के
कारण कवि ने प्रसन करके प्रयोग किया है ॥
१३ इस कवित्त के भिन्न २ पुस्तकों में जो यह पाठ मिलते हैं वे अयुक्त हैं जैसे:-कहे, वर,
दानि, पक्कू, नट्ठ, य, अंध्रक, और मल ॥
१४ इस रूपक के अशुद्ध पाठान्तर अन्य पुस्तकों में यह हैं:- अष्टादस, कहै, सभेव, बन्हिहो,
तवनि, तप्प, पंचास, पंचह, च्यारि, तिष्ण, अठार, भागवंत, तहां, तेईस, दुख, संपूर्, अग्नि, पठि
इग्यार, अच्छ, पछ, कूरभ, मन्छ, भक्ति, डरांन, सहंस, और नंस ॥
इस रूपक के ४१ वें छंद की एक तुक भाषा के कवि घटती बता कर चंद पर दोषा-
रोपण करते हैं परंतु यह उन की भूल है क्योंकि चंद ने इस छंद को एक ही तुक में कहा है

१८ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
॥ गाहा ॥ पय सव्वरी सुभत्तौ । एकंत्तौ कनय राय सोयंसी ॥
कर कंसी गुज्जरीय । रव्वरियं नैव जीवंति ॥
छं० ॥ ४३ ॥ रु० ॥ १६ ॥
सत्त खनै आवासं । मच्चिलानं मह सह नूपरया ॥
सतफल बज्जुज पयसा । पब्बरियं नैव चाखंति ॥
छं० ॥ ४४ ॥ रु० ॥ १७ ॥
रब्बरियं रस संदं । क्यूं पुज्जति साध अमियेन ॥
उकति जुगत्तिय ग्रंथं । नथिकत्थ कवि कत्थिय तेन ॥
छं० ॥ ४५ ॥ रु० ॥ १८ ॥
याते वसंत मासे । कोकिल झंकार अंब वन करयं ॥
बर बब्बूर विरषं । कपोतयं नैव कलयंति ॥
छं० ॥ ४६ ॥ रु० ॥ १९ ॥
सहसं किरन सुआज । उगि आदित्य गमय अंधारं ॥
खद्यं उमा न सारो । षोडसयं नैव खलकंति ॥
छं० ॥ ४७ ॥ रु० ॥ २० ॥
कज्जल मद्धि कस्तूरी । रानी रेहंत नयन श्रंगारं ॥
कां मसि घसि कुंभारी । किं नयने नैव अंजंति ॥
छं० ॥ ४८ ॥ रु० ॥ २१ ॥
ईस सीस असमानं । सुर सुरी सलिल तिष्ट नित्यनं ॥
पुनि गलत्ती पूजारा । गडुवा नैव ढालंति ॥
छं० ॥ ४९ ॥ रु० ॥ २२ ॥
१६–२२ गाहा छंद का लक्षण यह है :—
गाहा पहिले बारह । दूजै अठारहै कला राजै ॥
तीजै बारह धारहु । पंद्रह चौथे तहां छाजै ॥
इन गाहा छंदों में अशुद्ध पाठान्तर यह हैं :— सनफल, क्यूपने, बंबू, रवि, रब्धं, नतय, सुरीस, लिल, और फुनि ॥
बाईसमें गाहा के “ईस सीस असमानं” में जो असमानं शब्द है उस को जो मिस्टर जोन बीम्स साहब फारसी आसमान آسمان होना अनुमान करते हैं उस से मैं बिलकुल असममत् हूं ।
मैं इस को सं० असमानं, त्रि० (नास्ति समानो यस्य ।) अतुल्यं, विजातीयं, सजातीयाभिचं, का वाचक समझता हूं अर्थात् ईस = परमेश्वर का; सीस = शिर; असमानं = अतुल्य है ।

१. पृथ्वीराज का जन्म एवं बाल-चरित्र

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १६
॥ चंद उत्तापित होकर अपने को पूर्व-कवियों का दास होना,
उन की उक्ति को कहना और अपनी को बकना कहता है ॥
॥ दूहा ॥ कहां लगि लघुता वरनवौं । कविन दास कवि चंद ॥
उन कत्थि ते जो उब्बरी । सो बकहहिं करि छंद ॥
छं० ॥ ५० ॥ रू० ॥ २३ ॥
॥ चंद खलों का स्वभाव वर्णन कर के सुजनों के निमित्त
अपना काव्य रचन करना कहता है ॥
॥ दूहा ॥ सरस काव्य रचना रचौं । खल जन सुनि न हसंत ॥
जैसे सिंधुर देखि मग । स्वान सुभाव भुसंत ॥
छं० ॥ ५१ ॥ रू० ॥ २४ ॥
तौ पनि सुजन निमित्त गुन । रचिये तन मन फूल ॥
जूका भय जिय जानिकैं । क्यों डारिये दुकूल ॥
छं० ॥ ५२ ॥ रू० ॥ २५ ॥
॥ सरस्वती की स्तुति ॥
॥ साटक ॥ मुक्ताचार विचार सार सुबुधा, अबुधा बुधा गोपनी ॥
स्वेतं चीर सरीर नीर गहिरा, गौरी गिरा जोगनी ॥
बीना पानि सुवानि जानि दधिजा, हंसा रसा आसिनी ॥
लंबोजा चिहुरार भार जघना, विग्ना घना नासिनी ॥
छं० ॥ ५३ ॥ रू० ॥ २६ ॥
॥ गणेश की स्तुति ॥
कचंजा मद गंध राग रुचयं । अलिभूराच्छादिता ॥
गुंजा चार अधार सार गुनजा, झंझा पथा भासिता ॥
अग्रेजा श्रुति कुंडलं करि कर, खुहीर उद्धारयं ॥
सोयं पातु गनेस खेस सफलं, पृथाज काव्यं कृतं ॥
छं० ॥ ५४ ॥ रू० ॥ २७ ॥
२३-२५ इन में जो किसी २ पुस्तक में तेनो पाठ है वह अशुद्ध है । कवि चंद ने अपनी लघुता
वर्णन करते २ अंत को उत्तापित होकर जो यह दो दोहे ( २४ ॥ ५२ ॥ + २५ ॥ ५३) कहे हैं वह
इस महाकाव्य के पाठकों और खंडन करने वालों को ध्यान में रहने योग्य हैं ॥
२६-२७ इन रूपकों में यह अशुद्ध पाठान्तर हैं:- गोपनी, गिराजोगनी, सुवानी, दधि, जाहं,

२० पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
॥ गणपति की उत्पत्ति की कथा ॥
विराज ॥ रतं रत्त भारी । करुना बिचारी ॥
खियौ मात नक्खं । बियो संख लक्खं ॥ ५५ ॥
मिले एक दीहं । रमै काम सीहं ॥
इकं रिषि आयौ । दियौ काम चायौ ॥ ५६ ॥
खिज्यौ रिषि भारी । दियौ काम डारी ॥
भयौ पुच तब्बं । धजा मोद सब्बं ॥ ५७ ॥
सिरो माझधारी । गनेसं बिचारी ॥
खिजे तब्ब ईसं । भयौ रोम बीसं ॥ ५८ ॥
अबल्ला इकल्ली । वियौ पुर्ष झिल्ली ॥
उके डोर नहं । छन्यौ पुच बहं ॥ ५९ ॥
खिजी मात भारी । सरायं बिचारी ॥
करी जाकु ईसं । धस्यौ पुच सीसं ॥ ६० ॥
सवै कज्ज अग्गै । तुही नाम लग्गै ॥
कजानंद रूपं । गनेसं सधूपं ॥ ६१ ॥
इकं दंन्त दन्ती । विराजंत कंती ॥
सुभै दंत ऐसे । कविंदं प्रसंसै ॥ ६२ ॥
मनो भूमि धारी । बराहं उपारी ॥
इसी नट्ठ तेजं । कला सोम केजं ॥ ६३ ॥
नमो देव कहं । प्रजा ईस महं ॥
अखै भूत प्रेतं । तिजारी न घेतं ॥ ६४ ॥
सारसा, लंबी, जा; विघना, कचं, जा, मदं, अग्ने, जा, करः, स्यु, दीर, पृथ्रिराज, काव्य और कृते ।
इन में एक पृथीराज शब्द के स्थान में जो हमने पृथ्रिराज पाठ रक्खा है वह एक रासे की पुस्तक में है
और चंद का ऐसा प्रयोग देख कर राजपूताने और बृज की गामीण भाषाओं से परिचित विद्वानों
को कुछ आश्चर्य न होगा क्योंकि उनों ने ऐसे ही गजराज के स्थान में गज्ज्राज बोलते और लिखते
लोगों को देखे और सुने होंगे । यह चंद की हिन्दी के देशी प्रसिद्ध नामक भेद का उदाहरण है ॥
२८ अन्य पुस्तकों में पाठान्तर यह हैं:—करुना, सात, नष्व, दियो, रिषि, अबल्लाइ, कल्ली,
पुरुष, डोरं, धंधा, तुहि, दट्ठ, दैहै, देह, भगतं, लछी, लच्छी अर्थ, नयं, समती, पती, धरे,
त्रिलोक और ईसा । इस रूपक के छंद का नाम चंद ने विराज कहा है परंतु उस का नामान्तर
संखा नारी और उस का लक्षण यह है:—

इकं दीह एकं । दुती दीह मेकं ॥
भगत्तं सुचक्की । दियो नच्चि वक्की ॥ ६५ ॥
इकं चोख अघ्यं । करै नाक नघ्यं ॥
सुभक्ती समत्ती । जलं माचि पत्ती ॥ ६६ ॥
धरै आक सीसं । त्रिलोकेस ईसं ॥
चयं वेद जक्की । प्रियं चंद भक्की ॥ छं० ॥ ६७ ॥ रू० ॥ २८ ॥
॥ संकर की स्तुति ॥
दूहा ॥ नमस्कार संकर कियौ । सरसैं वुधि कवि चंद ॥
सति लंपट लंपट नवी । अबुधि मंच सिसु इंद ॥
छं० ॥ ६८ ॥ रू० ॥ २९ ॥
साधन भोग संयोग रजि । मंडन आव अखूट ॥
नमो उमा उर आभरन । जय बंधन जट जूट ॥
छं० ॥ ६९ ॥ रू० ॥ ३० ॥
विराज ॥ जटा जूट वंदं । लिलाटंत चंदं ॥
विराजंत इंदं । भुजंगी गविंदं ॥ ७० ॥
शिरो माल इंदं । गिरीजा अनंदं ॥
सिरै सिंधु नहं । रनैं वीर महं ॥ ७१ ॥
करी चर्म सहं । करं काल खहं ॥
उनैं गंग चहं । चखी अग्गि दहं ॥ ७२ ॥
प्रलै जानि जहं । जयो जोग सहं ॥
घटा जानि भहं । जरै काम तहं ॥ ७३ ॥
हरै चाचि वहं । रचै मोछ कहं ॥
बचै दूरि दहं । नटे भेख रहं ॥ ७४ ॥
नमो ईस इंदं । बदै भद्द चंदं ॥
छं० ॥ ७५ ॥ रू० ॥ ३१ ॥
कई वर्ण वारो । यगन्नै दुधारो ॥
रचो पाव चारी । करो संखनारी ॥ श्रीधर कवि कृत पिंगल ॥
३० पाठान्तरः — सरसै । सती । संजोग ॥
३१ पाठान्तरः — गिरिजा । रनै । वीर । खहुं । गंगहद्दं । हद्दं । सद्दं ॥. इस रूपक का छंद ७५
चंद की संस्कृत काव्य-सम-श्लोकार्द्ध शैली का दूसरा उदाहरण है। देखो टिप्पण १४ को ॥

२२ पृथ्वीराजरासौ। [आदि पर्व
दूहा ॥ करियै भक्ति कवि चंद हर । हरि जंपिय इह भाइ ॥
ईस स्याम जू जू कहै । नरक परंतच जाइ ॥
छं० ॥ ७६ ॥ रू० ॥ ३२ ॥
श्लोक ॥ परात्परतरं यांति । नारायण परायणं ॥
न ते तत्र गमिष्यंति । ये दुष्यंति महेश्वरं ॥
छं० ॥ ७७ ॥ रू० ॥ ३३ ॥
साटक ॥ गंगाया अगुलत्त वसनं मसनं, लच्छी उमा दोवरं ॥
संख्ं भूत कपाल माल असितं, वैजंति माला धरी ॥
चर्म मद्य विभूति भूतिक युगं, विभूति साया क्रमं ॥
पापं विचरति मुक्ति अप्पन वियं, बीयं वरं देवयं ॥
छं० ॥ ७८ ॥ रू० ॥ ३४ ॥
॥ कवि की आशा का स्वरूप वर्णन ॥
गाहा ॥ आसा मच्चीव कव्बी । नवनववित्तीय संग्रहं ग्रंथं ॥
सागर सरिस तरंगी । वोहत्थयं उत्थियं चञ्चयं ॥
छं० ॥ ७९ ॥ रू० ॥ ३५ ॥
॥ चंद का काव्य समुद्र कैसा है ॥
दूहा ॥ काव्य समुद्र कवि चंद कृत । सुगति समप्पन ग्यान ॥
राजनीति बोहिथ सुफल । पार उतारन यान ॥
छं० ॥ ८० ॥ रू० ॥ ३६ ॥
छंद प्रबंध कवित्त जति । साटक गाह दुहत्थ ॥
लघु गुर मंडित खंडिय, छ । पिंगल अमर भरत्थ ॥
छं० ॥ ८१ ॥ रू० ॥ ३७ ॥
३२ पाठान्तरः - करिये ।
३३ पाठान्तरः - यांति । ज्ञे । यह श्लोक चंद के शुद्ध संस्कृत काव्य रचन का प्रथम उदाहरण है ॥
३४ पाठान्तरः - अगुलत्त । वसनमसनं । लछी । कपालमाल । चमभूतिकयुगं । मायाक्रमं ।
मुक्तिं । वरंदेवयं ॥
३५ पाठान्तरः - क्रित्ती ॥
३६ पाठान्तरः - ग्यांन । यांन ।
३७ पाठान्तरः - भरत्य ।

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । २३
॥ कोई अशुद्ध पढ़ने वाला चंद को काव्य-संबन्धि दोष न दे ॥
कवित्त ॥ अति ढंक्यौ न उघार । सलिल जिमि छिप्पि सिवालह ॥
वरन वरन सोभंत । चार चतुरंग विसानह ॥
विमल अमल वानी विसाल । वयन वानी वर अंनन ॥
उक्तिन वयन विनोद । जोइ स्रोतन सन अंनन ॥
युत अयुत जुक्ति विचार विधि । वयन छंद हुक्यौ न कछ ॥
घटि बढ़ि मति कोई पढ़इ । तौ चंद दोस दिज्जो न वह ॥
छं० ॥ ८२ ॥ रू० ॥ ३८ ॥
॥ इस ग्रंथ में चंद ने क्या २ कथन किया है ॥
श्लोक ॥ उक्ति धर्मे विशालस्य । राजनीति नवं रसं ॥
षट् भाषा पुराणं च । कुरानं कथितं मया ॥
छं० ॥ ८३ ॥ रू० ॥ ३६ ॥
॥ रासे को रसिया सरस उच्चारैं ॥
कवित्त ॥ चरन नीम अच्छिर सुरंग । पाट बहु गुरु विधि संडिय ॥
सुर विकास जारी सु मुष्प । उक्ति रस गौरव नि छंडिय ॥
जुगति छोह विस्तारिय । सीढियन घाट सु बहिय ॥
मछि मंडन सेधान । याहि संडन जस सहिय ॥
३८ पाठान्तरः - पिप्पि । विशाल । विच्चार । पढई । दिज्जो । दिन्नै ।
३९-कवि का यह संस्कृत श्लोक हमारे पाठकों के सदा ध्यान में रखने योग्य है इस के सूक्ष्म
विचार से हम जान सक्ते हैं कि पटभाषा और कुरान की भाषा के जो २ शब्द इस महाकाव्य
में प्रयोग हुए हम देखते हैं वह कवि ने जानकर प्रयोग किये हैं और कुरान की भाषा के
शब्दों के प्रयोग का विषय कोई आश्चर्यदायक भी नहीं है क्योंकि मुसलमानों का प्रवेश भरत-
खंड में शहाबुद्दीन गोरी के बहुत ही पहिले हो गया है । इस के अतिरिक्त हम को यह भी
निश्चय मानना चाहिये कि चंद संस्कृत भाषा में निपुण था और षट्भाषा और कुरान की
भाषा से भी अपरिचित नहीं था और जो २ छंद इस महाकाव्य में संस्कृत भाषा में लिखे हमारे
दृष्टि आते हैं वह उस की संस्कृत-काव्य-रचन शक्ति के उदाहरण रूप हैं । यह श्लोक चंद के
माने हुए पिंगल छंद सूत्रम् के अनुसार लौकिक अनुष्टुप अर्थात् अष्टात्तर पद छंद है । इस
रूपक के विशेष पाठान्तर अन्य पुस्तकों में दृष्टि नहीं आते किन्तु केवल विशालं के स्थान में
विसालं और पुराणं के स्थान में पुरानं पाठ हैं ॥
४० पाठान्तरः-अछिर । सुरंग । समुष्पं । मुप्प । गैपिंत । सिढियन । मेधान । याहि ।
चित्ररंग । विश्वकर्म कर्म । उच्चारिय ॥

२४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
.घन तर्क उतर्क वितर्क जति । चिच रंग करि करि. अनुसरिय ॥
विश्वकर्म कवि निर्मेइय । रसियं सरस उच्चरिय ॥
॥ छं० ॥ ८४ ॥ रू० ॥ ४० ॥
॥ रासे का तत्त्वज्ञान कैसे होगा ॥
अरिल्ल ॥ तर्क वितर्क उतर्क सु जत्तिय । राज सभा सुभ आसन अत्तिय ॥
कवि आदर सादर बुध चाचौ । पढ़ि करि गुन रासौ निर्बाचौ ॥
॥ छं० ॥ ८५ ॥ रू० ॥ ४१ ॥
धर्म्म अधर्म्म न बुद्धि बिचारौ । नयन नारि नियन नेह निचारौ ॥
कोक कला कज केलि प्रकासौ । अरथ करौ गुन रासौ भासौ ॥
॥ छं० ॥ ८६ ॥ रू० ॥ ४२ ॥
पारासर जो पुत्त विचासद्द ॥ सतवंती ग्रब्भं गुर भासद्द ॥
प्रब्ब अठार सवा लष लष्यै । तौ भारथ गुर तत्त विसष्यै ॥
॥ छं० ॥ ८७ ॥ रू० ॥ ४३ ॥
॥ जो रासे को सुगुरु से पढता है वह कुमति नहीं दरसाता ॥
कवित्त ॥ रासौ बर बुद्धि सिद्धि । सुद्धि सो सब्व प्रमानिय ॥
राजनीति पाइयै । ग्यान पाइयै सु जानिय ॥
उकति जुगति पाइयै । अरथ घटि वढि उन मानिय ॥
या समान गुन आप । देव नर नाग बखाणिय ॥
अंविभ्रत भंत व्रतच गुनित । गुन चिक्कण सरसइय ॥
जो पढ़य तत्त रासौ सुगुर । कुमति मति नहिं दरसइय ॥
॥ छं० ॥ ८८ ॥ रू० ॥ ४४ ॥
४१-४३-इस रूपक के छंद का नाम कवि ने अरिल्ल प्रयोग किया है कि जिस का
लक्षण यह है :-
॥ अरिल्ल ॥ लघु दीरघ को नेम न कीजै । ऐसे ही तुक चार भरीजै ॥
षोडश कला कली बिच धारै । छंद अरिल्ला शेष उच्चारै ॥
पाठान्तर :- सुजतिय । मतिय । पढ़ि शब्द के पहिले तौ शब्द का पाठ पुस्तकान्तर में
विशेष है । पटि । नारिनिय । कौक । कंन्नाकल । अरथ शब्द के पहिले तौ शब्द किसी २ पुस्तक
में विशेष है । ग्रभं । लख । लखै । नारथ ॥
४४ पाठान्तर :- राज । नीति । पाईयै । उक्ति । पांइयै । पांईयै । उन । मांनियं । व्रतह ।
सरसइय शब्द के पहिले किसी २ पुस्तक में मध्य शब्द का विशेष पाठ है । सरसईयं । दरसईयं ॥

आदि पर्व ] . पृथ्वीराजरासो । २५
॥ रासा किस को अच्छा और किस को बुरा प्रतीत होता है ॥
दूहा ॥ कुमति मति दरसंत तिहिं । बिधि बिना न अव्वान ॥
तिहिं रासौ जु पवित्र गुन । सरसौ बन्न रसान ॥
॥ छं० ॥ ८९ ॥ रु० ॥ ४५ ॥
॥ इस ग्रंथ के काव्य की संख्या का कथन ॥
दूहा ॥ सत सहस नष सिष सरस । संकल आदि मुनि दिष्य ॥
घट बढ मत कोऊ पढौ। मोहि दूसनं नवसिष्य ॥ छं० ॥ ९० ॥ रु० ॥ ४६ ॥
॥ रासे के ढँके हुए अर्थ के विषय में कवि का कथन ॥
गाहा ॥ अरथं ढंकिन सहसा । उघारै वनत्थि एकलया ॥
मभझं मभझ प्रमानं । चतुर स्त्री चारयं जेमं ॥ छं० ॥ ९१ ॥ रु० ॥ ४७॥
॥ इस ग्रंथ के विष का संक्षेप कथन ॥
कवित्त ॥ दानव कुल छत्रीय । नाम ढुंढा रष्स वर ॥
तिहिं सु जोत प्रथिराज । सूर सामंत अस्ति भर ॥
जीह जोति कवि चंद । रूप संजोगि भोगि श्रम ॥
इक्क दीह उपन्न । इक्कं दोहै समाय क्रम ॥
जथ कत्थ तथ्य होइ निर्मये । जोग भोग राजन खत्तिय ॥
बज्रंग बाहु अरि दल मलन । तासु कित्ति चंदह कत्तिय ॥
॥ छं० ॥ ९२ ॥ रु० ॥ ४८ ॥
अरिल्ल ॥ प्रथम राज चहुवांन पिथ्य वर । राजधान रंजे जंगल धर ॥
मुष सू भट सूर सामंत दर । जिन्हि बंध्यो सुरतांन प्रान भर ॥
॥ छं० ॥ ९४ ॥ रु० ॥ ४९ ॥
४५ पाठांतर:-दरसंन । तिहि । तिहि । रसानं ॥
४६ पाठांतरः-कोऊ ॥ इस में “सत सहस” से कवि एक लाख की ग्रंथ संख्या बताता
है और यह भी कहता है कि घटं बढं पठ करके मुझे दोष मत देना । कोई २ कवि जो यहां
सत शब्द से सात का अर्थ अनुमान करते हैं वह मेरी सम्मति में अयुक्त प्रतीत होता है ॥
४७ पाठांतरः-ढकिनं । नवत्थियं । मझ । मझ ।-
४८-५० पाठांतरः-रष्षसं । तिहि । जिह । संजोगी । भोगी । उपन्ने । जोगराज । नाल-
हिय । बज्रंगबाँहुं । अरि दलं मलनं । कुत्तीं । चंदं ॥ ४७ ॥ सुर ॥ ४८ ॥ मित्त । बंधो । कित्ति ।
अष्यो । तिथि ॥ ४९ ॥

२६ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
अरिल्ल ॥ हं कवि चंद मित्त खेवच पर । अरु सुचित सामंत सूर बर ॥
बंधौं कित्ति प्रसार सार सच । अछ्छों बरनि भंति थित्ति थह ॥
॥ छं० ॥ ९४ ॥ रू० ॥ ५० ॥
॥ राजा परीक्षित की तक्षक दंशन और जन्मेजय की
सर्पसत्र कथा ॥
हनुफाल ॥ इति हनूफालय छंद । कल बरनि बरनि सुकंद ॥
नहि नाल पिंगल जोर । दुज हुंतो दुजनिय भोर ॥ ९४ ॥
संसार बंधन दोय । इक पर्यौ विद्य समाय ॥
तन देहू अच्छर एक । नहिं पिंग पिंगल सेक ॥ ९५ ॥
किचि काज मरन सुविप्प । लहि नाग रूप सु अप्प ॥
हरि हस्यौ बाचन आइ । तिहिं कह्यो पिंगल चाइ ॥ ९६ ॥
द्वै विद्य रूप सु अङ्ग । खो गयौ छल करि सङ्ग ॥
खो तच्छ बीर प्रमान । जुग जुगनि निश्चल ध्यान ॥ ९७ ॥
इक हुंतो सिंगिय रिष्य । तप करै बाल विसिष्य ॥
नृप गयौ बर आखेट । दिषि अप्य मृतक बेट ॥ ९८ ॥
बाराह रूप प्रमान । लग्गयौ सु ब्रह्म धियान ॥
दह बार बूझ्यौ राज । दुज दिय न उत्तर काज ॥ ९९ ॥
लखि चित्त विच सपूत । यां भयो रिष अवधूत ॥
रूंध्यो ताम तामस राज । लियो गीन मंच विराज ॥ १०० ॥
कस्सान कोनक्क संधि । नृपराज दुज गलबंधि ॥
फिरि गयो ग्रेह प्रमान । आयो सु बालक थान ॥ १०१ ॥
५० दृष्टि में रखने की बात है, जैसे महाभारतादि महापुराणों में समग्र ग्रंथ के आशय का सार
एक अथवा दो अथवा तीन अथवा चार श्लोकों में वर्णन किया गया है वैसे ही चंद ने भी अपने
इस महाकाव्य का सार इन ( ४८ से ५० तक ) तीन रूपकों में वर्णन किया है ॥
५१ पाठान्तरः-हनुफाल । हनूफाल । विह्यस । मोय । न । न । अच्छर । हर्यो । तिहिं । चायि ।
द्वे । तंछ्य । जुगिंनि । हुंतो । रीष्य । बालवि । सिष्य । बुझ्यौ । दियऊ । चित्र । चित्रस । कोनक्क ।
नवि । तुल्लि । तिहिं । अति लोल दिषि रिषि लोड । लोई । समोई ॥
हमारे पाठकों को ध्यान में रखना चाहिये कि चंद कवि ने इस कथा को महाभारत के
आदि पर्व के अध्याय ४० से ५८ तक और भागवत के पहिले स्कंध के अध्याय १८ और १६ और
दूसरे स्कंध के पहिले १ अध्याय से उद्धृत और संक्षिप्त करके वर्णन कियो है । यदि कोई इस कथा

आदि पर्व ] . पृथ्वीराजरासौ । २६
खिजि कच्चौ नैन भरीव । तस नाम रूप सरीव ॥
पै जुन्न बालक बुद्धि । गलि गर्भ क्यौं न वितुद्धि ॥ १०२ ॥
तिच्छि तजिय तात ह्मान । धरि कोप अंग निधान ॥
करि क्रोध अंखि सुरत्त । छविजानि लग्गिय लत्त ॥ १०३ ॥
जिहि जियत पुच्च अप्प । को तांत लब्भय दप्प ॥
रिस करौं जोब प्रमान । जरै तीन लोक अमान ॥ १०४ ॥
रिस तेज कंपत बाल । दिप्यो सु तात विसाल ॥
वह लग्गि ब्रह्म धियान । भयौ कोटि तामस नाम ॥ १०५ ॥
अति ना रत्न दिखि रिखि लोइ । दिख्या सु तात समोइ ॥
छं० ॥ १०६ ॥ रू० ॥ ५१ ॥
कवित्त ॥ जोरि हत्थ थुति संच । फिर्यो पर दच्छि लग्गि पथ ॥
रुधिर नयन आरक्त । कंठ लग्ग्यौ सु मुक्ति भय ॥
भूत द्वार वीभार । गाजि आये सुत मग्गं ॥
भर भर भर उच्चार । रोस दावा नल लग्गं ॥
जिहि चच्चौ अप्प मो तात गर । गनिव सत्त दिन में प्रमति ॥
जो हत्यो अप्प तक्षक सुन्नत । कै काया अन्न सुगति ॥
छं० ॥ १०७ ॥ रू० ॥ ५२ ॥
साटक ॥ धंन्यो धंन्य सु बाल तापन तपं । बालं वलं विव्हलं ॥
सोयं पुच कि सोस दोस चि विधं । वानीय गद् गद् गलं ॥
एवं भूप विसाल भूमि भरतं । धर्मं धरा राजनं ॥
तं तेजं नवि चोर व्याघ्र विघनं । नैवापि संतापयं ॥
छं० ॥ १०८ ॥ रू० ॥ ५३ ॥
और चंद के काव्य को उक्त भारत औ भागवत से मिलाकर सूक्ष्म विचार कर देखे तो वह निः-
संदेह यह अनुमान कर सक्ता है कि चंद संस्कृत भाषा अच्छी जानता था और यह बड़े बड़े ग्रंथ
भी उस के पढ़े हुए थे क्योंकि चंद के कोई २ छंद उक्त ग्रंथों के श्लोकों के ठीक अनुवाद प्रतीत
होते हैं । इस हनूफाल छंद के चारों पाद बारह २ मात्रा के होते हैं ॥
५२ पाठान्तरः-फिर्र्यौ । लग्यौ । विभार । जाजि । आइय । आईय । हत्यो । प्रमत्ति । प्रमित्त ।
कैकाया । सुयति ॥
५३ पाठान्तरः-धन्यौ धन्य । तनं । बाल । भरनं । तेजंन । विचोर । विघन ॥

२८ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
दत्वा आप मिदं श्रुतं गुरु वरं । मृत्यं च राजा नयं ॥
सत्यँ संप्त दिनानि पानि पवरं । नैवं चलते पयं ॥
त्वं आपं चय लोक जाखति बरं । भुंजे वरं पुचयं ॥
एकँ दीछ सुतप्य प्रापति पदं । त्रैलोकयं चासयं ॥
छं० ॥ १०८ ॥ रू० ॥ ५४ ॥
दूहा ॥ सब रिखि सँ सो पुच तू । वय दिक्खौ परमान ॥
मानहु डम्बर सें उदै । बढति कला बर भान ॥
छं० ॥ ११० ॥ रू० ॥ ५५ ॥
कवित्त ॥ पुच कंठि रिखिराज । जाइ नृप थान सु वत्तौ ॥
पंथ कुज्जह संगह्यौ । रिषि आपान विरत्तौ ॥
अति सु दीन सिर नोच । ऊंच नहिं भाल उचाइय ॥
दिष्टि दिष्ट राजन चरित्त । मंगन नृप आइय ॥
एकांग एक जोगिन्द्र वर । धातु न बंधे हथ्थ पर ॥
करि काज रिखि आयौ घरहि । उरच धरइर लग्ग डर ॥
छं० ॥ १११ ॥ रू० ५६ ॥
गाहा ॥ जो जंप्यो रिष पुत्तं । प्रलयं होइ सत्तियं कालं ॥
जं आवडू तं भ्रंमं । सो किज्जै राजनं बज्जयं ॥
॥ छं० ॥ ११२ ॥ रू० ॥ ५७ ॥
चोटक ॥ नृप कंठि प्रजंक प्रजंक पला । मुहु मुंदिरु भानक मोद कला ॥
नृप दीन छल्यौ बहु चित्त चितं । सुछल्या जनु पोनय पीप पतं ॥
॥ छं० ॥ ११३ ॥
पतनं गुर जानि चरन्न लग्यौ । बहुश्यां रिषिराज सु प्रान दग्ग्यौ ॥
॥ छं० ॥ ११४ ॥ रू० ॥ ५८ ॥
५४ पाठान्तरः- म्रतंच । मृत्यंच । पानिपहरं । पय । आप हूलाति । तैलाकयं ॥
५५ पाठान्तरः-मै । मे । तूं । परसान । संवत् १६४७ की पुस्तक में हमारा लिखा पाठ है
और इतर पुस्तकों में "मानहु इंदौ वर उदै" है ॥
५६ पाठान्तरः-जाय । संपत्तौ । आपन । ऊंच । नह । नहि । द्रिष्ट । वप । आईय ।
जोगिन्द । हथ । किंहि । घरह । उर । घर । अहुर । र्जागग ॥
५७ पाठान्तर :-झो । झंप्यों । पुत्रं । भावै । भाव । इतं । जो । कीजै ॥
५८ पाठान्तरः-चिप । वप । फला । दला । मुहुमंदिरू । भान । कमोद । न्रंप । बहुचित ।
जुनु । पोनय । बहुयौं । किसी पुस्तक में सु शब्द नहीं है ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । २६
गाहा ॥ मनो रिपि छह्यं प्रानं । बल्लीकं जीवनं गुरयं ॥
जो फल लग्यौ पच्छ । तौ कालं रिप खो वरयं ॥
॥ छं० ॥ ११५ ॥ रू० ॥ ५८ ॥
दूहा ॥ दूय चिंतय रिषि राज गुर । पुच्छिय अन रिष राज ॥
द्यौं उधार होइ आप वर । कहो कृपा करि आज ॥
॥ छं० ॥ ११६ ॥ रू० ॥ ६० ॥
कवित्त ॥ मद संडी इक पुरुष । निसा भइव अध रत्ती ॥
वरंगना अंगने । डस्यौ अच्चि परत धरत्ती ॥
सुरापान आसिष्य । गयौ करहुं तव छुद्दिय ॥
उच्चारन चा राम । जाय वैकुंठ सु ठहिय ॥
परताप नाम सद गति भइय । कीर कहत परिषत्त सम ॥
भागवत्त सुनच्चि जो इक्क चित । तौ सराप छुद्दय अक्रम ॥
॥ छं० ॥ ११७ ॥ रू० ॥ ६१ ॥
ज दिन आप तुच्चि भयौ । त दिन परिखोक घर घघर ॥
पसू पंषि जन्र खंडि । कुंडि मुनिवर समाधि उर ॥
कुंडि चक्र घरि रष्षि । कूप तूं मात परिष्षत ॥
पंडव वंस प्रतष्ष । तषत भ्रम धारी दिप्पत ॥
अचरिज्ज कहा तुम उद्धरन । होइ प्रसन सुकदेव कहि ॥
दिन सत्त अवधि अंतर बहुत । धरि सु उद्धरै छिनक महि ॥
॥ छं० ॥ ११८ ॥ रू० ॥ ६२ ॥
धरनि रूप करि धेन । भ्रम्स वछरा संग लीयै ॥
झारषंड महि चरत । देषि कलिजुग कुपि चीयै ॥
चरन तीन भद्धांत । प्रजा सब आय पुकारिय ॥
चढि करि तें नृपराज । बद्ध्य परि ताच्चि बक्कारिय ॥
५८ पाठान्तर :- प्रान । वलीकं । लगौ । पछू । पछं । तो ॥ इस के छंद का नाम सं० १६४७ की पुस्तक में गाथा है ॥
६० पाठान्तर :-चिंतन । रिपिराज । पुछिय । होय । आप ॥
६१-६३-यह तीन रूपक सं० १७१० और सं० १६४७ की पुस्तक के अतिरिक्त उस से पीछे की जितनी पुस्तक अब तक मेरे देखने में आई हैं उन सब में हैं परन्तु जब तक उन से भी पहिले की पुस्तकें न प्राप्त हों तब तक इन रूपकों को हम निश्चय रूप से क्षेपक नहीं कह सक्ते । इन को

३० पृथ्वीराजरासौ। [ आदि पर्व
कित्ति कीर अंग लग्गौ परस। तिहि कारन इह उपजिय॥
आषेट जाय पन्नग मृतक। सिंगी, गर घत्तिय, षिज्ञिय॥
॥ छं०॥ ११८॥ रू०॥ ६३॥
तोटक॥ इति चोटक छंद सुसंत गुरं। दिन सात पळ्यौ हरि गंग कुरं॥
त्रितकाल विकालह चित्त धरं। क्खित पत्त छिमा पिवु लाइ भरं॥
॥ छं०॥ १२०॥
नृपराज परीक्षत तत्त गुरं। धरि ध्यान कह्यौ बदळीष धरं॥
जून काल सु तप्पय देव नरं। नृप ग्यान सुन्यौ वपु व्यास वरं॥
॥ छं०॥ १२१॥ रू०॥ ६४॥
साटक॥ या विद्या बदळीत राजन गुरं। आपो रिषं तारयं॥
पून्यं राज सु इन्द्र धारन घरं। विद्या अमारा पुरं॥
अभ्भोयं सुधनं तु मातुळ इयं, सोहं च.रंत्तारयं॥
स्त्रा ध्यानं रिषिराज राजन वरं। पापापच्चारं परं॥
॥ छं०॥ १२२॥ रू०॥ ६५॥
चौपाई॥ अति किसलय सुस कोमल अंग। जानु कि सुक्किय देहिय अंग॥
[L17: क्रिष्ण दिपायन दीपन व्यास। कोपिन एकिन मंडल चास॥
॥ छं०॥ १२३॥ रू०॥ ६६॥
दूहा॥ किसनदीप दीपाय नह। कही रिषी सब बत्त॥
जु कछु सराप सु उद्धस्यो। परनराज गेह गत्त॥
॥ छं०॥ १२४॥ रू०॥ ६७॥
कवित्त॥ तितै आय बर ब्रह्म। अप्प रिषि रिषि सु पुकारं॥
कै तच्छक नृप छतहु। न तरु तच्छक मरै धारं॥
पाठान्तर यह हैं:-अधरत्ती। वारंगन। अंग। ने। काहुं। भागवत्त। जोइ ककचित॥ ६१॥ जदि।
न। तदि। न। परिसिक्क। घर। रषि। परीषत। प्रतप्य। प्रपेषि। प्रसत्र। घम। संग। लियै।
हियै। वष्प। परिताहि। घटिय॥ ६३॥
६४ पाठान्तर:-तोटकछंद। क्तिं। पिबुलाइ। त्रितकाल। तत। नून॥
६५ पाठान्तर:-गुरु। यम्भोयं। सुधनं। मातुल। तारयं। ध्यान। राजं॥
६६ पाठान्तर:-सु। सकोमल। देहीय। देही। अयंग। किस्ना। दीपायन। चंद्रायना॥
६७ पाठान्तर:-रषी। वत। जु। उधर्यो। आगत्त।
६८ पाठान्तर:-तंछक। हतहुं। तक्कक। भई। भइय। मान। तों। निधान। धरि। चित। ध्यान।

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ३१
उभय चित्त चिंतयौ । भय्य श्री नाग सु मानं ॥
नृप न हतो तौ मरन । अचित नृप रिष्य निधानं ॥
दुच्च भंति चित्त चिंता सुचित । धरिय ध्यान चित जान जिय ॥
सत विप्प आइ लिय बोर बर । आय च्छ्य राजन सु दिय ॥
॥ छं० ॥ १२५ ॥ रू० ॥ ६८ ॥
कवित्त ॥ दिय च्छ्यं सधि कीट । सुफल लेइ राजन धारिय ॥
क्रम खंडन लागंत । निकरि कीटं कित कारिय ॥
छिनक मधि बाढंत । भए पुनि पंचनि नारिय ॥
नृपय हुकम मुष दियौ । करो सो काम कररिय ॥
फिरि आय राय दिष्टह वविय । क्रम्म मद्धि उसनह फनिय ॥
जं जाच जीह कलि हंस छत । भय्य देह ब्रन अप्पनिय ॥
॥ छं० ॥ १२६ ॥ रू० ॥ ६६ ॥
तव जनमेजय पुत्त । दिसा दच्छिन जन मुकिय ॥
तहां धन अंतर वैद । दरक चढ़ि लैन सु तकिय ॥
करिय षेद चलि अप्प । सत्तस चेला संग धारिय ॥
आस्तीक जु धुर नाग । तव सु तकूक विचारिय ॥
कत्त तक्कि रूप छुकुटी भय्य । गच्छिय गुरु पुठ्ठे उसिय ॥
अप काज सिप्प सिष्पं दइय । विप्र रूप तकूक हँसिय ॥
॥ छं० ॥ १२७ ॥ रू० ॥ ७० ॥
दूहा ॥ आस्तीक जु गुर बैर कजि । पढि विद्या ग्रह नाग ॥
जनमेजय न्रिप सो मिलिय । मंड्यौ अप्पन जाग ॥
॥ छं० ॥ १२८ ॥ रू० ॥ ७१ ॥
६६ पाठान्तरः-भरा । किसी २ पुस्तक में सो शब्द का पाठ नहीं है । आई राइ । दिष्ट ।
भईय । भईये ॥
७० पाठान्तरः-दक्षिन । जनमु । किय । धन । अंतरवेद । सुत । किय । तक्षक । छलन । किं ।
भईय । पुट्ठे । सिष्यं । सिष्यां । दरह । तक्षक ।
७१ पाठान्तरः-तिहित । बढ़स । यत । विप्पं । सचारख । रषि । जानिलु । बात । नृहरिय ।
मल्ल । होम । मंत । तक्षक । पैतो । अनी । मंत्र ॥

३२ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
कवित्त ॥ ति चित्त वैर सिसु वरन । सपत विप दोख सु चारव ॥
नृप जनमेजय नाम । भयौ तामस उत गारव ॥
तात वैर सिसु दषि । जियन खोइ लोडू विचारै ॥
जातिहु बातन हरिय । सच्छ बंध्यौ जनु जारै ॥
होमंत सक्ति तच्छक सु नग । इन्द्र सरन पत्तौ तबै ॥
सुनि कन्न राज तामस भयौ । करहु मंत साधन सवै ॥
॥ छं० ॥ १२८ ॥ रु० ॥ ७२ ॥
भुजंगी ॥ करी अस्तुती यं स्वहा इंद्र जोगं । तहां इंद्र आयौ सुरं नाग भोगं ॥
दूतं देव सादेव सारन्न आयौ । तिनं काटि दीयंत खो पाप पायौ ॥
॥ छं० ॥ १२९ ॥ रु० ॥ ७३ ॥
कवित्त ॥ अभय दान आतुरह । अंन उग्राह पान दत ॥
सरन रषि भय नरन । कढ्ढि मुक चित्त खंडि सत ॥
तय लगि कग्ग कराल । स्वान ससन ऊ वासै ॥
रुधिर चरम अरु असति । वस्न वस्नन ऊ नासै ॥
जो दूय जोइ जग उच्चरै । जननि जाय ग्रब्भह गरै ॥
तिन काज राज प्रारत्थिये । जियत तक्षक तन उब्बरै ॥
॥ छं० ॥ १३१ ॥ रु० ॥ ७४ ॥
दूहा ॥ नृप चिंता बहु लग्गि मन । ज्यौं जुथ वाय चिकाल ॥
यौं नृप राजत राज कुल । पुनर जनम दुष ज्वाल ॥
॥ छं० ॥ १३२ ॥ रु० ॥ ७५ ॥
७२ पाठान्तरः-करि । अस्तुति । स्वाहां । सारन । तिन । सह ॥ इस रूपक के छंद का नाम
हम ने शोध करके भुजंगी रक्खा है और सं० १६४७ की तथा सं० १७९० की पुस्तकों में भी यही नाम
लिखा है किन्तु इतर पुस्तकों में चंद्रायना नाम लिखा है वह अशुद्ध है ॥
७४ पाठान्तरः-आतुरहै । अन । कढि । मु । कहित । तुय । ड़ । उं । जोइयै । गभह ।
कारज । प्रार्थिय । उबरै ॥
७५ पाठान्तरः-च्रिंत । पुनरजनम ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ३३
॥ वर्तमान आबू पर्वत के उद्धार की कथा ॥

॥ उस तक्षक का आबू पर अपना अर्बुद नाम धर रहना ॥
कवित्त ॥ स तछ आवू प्रमान । मंदीयौ सू अचल कर ॥
गरब गरूर तें विडुरिं । सुडरु रह्यौ जु संत धुर ॥
अचल ईस प्रति ताम । अचल आचित्त अचल घर ॥
देव देव प्रारत्थि । इन्द्र मुक्किय इंडिय धर ॥
अरबुद नाम धर जुत्तिया । दूर तपित थथराइया ॥
कलपान पुहुप अरु वस्त्र गुरु । झांच गुरु गुर झाइया ॥
छं० ॥ १३३ ॥ रु० ॥ ७६ ॥
॥ गालव ऋषि के शिष्य उत्तङ्ग का उपाख्यान ॥
दूहा ॥ सो आवू उद्धार विधि । कह्यौ कथा * परबंध ॥
ज्यौं अनादित्या रिष्य मुख । सुनी सु गुर समबंध ॥
छं० ॥ १३४ ॥ रु० ॥ ७७ ॥
गुरु गालव उत्तंग सिष । बहु विद्या पढ़ि जाम ॥
पय लग्गौ गुर राज कें । कहौ दक्कुना काम ॥
छं० ॥ १३५ ॥ रु० ॥ ७८ ॥
वाघा ॥ गालव रिषि सिष्य उतंग । दिय विद्या बुध क्रम क्रम अंग ॥
गुर दषिन कज्जैं गुर जच्चै । गुर पतनी तब मंगि विरच्चै ॥ १३६ ॥
कुंडल जच्चि षिचिया कानं । अप्यौ जासु दषिना दानं ॥
दिवस अठमी व्रत अपंडै । चरचौं दान विप्र श्रुत मंडै ॥ १३७ ॥
७६ पाठान्तर :- सो । तक्षक । आ । चित । बर । मुकिय । रूडीय । जुतिय । तप्यित । छाईया ॥
स = वह का वाचक और तछ = सर्प = तक्षक का वाचक जैसे रु० ५१ की ८ तुक में तच्छ प्रयोग हुआ है ॥
७७ पाठान्तर :- रिष्य ॥
७८ उतंग । जास । कै । दछना ॥
७६ पाठान्तर :- उत्संग । दखिन । गुरपतनी । मंगि । दत्तिना । अपंडे । मंडे । करे । संपनी ।
न्रिप । प्रस॑से । संसष्ये । तव्यक । बीच । रपै । अंचल । इपै । इपे । ठठौ । ताम विराम ।

  • हमारे पाठकों को ध्यान में रखना चाहिये कि चंद अर्बुद के उद्धार की कथा अर्बुद खण्ड
    अर्थात् आबू महात्म्य नामक संस्कृत ग्रंथों से संग्रह करके वर्णन करता है । जिन पाठकों के पढ़ने में
    अथवा सुनने में यह ग्रंथ आये हैं वे जान सक्ते हैं कि कवि ने थोड़े में बहुत ही आशय लिया है
    और उत्तङ्ग का उपाख्यान महाभारत के आदि पर्व के पौष्यपर्वाध्याय नामक द्वितीय अध्याय में से
    भी कवि ने संग्रहीत किया है ॥
    ३

३४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
चल्यौ रिषि चमंके ताम । गुर गुरनी कों करै प्रनाम ॥
चिंतत इष्ट चल्यौ वर राहं । संपत्तौ यौँ सद नृप ठाहं ॥ १४८ ॥
जच्चै कुंडल बिखिय पासं । खोइ समर्पै विधि बर तासं ॥
विप्र प्रसंसै समपे कुंडल । कढि डर तच्छक बीच नीच छल ॥ १४९ ॥
लै कुंडल चल्यौ हरषे मन । आय्यौ राज विप्र अन्यो अन ॥
क्रम्यौ विप्र राह चंचल चर । छलि तच्छक लीनें कुंडल वर ॥ १५० ॥
क्रमयौ विप्र पुठि अति चंचल । धरि अहि रूप सु गयौ रसातज ॥
विख दूखै ठट्ठौ रिषि तामं । दुमत चित्त भय विघ्न विरामं ॥ १५१ ॥
अस्तुति इन्द्र करन लग्यौ रिषि । नंब्बौ बासव खिनक वज्र सिष ॥
त्रित अखित दीयौ आखंडल । धर रिषि तक्खि घात विख मंडल ॥ १५२ ॥
पैठा विप्र नागपुर ठासं । धोम प्रगहै मंच विरामं ॥
दूख्यौ पुरष एक षट आरं । फेरे चक्र तास फिरि तारं ॥ १५३ ॥
दूख्यौ बाह्र बाह्र सत वारं । उंच तेज आजेज अपारं ॥
यौँ नर नारि अश्व वर नामं । वे अह्र हय्य बेई सम कामं ॥ १५४ ॥
चिसत सठि तां तंति ठार्यं । अद्ध खेत स्यामं अध तार्यं ॥
अहि धुत्तेन उपाडू सबाहं । फुंकत पुंकू सधुम्स सराहं ॥ १५५ ॥
पुंकत पुंख धार धुस चली । लग्गै नाग अंग सह थल्ली ॥
प्रगटे अंसू पलक्क उघ धत्ति । अंप्यो कुंडल नाग मान छति ॥ १५६ ॥
ग्हि कुंडल अप्ये गुर वालं । गुर विद्यां अप्पी अभिरामं ॥
दुज वर वज्र पैठ जेहा धर । बिख अखित तिव थान मंडि थिर ॥
छं० ॥ १५७ ॥ रु० ॥ ७९ ॥
दूहा ॥ बिख अथाह तिवि थान भय । बहुत संवच्छर वित्त ॥
पृथुल कराल कराल भौ । जिम जिम काल बितित्त ॥
छं० ॥ १५८ ॥ रु० ॥ ८० ॥
वर्ज । आक्षत । दियौ । रिखि । पैठो । बैठो । धोमं । ठाम । बिराम । फेरै । वाह्र । जो ।
तामं । बे । हथ । वे । ईस । मकामं । बेइम । सठि । ता । तँति । ठार्य । उपाय । स्याम ।
धुत्तेन । फूंकत । सधुम । धूम । लगे । थली । अंशू । कुंड । आप्यो । हित्ति । मनि । यही ।
रामं । पेठि । आक्षेत । आक्षित ।
८० पाठान्तर :- वित । प्रियमुल । प्रभार । विवित ॥

३६ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
हल्ली खेत अच्छी जलही समूहं । अचै शेष षीरं सु सानौ ससुहं ॥
धराचल्लि भागीरथी विम्ब आगं । मिटै अघघ ओघं तनं दुष्ष दागं ॥ १५७ ॥
सुभं उच्च चंदोल बीचं विराजं । मनो खुग्ग आरोह सोपान साजं ॥
नरं नीच नीरं तटं श्रोन प्रस्सं । तवै अग्ग देवं गुनं अब्ब अस्सं ॥ १५८ ॥
परै मख्खू कच्छेवरं धंषि कुद्दी । भजी कावखं गिड्ड गोमाय लुद्दी ॥
तटं श्रोन अच्छी थलं वारि छल्ल । घिनं मक्सिरू चंदोल बीचं वचल्लै ॥ १५९ ॥
तिनं खातसं देह आनूप धारै । वरं उर्वसी चामरं बिक्खू नारै ॥
धरै ध्यान भावं तिनं दुक्ख दब्बै । मिटै मज्जनं अघ्घ साजंम सब्बै ॥ १६० ॥
अलंकृत गंगा तनं तेज खोवै । मनौ दाचनं दाच दाहंन जो वै ॥
सुयं गंग गंगे सु गंगा प्रकारं । धरै नाम गंगा जमं किं करारं ॥ १६१ ॥
त्रिपथ्थी त्रिगामी विराजंत गंगा । मचा स्वग्ग लोकं नरं नारि चंगा ॥
रहहं घरी ज्यौं फिरै तीन लोकं । मचा दिव्य धुन्वी नवं निगम लोकं ॥ १६२ ॥
कलाखी सुचीरं गुफा फारि नागं । प्रगट्टीय मातंगि मानुष्य आगं ॥
रची नष्य अच्छी सुयं ताप अंजै । मचा वहराजं दिवं दुर्ग रंजै ॥ १६३ ॥
अचयं भीषमं मात बहु पाप षंडै । जमं ज्वाल ज्वालं तसं तेज चंडै ॥
रहं रोच रंगी घरं सीस गंगे । मचा मोचनी सात दुग्गा उतंगे ॥ १६४ ॥
बरं काख काखा जलं खेत रूपं । तहां उपनी मात आंबंग नूपं ॥
अई गाम सहं सु सामुह जेतं । डह्यौ नाम गंगा उतंगा विचेतं ॥ १६५ ॥
घरद्वार दारं कला तूं प्रगट्टी । करी मुक्ति मग्गं मचा पाप मही ॥
तिनं नाम खोनै कियं तोय पीजै । कियं संम्रनं देव संज्यान कीजै ॥ १६६ ॥
कियौ गच्चि तें पंथ उग्गाच्चि साजं । तुंही तापिनी तेज तूं तेज राजं ॥
तुंही मध्य वारानसी खोच्छ दैनी । कही काल दुष्यं कटनं क्रपैनी ॥
छं० ॥ १६७ ॥ रू० ॥ ८३ ॥
दूहा ॥ जब लगि रज तन मात की । रहै अंग सो बांइ ॥
तब लगि काल न संपजै । क्रम पाप सब जाइ ॥
छं० ॥ १६८ ॥ रू० ॥ ८४ ॥
मंजने हल्लै । अपसा । जम । दाहं । दाहनं । जोहै । त्रिपंथी । नाग । घटा ताम । मंगा ।
महादिव्य । नवं । निगम । महावट्टराजं । पदिव दुर्ग । भीषम । जालं । महामोहनी । अनूपं ।
ध्यै। समरनं संभ्यान । मोच्छ । मोक्ष । दुष्च ॥
८४ पाठान्तर :—सोलाइ ।

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ३७
गाथा ॥ क्रमं अघं सब भंजै । दिव्यं करै देह सा रूपं ॥
सुरगं करै सु गामी । अह्रं नाम रसन उच्चारं ॥
कृं० ॥ १६९ ॥ रू० ॥ ८५ ॥
॥ मंदाकिनी गंगा का उभरना और गौ का तिरकर निकलना ॥
दूहा ॥ सुनि गंगा सुवयन रिषि । उभरी आय प्रमान ॥
ताहि तिरंतह नंदिनी । आई तट बिल थान ॥
कृं० ॥ १७० ॥ रू० ॥ ८६ ॥
रिषि सिष्य धाये सु सब । धर कड्डी तँह गाव ॥
सो कड्हिवि मंदाकिनी । गइ पयाल फिरि ठाव ॥
कृं० ॥ १७१ ॥ रू० ॥ ८७ ॥
बिल अथाह दिष्यौ सु रिष । चित चिंता परपत्त ॥
को निकसै या माधिगत । गत भयानक घत्त ॥
कृं० ॥ १७२ ॥ रू० ॥ ८८ ॥
॥ वशिष्ट ऋषि का उस अथाह बिल बूरने को हिमालय
के पास एक पुत्र मांगने जाना ॥
विछप्परी ॥ चिंते रिषि देखि बिल दुक्खित । उर लग्गी अति चिंत मम्झिझ चित ॥
पूछवि रिषि सिष्य कत कामं । सुहै न कोइ बुद्धि बल तामं ॥ १७३ ॥
चिंतै ध्यान अप्प रिषि राजं । याहि सपूरन को थिर काजं ॥
चिंतत रिषि ध्यान उर भासं । है सत पुत्त हेम गिरि जासं ॥ १७४ ॥
एक पुत्त जाचौं तिन पासं । विन्न पूरे पूरै उर आसं ॥
क्रम्यौ राज रिषी दिसि उत्तर । देषी मन आनंद दिव्य धर ॥ १७५ ॥
गौ रिषि राज पास गिर राजं । इष्ष अग्ग पति आसन साजं ॥
मैना सहित आय पग लग्गे । अरघ पाद करि अचवन लग्गे ॥
कृं० ॥ १७६ ॥ रू० ॥ ८९ ॥
८५ पाठान्तरः-क्रम । सारूपं । सुंगामी ॥
८६-८८ पाठान्तरः-सुनयन । तिरेत ॥ ८६ ॥ धाए । कढी । तहां । कढवि । गई ।
ठांव ॥ ८७ ॥ परप्रत । मधि । घत ॥ ८८ ॥
८९ पाठान्तरः-चिंते । दुक्रत । कोई । संपूरन । नासं । हेमगिरि । पुत्र एक । पू । पूरं ।
रिषि । उत्तर । मान । रिषिराज । गिरि राजं । दूष्ये । मेना । पय । लागे ॥