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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 38, कुल 470 में से

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पृष्ठ 38

इकं दीह एकं । दुती दीह मेकं ॥
भगत्तं सुचक्की । दियो नच्चि वक्की ॥ ६५ ॥
इकं चोख अघ्यं । करै नाक नघ्यं ॥
सुभक्ती समत्ती । जलं माचि पत्ती ॥ ६६ ॥
धरै आक सीसं । त्रिलोकेस ईसं ॥
चयं वेद जक्की । प्रियं चंद भक्की ॥ छं० ॥ ६७ ॥ रू० ॥ २८ ॥
॥ संकर की स्तुति ॥
दूहा ॥ नमस्कार संकर कियौ । सरसैं वुधि कवि चंद ॥
सति लंपट लंपट नवी । अबुधि मंच सिसु इंद ॥
छं० ॥ ६८ ॥ रू० ॥ २९ ॥
साधन भोग संयोग रजि । मंडन आव अखूट ॥
नमो उमा उर आभरन । जय बंधन जट जूट ॥
छं० ॥ ६९ ॥ रू० ॥ ३० ॥
विराज ॥ जटा जूट वंदं । लिलाटंत चंदं ॥
विराजंत इंदं । भुजंगी गविंदं ॥ ७० ॥
शिरो माल इंदं । गिरीजा अनंदं ॥
सिरै सिंधु नहं । रनैं वीर महं ॥ ७१ ॥
करी चर्म सहं । करं काल खहं ॥
उनैं गंग चहं । चखी अग्गि दहं ॥ ७२ ॥
प्रलै जानि जहं । जयो जोग सहं ॥
घटा जानि भहं । जरै काम तहं ॥ ७३ ॥
हरै चाचि वहं । रचै मोछ कहं ॥
बचै दूरि दहं । नटे भेख रहं ॥ ७४ ॥
नमो ईस इंदं । बदै भद्द चंदं ॥
छं० ॥ ७५ ॥ रू० ॥ ३१ ॥
कई वर्ण वारो । यगन्नै दुधारो ॥
रचो पाव चारी । करो संखनारी ॥ श्रीधर कवि कृत पिंगल ॥
३० पाठान्तरः — सरसै । सती । संजोग ॥
३१ पाठान्तरः — गिरिजा । रनै । वीर । खहुं । गंगहद्दं । हद्दं । सद्दं ॥. इस रूपक का छंद ७५
चंद की संस्कृत काव्य-सम-श्लोकार्द्ध शैली का दूसरा उदाहरण है। देखो टिप्पण १४ को ॥