पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
दत्वा आप मिदं श्रुतं गुरु वरं । मृत्यं च राजा नयं ॥
सत्यँ संप्त दिनानि पानि पवरं । नैवं चलते पयं ॥
त्वं आपं चय लोक जाखति बरं । भुंजे वरं पुचयं ॥
एकँ दीछ सुतप्य प्रापति पदं । त्रैलोकयं चासयं ॥
छं० ॥ १०८ ॥ रू० ॥ ५४ ॥
दूहा ॥ सब रिखि सँ सो पुच तू । वय दिक्खौ परमान ॥
मानहु डम्बर सें उदै । बढति कला बर भान ॥
छं० ॥ ११० ॥ रू० ॥ ५५ ॥
कवित्त ॥ पुच कंठि रिखिराज । जाइ नृप थान सु वत्तौ ॥
पंथ कुज्जह संगह्यौ । रिषि आपान विरत्तौ ॥
अति सु दीन सिर नोच । ऊंच नहिं भाल उचाइय ॥
दिष्टि दिष्ट राजन चरित्त । मंगन नृप आइय ॥
एकांग एक जोगिन्द्र वर । धातु न बंधे हथ्थ पर ॥
करि काज रिखि आयौ घरहि । उरच धरइर लग्ग डर ॥
छं० ॥ १११ ॥ रू० ५६ ॥
गाहा ॥ जो जंप्यो रिष पुत्तं । प्रलयं होइ सत्तियं कालं ॥
जं आवडू तं भ्रंमं । सो किज्जै राजनं बज्जयं ॥
॥ छं० ॥ ११२ ॥ रू० ॥ ५७ ॥
चोटक ॥ नृप कंठि प्रजंक प्रजंक पला । मुहु मुंदिरु भानक मोद कला ॥
नृप दीन छल्यौ बहु चित्त चितं । सुछल्या जनु पोनय पीप पतं ॥
॥ छं० ॥ ११३ ॥
पतनं गुर जानि चरन्न लग्यौ । बहुश्यां रिषिराज सु प्रान दग्ग्यौ ॥
॥ छं० ॥ ११४ ॥ रू० ॥ ५८ ॥
५४ पाठान्तरः- म्रतंच । मृत्यंच । पानिपहरं । पय । आप हूलाति । तैलाकयं ॥
५५ पाठान्तरः-मै । मे । तूं । परसान । संवत् १६४७ की पुस्तक में हमारा लिखा पाठ है
और इतर पुस्तकों में "मानहु इंदौ वर उदै" है ॥
५६ पाठान्तरः-जाय । संपत्तौ । आपन । ऊंच । नह । नहि । द्रिष्ट । वप । आईय ।
जोगिन्द । हथ । किंहि । घरह । उर । घर । अहुर । र्जागग ॥
५७ पाठान्तर :-झो । झंप्यों । पुत्रं । भावै । भाव । इतं । जो । कीजै ॥
५८ पाठान्तरः-चिप । वप । फला । दला । मुहुमंदिरू । भान । कमोद । न्रंप । बहुचित ।
जुनु । पोनय । बहुयौं । किसी पुस्तक में सु शब्द नहीं है ॥