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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 36, कुल 470 में से

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पृष्ठ 36

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १६
॥ चंद उत्तापित होकर अपने को पूर्व-कवियों का दास होना,
उन की उक्ति को कहना और अपनी को बकना कहता है ॥
॥ दूहा ॥ कहां लगि लघुता वरनवौं । कविन दास कवि चंद ॥
उन कत्थि ते जो उब्बरी । सो बकहहिं करि छंद ॥
छं० ॥ ५० ॥ रू० ॥ २३ ॥
॥ चंद खलों का स्वभाव वर्णन कर के सुजनों के निमित्त
अपना काव्य रचन करना कहता है ॥
॥ दूहा ॥ सरस काव्य रचना रचौं । खल जन सुनि न हसंत ॥
जैसे सिंधुर देखि मग । स्वान सुभाव भुसंत ॥
छं० ॥ ५१ ॥ रू० ॥ २४ ॥
तौ पनि सुजन निमित्त गुन । रचिये तन मन फूल ॥
जूका भय जिय जानिकैं । क्यों डारिये दुकूल ॥
छं० ॥ ५२ ॥ रू० ॥ २५ ॥
॥ सरस्वती की स्तुति ॥
॥ साटक ॥ मुक्ताचार विचार सार सुबुधा, अबुधा बुधा गोपनी ॥
स्वेतं चीर सरीर नीर गहिरा, गौरी गिरा जोगनी ॥
बीना पानि सुवानि जानि दधिजा, हंसा रसा आसिनी ॥
लंबोजा चिहुरार भार जघना, विग्ना घना नासिनी ॥
छं० ॥ ५३ ॥ रू० ॥ २६ ॥
॥ गणेश की स्तुति ॥
कचंजा मद गंध राग रुचयं । अलिभूराच्छादिता ॥
गुंजा चार अधार सार गुनजा, झंझा पथा भासिता ॥
अग्रेजा श्रुति कुंडलं करि कर, खुहीर उद्धारयं ॥
सोयं पातु गनेस खेस सफलं, पृथाज काव्यं कृतं ॥
छं० ॥ ५४ ॥ रू० ॥ २७ ॥
२३-२५ इन में जो किसी २ पुस्तक में तेनो पाठ है वह अशुद्ध है । कवि चंद ने अपनी लघुता
वर्णन करते २ अंत को उत्तापित होकर जो यह दो दोहे ( २४ ॥ ५२ ॥ + २५ ॥ ५३) कहे हैं वह
इस महाकाव्य के पाठकों और खंडन करने वालों को ध्यान में रहने योग्य हैं ॥
२६-२७ इन रूपकों में यह अशुद्ध पाठान्तर हैं:- गोपनी, गिराजोगनी, सुवानी, दधि, जाहं,