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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 470 में से

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पृष्ठ 44

आदि पर्व ] . पृथ्वीराजरासौ । २६
खिजि कच्चौ नैन भरीव । तस नाम रूप सरीव ॥
पै जुन्न बालक बुद्धि । गलि गर्भ क्यौं न वितुद्धि ॥ १०२ ॥
तिच्छि तजिय तात ह्मान । धरि कोप अंग निधान ॥
करि क्रोध अंखि सुरत्त । छविजानि लग्गिय लत्त ॥ १०३ ॥
जिहि जियत पुच्च अप्प । को तांत लब्भय दप्प ॥
रिस करौं जोब प्रमान । जरै तीन लोक अमान ॥ १०४ ॥
रिस तेज कंपत बाल । दिप्यो सु तात विसाल ॥
वह लग्गि ब्रह्म धियान । भयौ कोटि तामस नाम ॥ १०५ ॥
अति ना रत्न दिखि रिखि लोइ । दिख्या सु तात समोइ ॥
छं० ॥ १०६ ॥ रू० ॥ ५१ ॥
कवित्त ॥ जोरि हत्थ थुति संच । फिर्यो पर दच्छि लग्गि पथ ॥
रुधिर नयन आरक्त । कंठ लग्ग्यौ सु मुक्ति भय ॥
भूत द्वार वीभार । गाजि आये सुत मग्गं ॥
भर भर भर उच्चार । रोस दावा नल लग्गं ॥
जिहि चच्चौ अप्प मो तात गर । गनिव सत्त दिन में प्रमति ॥
जो हत्यो अप्प तक्षक सुन्नत । कै काया अन्न सुगति ॥
छं० ॥ १०७ ॥ रू० ॥ ५२ ॥
साटक ॥ धंन्यो धंन्य सु बाल तापन तपं । बालं वलं विव्हलं ॥
सोयं पुच कि सोस दोस चि विधं । वानीय गद् गद् गलं ॥
एवं भूप विसाल भूमि भरतं । धर्मं धरा राजनं ॥
तं तेजं नवि चोर व्याघ्र विघनं । नैवापि संतापयं ॥
छं० ॥ १०८ ॥ रू० ॥ ५३ ॥
और चंद के काव्य को उक्त भारत औ भागवत से मिलाकर सूक्ष्म विचार कर देखे तो वह निः-
संदेह यह अनुमान कर सक्ता है कि चंद संस्कृत भाषा अच्छी जानता था और यह बड़े बड़े ग्रंथ
भी उस के पढ़े हुए थे क्योंकि चंद के कोई २ छंद उक्त ग्रंथों के श्लोकों के ठीक अनुवाद प्रतीत
होते हैं । इस हनूफाल छंद के चारों पाद बारह २ मात्रा के होते हैं ॥
५२ पाठान्तरः-फिर्र्यौ । लग्यौ । विभार । जाजि । आइय । आईय । हत्यो । प्रमत्ति । प्रमित्त ।
कैकाया । सुयति ॥
५३ पाठान्तरः-धन्यौ धन्य । तनं । बाल । भरनं । तेजंन । विचोर । विघन ॥