पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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॥ रासा किस को अच्छा और किस को बुरा प्रतीत होता है ॥
दूहा ॥ कुमति मति दरसंत तिहिं । बिधि बिना न अव्वान ॥
तिहिं रासौ जु पवित्र गुन । सरसौ बन्न रसान ॥
॥ छं० ॥ ८९ ॥ रु० ॥ ४५ ॥
॥ इस ग्रंथ के काव्य की संख्या का कथन ॥
दूहा ॥ सत सहस नष सिष सरस । संकल आदि मुनि दिष्य ॥
घट बढ मत कोऊ पढौ। मोहि दूसनं नवसिष्य ॥ छं० ॥ ९० ॥ रु० ॥ ४६ ॥
॥ रासे के ढँके हुए अर्थ के विषय में कवि का कथन ॥
गाहा ॥ अरथं ढंकिन सहसा । उघारै वनत्थि एकलया ॥
मभझं मभझ प्रमानं । चतुर स्त्री चारयं जेमं ॥ छं० ॥ ९१ ॥ रु० ॥ ४७॥
॥ इस ग्रंथ के विष का संक्षेप कथन ॥
कवित्त ॥ दानव कुल छत्रीय । नाम ढुंढा रष्स वर ॥
तिहिं सु जोत प्रथिराज । सूर सामंत अस्ति भर ॥
जीह जोति कवि चंद । रूप संजोगि भोगि श्रम ॥
इक्क दीह उपन्न । इक्कं दोहै समाय क्रम ॥
जथ कत्थ तथ्य होइ निर्मये । जोग भोग राजन खत्तिय ॥
बज्रंग बाहु अरि दल मलन । तासु कित्ति चंदह कत्तिय ॥
॥ छं० ॥ ९२ ॥ रु० ॥ ४८ ॥
अरिल्ल ॥ प्रथम राज चहुवांन पिथ्य वर । राजधान रंजे जंगल धर ॥
मुष सू भट सूर सामंत दर । जिन्हि बंध्यो सुरतांन प्रान भर ॥
॥ छं० ॥ ९४ ॥ रु० ॥ ४९ ॥
४५ पाठांतर:-दरसंन । तिहि । तिहि । रसानं ॥
४६ पाठांतरः-कोऊ ॥ इस में “सत सहस” से कवि एक लाख की ग्रंथ संख्या बताता
है और यह भी कहता है कि घटं बढं पठ करके मुझे दोष मत देना । कोई २ कवि जो यहां
सत शब्द से सात का अर्थ अनुमान करते हैं वह मेरी सम्मति में अयुक्त प्रतीत होता है ॥
४७ पाठांतरः-ढकिनं । नवत्थियं । मझ । मझ ।-
४८-५० पाठांतरः-रष्षसं । तिहि । जिह । संजोगी । भोगी । उपन्ने । जोगराज । नाल-
हिय । बज्रंगबाँहुं । अरि दलं मलनं । कुत्तीं । चंदं ॥ ४७ ॥ सुर ॥ ४८ ॥ मित्त । बंधो । कित्ति ।
अष्यो । तिथि ॥ ४९ ॥