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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 39, कुल 470 में से

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पृष्ठ 39

२२ पृथ्वीराजरासौ। [आदि पर्व
दूहा ॥ करियै भक्ति कवि चंद हर । हरि जंपिय इह भाइ ॥
ईस स्याम जू जू कहै । नरक परंतच जाइ ॥
छं० ॥ ७६ ॥ रू० ॥ ३२ ॥
श्लोक ॥ परात्परतरं यांति । नारायण परायणं ॥
न ते तत्र गमिष्यंति । ये दुष्यंति महेश्वरं ॥
छं० ॥ ७७ ॥ रू० ॥ ३३ ॥
साटक ॥ गंगाया अगुलत्त वसनं मसनं, लच्छी उमा दोवरं ॥
संख्ं भूत कपाल माल असितं, वैजंति माला धरी ॥
चर्म मद्य विभूति भूतिक युगं, विभूति साया क्रमं ॥
पापं विचरति मुक्ति अप्पन वियं, बीयं वरं देवयं ॥
छं० ॥ ७८ ॥ रू० ॥ ३४ ॥
॥ कवि की आशा का स्वरूप वर्णन ॥
गाहा ॥ आसा मच्चीव कव्बी । नवनववित्तीय संग्रहं ग्रंथं ॥
सागर सरिस तरंगी । वोहत्थयं उत्थियं चञ्चयं ॥
छं० ॥ ७९ ॥ रू० ॥ ३५ ॥
॥ चंद का काव्य समुद्र कैसा है ॥
दूहा ॥ काव्य समुद्र कवि चंद कृत । सुगति समप्पन ग्यान ॥
राजनीति बोहिथ सुफल । पार उतारन यान ॥
छं० ॥ ८० ॥ रू० ॥ ३६ ॥
छंद प्रबंध कवित्त जति । साटक गाह दुहत्थ ॥
लघु गुर मंडित खंडिय, छ । पिंगल अमर भरत्थ ॥
छं० ॥ ८१ ॥ रू० ॥ ३७ ॥
३२ पाठान्तरः - करिये ।
३३ पाठान्तरः - यांति । ज्ञे । यह श्लोक चंद के शुद्ध संस्कृत काव्य रचन का प्रथम उदाहरण है ॥
३४ पाठान्तरः - अगुलत्त । वसनमसनं । लछी । कपालमाल । चमभूतिकयुगं । मायाक्रमं ।
मुक्तिं । वरंदेवयं ॥
३५ पाठान्तरः - क्रित्ती ॥
३६ पाठान्तरः - ग्यांन । यांन ।
३७ पाठान्तरः - भरत्य ।