पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
हल्ली खेत अच्छी जलही समूहं । अचै शेष षीरं सु सानौ ससुहं ॥
धराचल्लि भागीरथी विम्ब आगं । मिटै अघघ ओघं तनं दुष्ष दागं ॥ १५७ ॥
सुभं उच्च चंदोल बीचं विराजं । मनो खुग्ग आरोह सोपान साजं ॥
नरं नीच नीरं तटं श्रोन प्रस्सं । तवै अग्ग देवं गुनं अब्ब अस्सं ॥ १५८ ॥
परै मख्खू कच्छेवरं धंषि कुद्दी । भजी कावखं गिड्ड गोमाय लुद्दी ॥
तटं श्रोन अच्छी थलं वारि छल्ल । घिनं मक्सिरू चंदोल बीचं वचल्लै ॥ १५९ ॥
तिनं खातसं देह आनूप धारै । वरं उर्वसी चामरं बिक्खू नारै ॥
धरै ध्यान भावं तिनं दुक्ख दब्बै । मिटै मज्जनं अघ्घ साजंम सब्बै ॥ १६० ॥
अलंकृत गंगा तनं तेज खोवै । मनौ दाचनं दाच दाहंन जो वै ॥
सुयं गंग गंगे सु गंगा प्रकारं । धरै नाम गंगा जमं किं करारं ॥ १६१ ॥
त्रिपथ्थी त्रिगामी विराजंत गंगा । मचा स्वग्ग लोकं नरं नारि चंगा ॥
रहहं घरी ज्यौं फिरै तीन लोकं । मचा दिव्य धुन्वी नवं निगम लोकं ॥ १६२ ॥
कलाखी सुचीरं गुफा फारि नागं । प्रगट्टीय मातंगि मानुष्य आगं ॥
रची नष्य अच्छी सुयं ताप अंजै । मचा वहराजं दिवं दुर्ग रंजै ॥ १६३ ॥
अचयं भीषमं मात बहु पाप षंडै । जमं ज्वाल ज्वालं तसं तेज चंडै ॥
रहं रोच रंगी घरं सीस गंगे । मचा मोचनी सात दुग्गा उतंगे ॥ १६४ ॥
बरं काख काखा जलं खेत रूपं । तहां उपनी मात आंबंग नूपं ॥
अई गाम सहं सु सामुह जेतं । डह्यौ नाम गंगा उतंगा विचेतं ॥ १६५ ॥
घरद्वार दारं कला तूं प्रगट्टी । करी मुक्ति मग्गं मचा पाप मही ॥
तिनं नाम खोनै कियं तोय पीजै । कियं संम्रनं देव संज्यान कीजै ॥ १६६ ॥
कियौ गच्चि तें पंथ उग्गाच्चि साजं । तुंही तापिनी तेज तूं तेज राजं ॥
तुंही मध्य वारानसी खोच्छ दैनी । कही काल दुष्यं कटनं क्रपैनी ॥
छं० ॥ १६७ ॥ रू० ॥ ८३ ॥
दूहा ॥ जब लगि रज तन मात की । रहै अंग सो बांइ ॥
तब लगि काल न संपजै । क्रम पाप सब जाइ ॥
छं० ॥ १६८ ॥ रू० ॥ ८४ ॥
मंजने हल्लै । अपसा । जम । दाहं । दाहनं । जोहै । त्रिपंथी । नाग । घटा ताम । मंगा ।
महादिव्य । नवं । निगम । महावट्टराजं । पदिव दुर्ग । भीषम । जालं । महामोहनी । अनूपं ।
ध्यै। समरनं संभ्यान । मोच्छ । मोक्ष । दुष्च ॥
८४ पाठान्तर :—सोलाइ ।