पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३० पृथ्वीराजरासौ। [ आदि पर्व
कित्ति कीर अंग लग्गौ परस। तिहि कारन इह उपजिय॥
आषेट जाय पन्नग मृतक। सिंगी, गर घत्तिय, षिज्ञिय॥
॥ छं०॥ ११८॥ रू०॥ ६३॥
तोटक॥ इति चोटक छंद सुसंत गुरं। दिन सात पळ्यौ हरि गंग कुरं॥
त्रितकाल विकालह चित्त धरं। क्खित पत्त छिमा पिवु लाइ भरं॥
॥ छं०॥ १२०॥
नृपराज परीक्षत तत्त गुरं। धरि ध्यान कह्यौ बदळीष धरं॥
जून काल सु तप्पय देव नरं। नृप ग्यान सुन्यौ वपु व्यास वरं॥
॥ छं०॥ १२१॥ रू०॥ ६४॥
साटक॥ या विद्या बदळीत राजन गुरं। आपो रिषं तारयं॥
पून्यं राज सु इन्द्र धारन घरं। विद्या अमारा पुरं॥
अभ्भोयं सुधनं तु मातुळ इयं, सोहं च.रंत्तारयं॥
स्त्रा ध्यानं रिषिराज राजन वरं। पापापच्चारं परं॥
॥ छं०॥ १२२॥ रू०॥ ६५॥
चौपाई॥ अति किसलय सुस कोमल अंग। जानु कि सुक्किय देहिय अंग॥
[L17: क्रिष्ण दिपायन दीपन व्यास। कोपिन एकिन मंडल चास॥
॥ छं०॥ १२३॥ रू०॥ ६६॥
दूहा॥ किसनदीप दीपाय नह। कही रिषी सब बत्त॥
जु कछु सराप सु उद्धस्यो। परनराज गेह गत्त॥
॥ छं०॥ १२४॥ रू०॥ ६७॥
कवित्त॥ तितै आय बर ब्रह्म। अप्प रिषि रिषि सु पुकारं॥
कै तच्छक नृप छतहु। न तरु तच्छक मरै धारं॥
पाठान्तर यह हैं:-अधरत्ती। वारंगन। अंग। ने। काहुं। भागवत्त। जोइ ककचित॥ ६१॥ जदि।
न। तदि। न। परिसिक्क। घर। रषि। परीषत। प्रतप्य। प्रपेषि। प्रसत्र। घम। संग। लियै।
हियै। वष्प। परिताहि। घटिय॥ ६३॥
६४ पाठान्तर:-तोटकछंद। क्तिं। पिबुलाइ। त्रितकाल। तत। नून॥
६५ पाठान्तर:-गुरु। यम्भोयं। सुधनं। मातुल। तारयं। ध्यान। राजं॥
६६ पाठान्तर:-सु। सकोमल। देहीय। देही। अयंग। किस्ना। दीपायन। चंद्रायना॥
६७ पाठान्तर:-रषी। वत। जु। उधर्यो। आगत्त।
६८ पाठान्तर:-तंछक। हतहुं। तक्कक। भई। भइय। मान। तों। निधान। धरि। चित। ध्यान।