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सर्वकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 470 में से

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पृष्ठ 34

१६ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
॥ चंद की स्त्री अपने पति से अष्टादश पुराणों की
अनुक्रमणिका पूछती है ॥
दूहा ॥ सुनत काव्य कवि चंद कौ । चित आनन्दी नारि ॥
तुम वानी बानी प्रसन । हसन हुवंत निवारि ॥
छं० ॥ २९ ॥ रु० ॥ १२ ॥
कवित्त ॥ कहै कंति मतिवंत । तंत रसना रस सागर ॥
तुम गुन श्रवन सुहंत । जानि चमकंत कलाधर ॥
तुम देवी वरदान । दान दीजै मुहि कब्बिय ॥
अष्टादसच पुरान । नाम परिसानह सब्बिय ॥
तुम कथत कथन आनन्द मुहि । अग्ग पच्छ भव सुद्धरै ॥
अग्यान तिमर नट्ठय सुनत । अध्य कमन्न चिय उड्डरै ॥
छं० ॥ ३० ॥ रु० ॥ १३ ॥
॥ चंद अष्टादश पुराणों की अनुक्रमणिका का कथन करता है ॥
पद्धरी ॥ ब्रह्मान्यदेव सम वासुदेव । अष्टदस पुरान तिन कहि सुभेव ॥
तिन कहैं नाम परिमान बन्न । जिन्न सुनत सुद्ध भव होत तन्न ॥ ३१ ॥
ब्रह्मच पुरान दस सहस जुद्दि । जिद्दि पढ़न सुनत तन तप्प छुद्दि ॥
पञ्चास पंच हजार गन्नि । पद्मच पुरान तिन कह्यौ बन्नि ॥ ३२ ॥
तेतीस सहस सैं चारि जानि । विष्णू पुरान विष्णू समानि ॥
साहब ने जो अरबी صبر सब्र शब्द होना अनुमान किया है वह अयुक्त है क्योंकि अरबी صبر सब्र
शब्द का अर्थ यहां सर्वरीत्या अघटित है किन्तु मानना चाहिये कि चंद ने हिन्दी सवरि शब्द का छंद
टूटने के कारण सबरि प्रयोग किया है और रासे की किसी २ पुस्तक में ऐसा पाठ भी मिलता है ।
जो इस शब्द को रकार और बकार के उलट पुलट लिखे जाने से सरब शब्द होना भी हम माने
तथापि यह कुछ असंगत नहीं है ॥
१२ इस में प्रसन्न शब्द का पाठ किसी २ पुस्तक में मिलता है परंतु यहां छंद टूटने के
कारण कवि ने प्रसन करके प्रयोग किया है ॥
१३ इस कवित्त के भिन्न २ पुस्तकों में जो यह पाठ मिलते हैं वे अयुक्त हैं जैसे:-कहे, वर,
दानि, पक्कू, नट्ठ, य, अंध्रक, और मल ॥
१४ इस रूपक के अशुद्ध पाठान्तर अन्य पुस्तकों में यह हैं:- अष्टादस, कहै, सभेव, बन्हिहो,
तवनि, तप्प, पंचास, पंचह, च्यारि, तिष्ण, अठार, भागवंत, तहां, तेईस, दुख, संपूर्, अग्नि, पठि
इग्यार, अच्छ, पछ, कूरभ, मन्छ, भक्ति, डरांन, सहंस, और नंस ॥
इस रूपक के ४१ वें छंद की एक तुक भाषा के कवि घटती बता कर चंद पर दोषा-
रोपण करते हैं परंतु यह उन की भूल है क्योंकि चंद ने इस छंद को एक ही तुक में कहा है