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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 43, कुल 470 में से

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पृष्ठ 43

२६ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
अरिल्ल ॥ हं कवि चंद मित्त खेवच पर । अरु सुचित सामंत सूर बर ॥
बंधौं कित्ति प्रसार सार सच । अछ्छों बरनि भंति थित्ति थह ॥
॥ छं० ॥ ९४ ॥ रू० ॥ ५० ॥
॥ राजा परीक्षित की तक्षक दंशन और जन्मेजय की
सर्पसत्र कथा ॥
हनुफाल ॥ इति हनूफालय छंद । कल बरनि बरनि सुकंद ॥
नहि नाल पिंगल जोर । दुज हुंतो दुजनिय भोर ॥ ९४ ॥
संसार बंधन दोय । इक पर्यौ विद्य समाय ॥
तन देहू अच्छर एक । नहिं पिंग पिंगल सेक ॥ ९५ ॥
किचि काज मरन सुविप्प । लहि नाग रूप सु अप्प ॥
हरि हस्यौ बाचन आइ । तिहिं कह्यो पिंगल चाइ ॥ ९६ ॥
द्वै विद्य रूप सु अङ्ग । खो गयौ छल करि सङ्ग ॥
खो तच्छ बीर प्रमान । जुग जुगनि निश्चल ध्यान ॥ ९७ ॥
इक हुंतो सिंगिय रिष्य । तप करै बाल विसिष्य ॥
नृप गयौ बर आखेट । दिषि अप्य मृतक बेट ॥ ९८ ॥
बाराह रूप प्रमान । लग्गयौ सु ब्रह्म धियान ॥
दह बार बूझ्यौ राज । दुज दिय न उत्तर काज ॥ ९९ ॥
लखि चित्त विच सपूत । यां भयो रिष अवधूत ॥
रूंध्यो ताम तामस राज । लियो गीन मंच विराज ॥ १०० ॥
कस्सान कोनक्क संधि । नृपराज दुज गलबंधि ॥
फिरि गयो ग्रेह प्रमान । आयो सु बालक थान ॥ १०१ ॥
५० दृष्टि में रखने की बात है, जैसे महाभारतादि महापुराणों में समग्र ग्रंथ के आशय का सार
एक अथवा दो अथवा तीन अथवा चार श्लोकों में वर्णन किया गया है वैसे ही चंद ने भी अपने
इस महाकाव्य का सार इन ( ४८ से ५० तक ) तीन रूपकों में वर्णन किया है ॥
५१ पाठान्तरः-हनुफाल । हनूफाल । विह्यस । मोय । न । न । अच्छर । हर्यो । तिहिं । चायि ।
द्वे । तंछ्य । जुगिंनि । हुंतो । रीष्य । बालवि । सिष्य । बुझ्यौ । दियऊ । चित्र । चित्रस । कोनक्क ।
नवि । तुल्लि । तिहिं । अति लोल दिषि रिषि लोड । लोई । समोई ॥
हमारे पाठकों को ध्यान में रखना चाहिये कि चंद कवि ने इस कथा को महाभारत के
आदि पर्व के अध्याय ४० से ५८ तक और भागवत के पहिले स्कंध के अध्याय १८ और १६ और
दूसरे स्कंध के पहिले १ अध्याय से उद्धृत और संक्षिप्त करके वर्णन कियो है । यदि कोई इस कथा