पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
चल्यौ रिषि चमंके ताम । गुर गुरनी कों करै प्रनाम ॥
चिंतत इष्ट चल्यौ वर राहं । संपत्तौ यौँ सद नृप ठाहं ॥ १४८ ॥
जच्चै कुंडल बिखिय पासं । खोइ समर्पै विधि बर तासं ॥
विप्र प्रसंसै समपे कुंडल । कढि डर तच्छक बीच नीच छल ॥ १४९ ॥
लै कुंडल चल्यौ हरषे मन । आय्यौ राज विप्र अन्यो अन ॥
क्रम्यौ विप्र राह चंचल चर । छलि तच्छक लीनें कुंडल वर ॥ १५० ॥
क्रमयौ विप्र पुठि अति चंचल । धरि अहि रूप सु गयौ रसातज ॥
विख दूखै ठट्ठौ रिषि तामं । दुमत चित्त भय विघ्न विरामं ॥ १५१ ॥
अस्तुति इन्द्र करन लग्यौ रिषि । नंब्बौ बासव खिनक वज्र सिष ॥
त्रित अखित दीयौ आखंडल । धर रिषि तक्खि घात विख मंडल ॥ १५२ ॥
पैठा विप्र नागपुर ठासं । धोम प्रगहै मंच विरामं ॥
दूख्यौ पुरष एक षट आरं । फेरे चक्र तास फिरि तारं ॥ १५३ ॥
दूख्यौ बाह्र बाह्र सत वारं । उंच तेज आजेज अपारं ॥
यौँ नर नारि अश्व वर नामं । वे अह्र हय्य बेई सम कामं ॥ १५४ ॥
चिसत सठि तां तंति ठार्यं । अद्ध खेत स्यामं अध तार्यं ॥
अहि धुत्तेन उपाडू सबाहं । फुंकत पुंकू सधुम्स सराहं ॥ १५५ ॥
पुंकत पुंख धार धुस चली । लग्गै नाग अंग सह थल्ली ॥
प्रगटे अंसू पलक्क उघ धत्ति । अंप्यो कुंडल नाग मान छति ॥ १५६ ॥
ग्हि कुंडल अप्ये गुर वालं । गुर विद्यां अप्पी अभिरामं ॥
दुज वर वज्र पैठ जेहा धर । बिख अखित तिव थान मंडि थिर ॥
छं० ॥ १५७ ॥ रु० ॥ ७९ ॥
दूहा ॥ बिख अथाह तिवि थान भय । बहुत संवच्छर वित्त ॥
पृथुल कराल कराल भौ । जिम जिम काल बितित्त ॥
छं० ॥ १५८ ॥ रु० ॥ ८० ॥
वर्ज । आक्षत । दियौ । रिखि । पैठो । बैठो । धोमं । ठाम । बिराम । फेरै । वाह्र । जो ।
तामं । बे । हथ । वे । ईस । मकामं । बेइम । सठि । ता । तँति । ठार्य । उपाय । स्याम ।
धुत्तेन । फूंकत । सधुम । धूम । लगे । थली । अंशू । कुंड । आप्यो । हित्ति । मनि । यही ।
रामं । पेठि । आक्षेत । आक्षित ।
८० पाठान्तर :- वित । प्रियमुल । प्रभार । विवित ॥