पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ३३
॥ वर्तमान आबू पर्वत के उद्धार की कथा ॥
॥ उस तक्षक का आबू पर अपना अर्बुद नाम धर रहना ॥
कवित्त ॥ स तछ आवू प्रमान । मंदीयौ सू अचल कर ॥
गरब गरूर तें विडुरिं । सुडरु रह्यौ जु संत धुर ॥
अचल ईस प्रति ताम । अचल आचित्त अचल घर ॥
देव देव प्रारत्थि । इन्द्र मुक्किय इंडिय धर ॥
अरबुद नाम धर जुत्तिया । दूर तपित थथराइया ॥
कलपान पुहुप अरु वस्त्र गुरु । झांच गुरु गुर झाइया ॥
छं० ॥ १३३ ॥ रु० ॥ ७६ ॥
॥ गालव ऋषि के शिष्य उत्तङ्ग का उपाख्यान ॥
दूहा ॥ सो आवू उद्धार विधि । कह्यौ कथा * परबंध ॥
ज्यौं अनादित्या रिष्य मुख । सुनी सु गुर समबंध ॥
छं० ॥ १३४ ॥ रु० ॥ ७७ ॥
गुरु गालव उत्तंग सिष । बहु विद्या पढ़ि जाम ॥
पय लग्गौ गुर राज कें । कहौ दक्कुना काम ॥
छं० ॥ १३५ ॥ रु० ॥ ७८ ॥
वाघा ॥ गालव रिषि सिष्य उतंग । दिय विद्या बुध क्रम क्रम अंग ॥
गुर दषिन कज्जैं गुर जच्चै । गुर पतनी तब मंगि विरच्चै ॥ १३६ ॥
कुंडल जच्चि षिचिया कानं । अप्यौ जासु दषिना दानं ॥
दिवस अठमी व्रत अपंडै । चरचौं दान विप्र श्रुत मंडै ॥ १३७ ॥
७६ पाठान्तर :- सो । तक्षक । आ । चित । बर । मुकिय । रूडीय । जुतिय । तप्यित । छाईया ॥
स = वह का वाचक और तछ = सर्प = तक्षक का वाचक जैसे रु० ५१ की ८ तुक में तच्छ प्रयोग हुआ है ॥
७७ पाठान्तर :- रिष्य ॥
७८ उतंग । जास । कै । दछना ॥
७६ पाठान्तर :- उत्संग । दखिन । गुरपतनी । मंगि । दत्तिना । अपंडे । मंडे । करे । संपनी ।
न्रिप । प्रस॑से । संसष्ये । तव्यक । बीच । रपै । अंचल । इपै । इपे । ठठौ । ताम विराम ।
- हमारे पाठकों को ध्यान में रखना चाहिये कि चंद अर्बुद के उद्धार की कथा अर्बुद खण्ड
अर्थात् आबू महात्म्य नामक संस्कृत ग्रंथों से संग्रह करके वर्णन करता है । जिन पाठकों के पढ़ने में
अथवा सुनने में यह ग्रंथ आये हैं वे जान सक्ते हैं कि कवि ने थोड़े में बहुत ही आशय लिया है
और उत्तङ्ग का उपाख्यान महाभारत के आदि पर्व के पौष्यपर्वाध्याय नामक द्वितीय अध्याय में से
भी कवि ने संग्रहीत किया है ॥
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