पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पाँचवां समय ६ ] पृथ्वीराजरासो । २८६
तुरस फहि कटि गुरज । सुकुट करि रेष रिपेसर ॥
असि कट्टत वर रोस । उदर वर बचिय सु ओझर ॥
विन पत्त मत्त जनु डंड डक । रंभ पंभ कर कटीयध्वज ॥
तिच्चि काज साज साकत्त सुरर । सु गुरुर पठाइय गुहरध्वज ॥
छं० ॥ ५१ ॥ रू० ॥ २७ ॥
माधव खवास का युद्ध ॥
कवित्त ॥ काम धाम रिम राच । स्याम जिम धाम पिथ्यपति ॥
पत्त लत्त दिय रोस । फद्दि किप्पाट थाट भजि ॥
धसिय मध्य माधव षवास । आय पत्तौ तहां आरौ ॥
लगिग वथ्थ विन नत्थ । संड मल्ल मच्चि अपारौ ॥
जम दट्ट कट्ठि चालुक चँपि । दिच्छ पाँनि पावार उर ॥
मंडलु दिनेस में भेद करि । सुपाट परट्टिय ब्रह्म पुर ॥
॰ छं० ॥ ५२ ॥ रू० २८ ॥
कन्ह का युद्ध ॥
कवित्त ॥ परि भूमि पावार । उररि भंजन किवार दुव ॥
तव लगि कन्ह तमंकि । आइ पहुंच्यौ अंतकलुच्च ॥
मुक्कि रोस असि तमसि । घाइ सिर जाइ रह्यौ उत ॥
मनहुं सत्ति वल्ल दैन । अंग जनु हन्यौ अजा सुत ॥
तिन हनत सिंभु धुन हनिय सिर । राज गेह मधि समर हुच्च ॥
हल चलकि मच्चि कोलाहलह । हाय हाय दरबार हुच्च ॥
छं० ॥ ५३ ॥ रू० ॥ २९ ॥
२७ पाठान्तर—सुजानि ! वीन । आकास । शीस । रिषीसर । औझर । उझर । कटीय ।
स्वन । तिहिं । तक्के सुरर ॥
२८ पाठान्तर—कांम । धांम । स्यांम । घांम । प्रथ्यपति । पत । लत । पट्टि । क्लिपाट ।
मधि । लगि । बथ । नथ । मच्चि । जमदठ । चालुक । चंपि । दिठ । गै । परठिय ॥
२९ पाठान्तर—तमकि । हुअ्र । मुकि । शिर । मनहुं । शक्ति । देन । हलहलिकि । मचि ।
हाइहाइ ॥
२६० पृथ्वीराजरासो । [पांचवां समय १०
चालुकों के मारे जाने से दरबार में कोलाहल होना ॥
दूहा ॥ कोलाहल दरबार भौ । सुनि चालुक मत सध्य ॥
धसिय पौरि गज मत्त सम । पुच्छत पुच्छत कथ्य ॥ छंदं० ॥ ५४ ॥ रु० ॥ ३० ॥
झिंक रुधिर उठ्ठत गिरिय । परिय सच परिधारि ॥
दिषि चालुक भत तेह टग । कुलच्च बाजि जनु डारि ॥ छं० ॥ ५५ ॥ रु० ॥ ३१ ॥
कवित्त ॥ संकर सिंघ कि कुट्टि । कुट्टि इन्द्रच्च कि गरुअ गज ॥
कि महिष कुट्टि मय मत्त । भरिय दीयौ कि दुट्ठ कजि ॥
भौ कि हांस रस रोस । मद्धि रावन्त विरच्चिय ॥
कोलाहल बल कूक । मज्झ रावर छल मचिय ॥
चालुक्क षवास ताकथ्य कथि । कोलाहल इन जानि घर ॥
कुंडिय सयल बोच्चिय नृपति । हनिग कन्ह सारंगधर ॥
छं० ॥ ५६ ॥ रु० ॥ ३२ ॥
दूहा ॥ अर प्रताप दरबार के । ढार घरे मय मत्त ॥
सुनत बत्त इह कन्हि परे । मनु निस तुहि नछत्त ॥ छं० ॥ ५७ ॥ रु० ॥ ३३ ॥
कवित्त ॥ निसि षह तुहि नछिच । रोस महिषा कुटि वातन ॥
परि कि दीप पातंग । सिंघ जनु कुट्टि क्षुधा तन ॥
यों तुहैं भर भरन । अररि भैभीर सुभग्गिय ॥
मनहुँ परा पति चुनत । परिय सिंचान अचिंतिय ॥
परि रौर पौरि दीनी दरकि । धरकि कूच कन्ह पौरि बिचि ॥
झेलत सब संत कलहंत जनु । पारथ सम भारत्थ मचि ॥
छं० ॥ ५८ ॥ रु० ॥ ३४ ॥
दूहा ॥ माया मोह विरत्त मन । तन तिनुका सम डारि ॥
३० पाठान्तर-सथ । मत । पुछत । कथ ॥
३१ पाठान्तर-बाजं । यह रूपक सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है ॥
३२ पाठान्तर-भरीय । दीपि । मधि । रावत । विराचिय । मन्न । मचिय । कथ । जांन ॥
३३ पाठान्तर-मत । बत । मनौं । नछिच ॥
३४ पाठान्तर-नक्छित्र । परियं । संघ । मनौं । मनहुं । अचितीय । दीनीय । बच । पेलंत । स । भारंथ ॥
३५ पाठान्तर-विरतं । पिय ॥ यह रूपक सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है ॥
२६२ पृथ्वीराजरासो । [ पांचवां समय १२ ,
दूहा ॥ पच भरैं जुग्गिनि रुधिर । ग्रिधियं मंस डकारि ॥
नचौ ईस उमया सहित । रुंड माल गल धारि ॥ कूं० ॥ ६६ ॥ रु० ॥ ३९ ॥
कंद पद्धरी ॥ दरवार ताल रुधि भरित वारि । द्रुक हथ्थ·रत चढ़ी किनारि ॥
तिन मधि मग्न तरु जिम मजंत । धर धारि मारि जे धुकत मंत ॥
॥ कूं० ॥ ६७ ॥ रु० ॥ ४० ॥
दूहा ॥ * खेल मच्यौ दरबार सन्नि । मत्त गवार बसंत ॥
सिर भ्रुक बिनु धावइ करै । सुभट सुअंगध कंत ॥
॥ कूं० ॥ ६८ ॥ रु० ॥ ४१ ॥
कंद लघुनाराच ॥ धुंकंत धार धार सैं । बकंत मार मार सैं ॥
झुकंत झार झार सैं । तकंत सार तार सैं ॥ ६९ ॥
डकंत भूत डाक सैं । कसंत बीर बाक सैं ॥
परंत छीन पाइट्टै । झरंत हथ्य घाइट्टै ॥ ७० ॥
खरंत संत मंत सैं । घुरंत घाइ घंत सैं ॥
सुभग्ग अंगुली थिरैं । फबी सुकैर विध्युरैं ॥ ७१ ॥
नचंत घाइ नारदं । ठरै सुधाइ ठारदं ॥
अभक्कि रुद्धि अम्भसे । बबक्कि रह बह से ॥ ७२ ॥
चबक्कि ढाक चक्कए । चवक्कि कुंभ चक्कए ॥
म्रोरित्त मुच्छ मुच्छए । चढ़ी सु आनि चच्छए ॥ ७३ ॥
चलंत हाथ चंचलं । परंत बांन पंचलं ॥
भिदंत भांन मंडलं । भयौ सु नष्ट कुंडलैं ॥ ७४ ॥
बहंत मोष बहए । छराकि लग्गि छहए ॥
कटंत सीस कहए । रिनंक षत्त फहए ॥ ७५ ॥
फटंत फंफ फेफरं । गटंत पेषि केफरं ॥
बजंत घाव घुंमरे । मनौं परेव घुंमरे ॥ ७६ ॥
३९ पाठान्तर-ग्रिधय । ग्रिधिय ॥
४० पाठान्तर-हथ्थ । रत । चढ़ी । मधि । ते ॥
४१ पाठान्तर-मत्त । गवांर । बन्नु । धावहं ॥
* यह रूपक सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है ॥
पांचवां समय १३] पृथ्वीराजरासो । २६३
कुट्टैं सिरं करायरं । कपास ज्यौँ पिंजारयं ॥
फुटंत घौ सुषोपरी । कि जोग पच टोपरी ॥ ७७ ॥:
कटंत जंघ कुंभए । मनौ सुरंभ गिंभए ॥
- परीय संझ सामयं । चलुक्क रक्ख नामयं ॥ छं० ॥ ७८ ॥ रू० ॥ ४२ ॥
सांझ हो गई परन्तु लड़ाई न रुकी ।
कवित्त ॥ परिय संझ जग मंझ । टरिय कंकन रंकन धन ॥
भरिय पच जुगिनीय । करिय सिव माल सीस घन ॥
मुरिय न श्रित चालुक्क । धरिय रसरोस कन्ह हिय ॥
पैरि चलिय दरबार । सोच गज घटि उपटिय ॥
मय मत्त मार मनौ उररि । झररि झर्रि भगिय अनिय ॥
द्वै घरिय लोह बुट्ठौ लचरि । पेख कयौ किगवारनिय ॥
॥ छं० ॥ ७६ ॥ रु० ॥ ४३ ॥
दूहा ॥ कान्ह जाइ संमुह परत । कला एक मचि रारि ॥
सत सारघ दूनौ कटै । भजै अबर तजि ढार ॥ छं० ॥ ८० ॥ रु० ॥ ४४ ॥
कान्ह चौहान का युद्ध जीतना ।
करपा ॥ झरै (सार) सिर मार विकरार रक्तन भरत ।
परत धरनीथ द्वैरै जरकि जूपी ॥
चक्क चहुवांन चालुक्क भृत उपर चर ।
कोपियं कन्द मनौं काल रूपी ॥ छं० ॥ ८१ ॥
रुंड भकरुंड किय तुंड मुंडन रुइत ।
वाचि सिर सार मनौँ मेच बुट्ठै ॥
४२ पाठान्तर-धकंत । सौं । हकंत । हूँ । हथ । घाय । पिरें । पीरें । विस्तरै । घाय ।
भभकि । रुंधि । भट्ट । भट्ठ । वर्षकि । रद । बद । हवकि । हक्कए । चवकि । चक्कए । मोरित्त ।
म्रोरिर । मुंक्क । मुरु । मुक्कए । श्रॉनि । चक्रए । नट । रिनेंकि । पत । मनौ । कुटं । शिरं । ज्यौं ।
यों । मनौँ । * यह पाद सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है ॥
४३ पाठान्तर-शिव । चालुक । पैट । चलीय । घट । उपटिय । भाठीय ॥
४४ पाठान्तर-जाय । समुह । दूनौं । कटे । भजि ॥
४५ पाठान्तर- अधिक पाठ है । धरनि । मनौ । जम । दारि । नृघात । † यह रूपक
सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है ॥
२६४ पृथ्वीराजरासो। [ पांचवां समय १४
कूछ करि जूछ संम्रुच्छ को कोक धर ।
रोस रिम राच जेम जीव कुद्है ॥ कुं० ॥ ८२ ॥
पांनि करि पांनि अरि पांनि करंनीय छक ।
सीस अरी पारि सब षेत सींच्यौ ॥
भ्रात सोमेस नृपघात भंजन भरम ।
षेत भयकार षय काल षीज्यौ ॥ कुं० ॥ ८३ ॥ रु० ॥ ४५ ॥
श्लोक ॥ हनिनं निनायकं सेना, कथितं न च पूर्वयम् ।
अयुद्धं चक्रतं एषां, विना स्वामि रणे युधम् ॥ कुं० ॥ ८४ ॥ रु० ॥ ४६ ॥
प्रतापसिंह आदि के मारे जाने का समाचार
सुनकर पृथ्वीराज का अप्रसन्न होना ॥
दूहा ॥ नीठ बिसासत अप्प भर, गह्यौ कन्ह चहुआन ।
गए ग्रेह लै सकल मिलि, प्रथीराज अकुलान ॥ कुं०॥ ८५ ॥ रु० ॥ ४७॥
पारि श्रित्त चालुक्क भर, मध अजमेर प्रमान ।
सात भ्रात भीमच्च छते, रन जीत्यौ भर कांन ॥ कुं० ॥ ८६ ॥ *रु० ॥ ४८ ॥
पृथ्वीराज की अप्रसन्नता सुनकर कान्ह चौहान का घर बैठ
रहना, तीन दिन तक अजमेर में हरताल पड़ना ॥
बत्त सुनी तब कन्ह नें, षिज्यौ कुँअर प्रथिराज ।
बैठि रहें तब निज सुघर, अंदरवार समाज ॥ कुं० ॥ ८७ ॥ †रु० ॥ ४८ ॥
तीन दिवस अजमेर में । परी इंद हटनार ॥
हूछ कोछ बज्यौ विषम । लग्यौ सु भूत भुआर ॥ कुं० ॥ ८८ ॥ रु० ५० ॥
मधि बजार चलि रुधिर नदि । रुस्त तुंड घन मुंड ॥
बर्कि कान्ह चहुआन करि । तिल तिल सम तन तुंड ॥
॥ कुं० ॥ ८९ ॥ रु० ॥ ५१ ॥
४६ पाठान्तर-हननं । यं । असुहुं । स्वामी । रिने । जुधं ॥
४७ पाठान्तर-अप । चहुंआन । अकुलांन ॥
४८ पाठान्तर-मध्य । प्रमान । * यह रूपक सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है ॥
४६ पाठान्तर-बत । षिजयं । कुंअरं । प्रथीराज । रहै । † यह रूपक कौलफील्ड वाली पुस्तक में नहीं है ॥
५० पाठान्तर-हट । हटतार । भुक्तार ॥ ५१ पाठान्तर-चहुवांन । तिन ॥
पांचवां समय १५ ] . पृथ्वीराजरासो : २६५
सात दिन तक कान्हके न आने पर पृथ्वीराज का उनके घर
मनाने को जाना और कहना कि संसार में यह बुराई
हुई कि घर बुलाकर चालुक्यों को मार डाला ॥
कवित्त ॥ सात दिवस जब गए । कन्ह दरबार न आए ॥
तब प्रथिराज कुँआर । अप्प मनए गृह जाण ॥
तुम ऐसी क्यौं करौ । अप्प सिर चढिय सुकाई ॥
कहिहैं सब चहुआन । छने चालुक्क सुराई ॥
आणि विषैं अप्पन सुघर । सो रावर ऐसी करिय ॥
इक दोस अप्प लग्ग्यौ खरौ । बत्त वित्तरीय जग बुरिय ॥
॥ छं० ॥ ८० ॥ रु० ॥ ५२ ॥
कान्ह का कहना कि मेरे सामने दूसरा कौन सभा में बैठकर
मोछ पर ताव रख सकता है ॥
दूहा ॥ कही कन्ह चहुआन तब । सो बैठें कोइ आनि ॥
सभा मद्धि संभरि अवर । मुच्छ धरै क्यौं पानि ॥ छं० ॥ ८१ ॥ रु० ॥ ५३ ॥
पृथ्वीराज का कहना कि तो आप आंख में पट्टी
बांधे रहा कीजिए ॥
करी अरज प्रथिराज वर । जो मानौ इक कन्ह ॥
सभा बुराई जौ मिटै । चष बँधि पह रतन ॥ छं० ॥ ८२ ॥ रु० ॥ ५४ ॥*
पृथ्वीराज का जड़ाऊ पट्टी बनवाकर अपने हाथ से कान्ह
के आंख में बांध देना ।
तब प्रथिराज विचार करि । चष आछौ हो पह ॥
बहुरि कोइ भर भोरछी । धरत परै इक बह ॥ छं० ॥ ८३ ॥ रु० ५५ ॥
५२ पाठान्तर-कुंआर । अप । शिर । काइय । कहिहैं । चालुक । राइय । विषै । करौय । लग्यौ । विस्तारिय ॥
५३ पाठान्तर-कोई । आंनि । मधि । संभरी । मुछ । पांनि ॥
५४ पाठान्तर-पृथ्वीराज । जौँ । माँनौँ । जौँ । बधि । * संवत् १६४० की प्रति में यह नहीं है ॥
५५ पाठान्तर-पृथ्वीराज । घंट । बट ॥
६ !
२६६ पृथ्वीराजरासो । [ पांचवां समय १६
मनी बत्त सुसत्य मन । लै जराव को पह ॥
राजन कन्ह चष बंधवी। मनौं सिरी गज घट ॥ कूं० ॥ ८४ ॥ रु० ॥ ५६ ॥
कवित्त ॥ पाव लष परिमान । मोज किंमति ठहराइय ॥
तौल टंक इक्कीस । नयन आकार सवारिय ॥
जरिय जवाहर मद्धि । अरक उद्योत प्रकासिय ॥
दिष्टि मंडि देषंत । दुअन उर चंदर चासिय ॥
कंचन किखाव नगाथ कज्ज । पट्टी बंधिय चंद भट ॥
तिहि बेर कन्ह चहुआन चष । रूप प्रगटि अति षिचि षट ॥
कूं० ॥ ८५ ॥ रु० ॥ ५७ ॥ †
दूहा ॥ पाटी बंधिय कन्ह चष । हूह ओपम करि अषि ॥
तन सरवर जज बीर रस । ओटा बंधि सुरषि ॥ कूं० ८६ ॥ रु० ॥ ५८ ॥ †
पट्टी रात दिन बँधी रहती थी ॥
दूहा ॥ सो पट्टी निस दिन रहै । छोरि देइ द्वै ठाम ॥
कै सिज्या वामा रमत । कै कुहत संग्राम ॥ कूं० ॥ ८७ ॥ रु० ॥ ५९ ॥
करि सुचित्त चित्त कन्ह कों । प्रथीराज रस भाइ ॥
अवर सूर सामंत सब । रहे चीय सुख पाइ ॥ कूं० ॥ ८८ ॥ रु० ६० ॥
एक बाज ऐराक्क बर । हंस नाम अवनीस ॥
साजि साजि राजन रजक । कन्ह कीन वगसीस ॥ कूं० ॥ ८९ ॥ रु० ६१ ॥
जम दढ इक्क जराव जरि । एक उंच सिर पाव ॥
नर (सु*) नाचर वर कन्ह कों । कीनौँ कुँअर पसाव ॥
कूं० १०० ॥ रु० ॥ ६२ ॥
५६ पाठान्तर-मानी । सति । पट । राज हथ चष कन्ह वंधि । मनुं । सरी । घट ॥
५७ पाठान्तर-परिमांन । ठहराईय । तोल । मंधि ।
५८ पाठान्तर-अषि । रषि ॥ †ये दोनो रूपक संवत १६४७ की पुस्तक में नहीं हैं ॥
५९ पाठान्तर-निशि । सेज्या । संयाम ॥
६० पाठान्तर-चित्त । भाय । चाय । पाय ॥
६१ पाठान्तर-ए । नांम ॥
६२ पाठान्तर-शिरपाव । *अधिक पाठ है ॥ कों । कोनी । कुंअर ।
पांचवां समय १० ] पृथ्थीराजरासो । २६७
कान्ह चौहान की प्रशंसा ॥
कवित्त ॥ इसौ कन्ह चहुआन । जिसौ भारत्थ भीम वर ॥
इसौ कन्ह चहुआन । जिसौ द्रोनाचारज वर ॥
इसौ कन्ह चहुआन । जिसौ दससीस बीसभुज ॥
इसौ कन्ह चहुआन । जिसौ अवतार बारि सुज ॥
जुध बेर इम्म तुहै जुरिन । सिंघ तुहि लषि सिंघनिय ॥
प्रथिराज कुँअर साहाय कज । दुरजोधन अवतार जिय ॥
छं० ॥ १०१ ॥ रु० ॥ ६३ ॥
दूहा ॥ जहँ जहँ राजन काज हुअ । तहँ तहँ होइ समत्थ ॥
मेर हथ्थ बथ्थह भरै । नर नाहां नर नत्थ ॥ छं० ॥ १०२ ॥ रु० ॥ ६४ ॥
चालुक्य राजा भीम का अपने भाइयों के मारे जाने का
समाचार सुन कर बहुत दुःखी होना ॥
गाथा ॥ फुट्टिय वत्त प्रहासं । अनिलं बसिजम परिमउयं ॥
सुनियं चालुक भीमं । सारँग सुत हंत चहुआनं ॥
छं० ॥ १०३ ॥ रु० ॥ ६५ ॥
जल्लियं चालुक नाथं । अग्गि विलत्तिय उच्चर मन्नायं ॥
मुक्किय नृप नीसासं । मंनिय दुष भ्रात अप्पायं ॥
छं० ॥ १०४ ॥ रु० ॥ ६६ ॥
भीम का पृथ्वीराज से भाइयों के पलटे में लड़ाई मांगना ॥
दूहा ॥ अति दुख मन्यौ भीम चिय । लिखि कग्गद चहुआन ॥
सत्त भ्रात मेरे हते । इहै बैर अप्पांन ॥ छं० ॥ १०५ ॥ रु० ॥ ६७ ॥
६३ पाठान्तर—इसां । चहुवान । जिसो । भारथ । द्रोणाचारिज । एम । इम । सिंहनीय ।
प्रथीराज । दुर्योधन ॥
६४ पाठान्तर—जहां २ । तहां २ । होय । समय । हथ । बथह । भरैं । नृथ ॥
६५ पाठान्तर—बत । सुनीयं । सारंग । चहुवांनं ॥
६६ पाठान्तर-लग्गि । मनीय ॥
६७ पाठान्तर—कगर । चहुवांन । सात । अप्पांन ॥
२६८ पृथ्वीराजरासो । [पांचवां समय १८
पृथ्वीराज का उत्तर देना कि हम तयार हैं जब चाहै आओ ॥
सुनिय राज चहुआन वर । दिय कग्गद फिरि तेह ॥
जब तुम मंगौ बैर वर । तब हम बैर सुदेंच ॥ छं० ॥ १०६ ॥ रु० ६८ ॥
भीम का चढ़ाई के लिये तय्यार होना पर सरदारों के कहने
से वर्षा ऋतु भर ठहर जाना ॥
कवित्त ॥ बाँचि कग्गद चालुक्क । रोस लग्यौ अयान कह ॥
करो सेन सब एक । चलो अजमेर देस रह ॥
तब कह्यो बीर परधान । मास पावस्स रहैं घर ॥
करि कातिग घन कटक । छनै चहुआन सोम बर ॥
सुनि राज अप्प मन्यौ सुद्धिय । उत्तरु सब जन अवर नर ॥
उपसम्म रोस चालुक्क नृप । षिन षिन वित्तिय जेम थिर ॥
छं० ॥ १०७ ॥ रु० ॥ ६९ ॥
उपसंहार का कथन ॥
दूहा ॥ रहै राज अजमेर मधि । संभरेस चहुआन ॥
निसि दिन यौँ क्रीला करै । ज्यौं अवतार सुकान्ह ॥
छं० ॥ १०८ ॥ रु० ॥ ७० ॥
इति श्री कवि चन्द विरचिते पृथिराजरासके कन्हाष्षपट्ट
बन्धनं नाम पञ्चम प्रस्ताव संपूर्णम् ॥ ५ ॥
६८ पाठान्तर-कग्गर । मगौ ॥
६९ पाठान्तर-बंचि । कग्गर । लगौ । अयासकह । अयासकहि । रहि । प्रधान । मांस ।
पावस । कात्तिक । मन्यौ । उपसंमि । वित्तोय ॥
७० पाठान्तर-चहुवांन । यों । ज्यां ॥
अथ आखेटक वीर वरदान वर्णन समय लिख्यते ॥
⁓⁓⁓
( छठां समय )
पृथ्वीराज के कुँअरपने के तपतेज का वर्णन ।
कवित्त ॥ कुँअरप्पन प्रथिराज । वर्ष विय सपत समर तन ॥
समुच्च तेज असहेंज । हरन तम शेर समर गन ॥
उर किवार भुज वज्र । अंग वज्रंग पलन लुच्च ॥
भुज भुजंग वर जोर । जोर ब्रंनह संचुन भुच्च ॥
अनभंग अंग जनु अंगदह । पवन पाइ आखेट सहि ॥
सँग डारि श्वान जीवन लषै । सवन अग्ग अपजह निवहि ॥
छं० ॥ १ ॥ रू० ॥ १ ॥
कवित्त ॥ वर्षत सोभा नैन । मैन जनु मुदित सरित सर ॥
हरष हास मुख कंति । विकासि जनु कमल सूर वर ॥
मधुर सबद गुंजार । जानि गंभीर हरिय सद ॥
गयन गरुअ गज भंति । चलत कुल चालि वेद वद ॥
चहुआन सूर सोमेस सुच्च । धुअ जनु सुच्च अवतार लिय ॥
मन हरनि हरत मन पिष्पि कै । जनुँ विधिना अप हथ्थ किय ॥
छं० ॥ २ ॥ रू० ॥ २ ॥
छंद पद्धरी ॥ रहै सुभट यह प्रथिराज संग । जै पैज गंग सुच्च कप्पि पंग ।
षट रस विलास अंनन अपार । भुक्तंत भोग भट सुभट लार ॥ छं० ॥ ३ ॥
१ पाठान्तर–सं० १६४७ की पुस्तक में इस का ऐसा पाठ है:–“कुअरपन पृथीराज । वर्ष
विय बीस समर वरय । समुह तेज अस हेज । जोर ब्रंनह संचुन भय । भुज भुजंग वर जोर । हरन
तरोर समरगन । उर किवार भुज वज्र । अंग वज्रंग पलन मन” ॥ बाकी दोनों तुक जैसे
के तैसे हैं ॥
२ पाठान्तर–शोभा । नैन । मैंन । उदित । सरनि । कांति । विकसित । जांनि । कुलि ।
चहुआन । सुय । मंन । पिषिकैँ । हथ ॥
३०० पृथ्वीराजरासो । [ छठां समय २
सुरनाथ संग सुर सकल सोभ । बंसह छतीस चहुआन ओप ॥
नव कुलह मध्य नव नाग जानि । तिम जूथ मद्धि गज राज बानि ॥ कुं० ॥४
उडगनन मद्धि गुरदेव कंति । बरनी न जाइ सुत सोम भंति ॥
छह पंच मद्धि ज्यौं इनुअ लंक । तिम पिथ्य कत्थ बल परत बंक ॥कुं०॥५॥
नव ग्रहन मद्धि जनु सूर तोष । ढग भ्रम क्रम संमर अढोष ॥
क्रीडंत अंग रंगह हुलास । विश्नवा पुत्र जनुँ अनक वास ॥ कुं० ॥ ६ ॥
कर तांनि बान कंमांनि धारि । अनभूल घात नंधे उतारि ॥
अद्भुत बान विद्या अभंग । लहै दाव घाव वज्रंग अंग ॥ कुं० ॥ ७ ॥
पाइक अंक खेलत कितेक । गद्दि चिन सुदंत कुहंत एक ॥
आखेटनि पुन लखि जीव घात । गज सिंघ रिंछ कपि कोल पात ॥ कुं० ॥ ८ ॥
है लखै सक्क करि भेद खेद । दिष्षंत नयन सालोच भेद ॥
गज चिगक हूच्छ जानंत सब्ब । नाटक निवास सम सेस कब्ब ॥ कुं० ॥ ९ ॥
सम सिल्प सास्त्र वसु कंम क्रंम । सब वेद रीत रोपंत भंम ॥
यौं तपौ पिथ्य अजमेर मांचि । सोमेस सूर चहुआन छांचि ॥
कुं० ॥ १० ॥ छं० ॥ ३ ॥
पृथ्वीराज की दिनचर्या का वर्णन ।
कवित्त ॥ प्रथम जामि निसि रज्ज । कज्ज दैगै दिषत जगि ॥
दुतिय जाम संगीत । उक्त्व रस कित्ति काव्य जगि ॥
तितिय जाम भोजन । ससय चव जाम विलंघिय ॥
सुप्प सुलष उर अप्प । वारि अप्पी उर वंसिय ॥
घरियार रढिय बंदी पढ़िय । आनि सूर सोमेस जस ॥
उठि ब्रह्म मुहूरत गज बर । हय पष्षरिय सिकार रस ॥
कुं० ॥ ११ ॥ छ० ॥ ४ ॥
३ पाठान्तर-प्रथीराज । कपि । अनन । ज्यो वंश । छतीश । चहुवांन । उप । मधि ।
जानि । मधि । प्रथीराज । बांनि । मंधि । गुरदैव । जाय । मधि । ज्यौं । पिथ । कथ । मधि ।
समेर । विलास । बांन । अनभूल । वांन । पायक । अंग । अन । सिंह । रींछ । यह । हय । सक ।
दिषंत । चिगिकू । हूछ । शिल्प । शासन । यों । पिथ । छाह ॥
४ पाठान्तर-जांमि । निसरज । काज । दिषत । जांम । त्रतीय । जांनि । भोजन । समप ।
जांम । बिलसीय । अप । अप्पियं । वंसीय । बंदिन । ब्रह्म । महूरत । पपरीय ॥
छठां समय ३] पृथ्वीराजरासो । ३०१
पृथ्वीराज का आखेट के लिये निकलना ।
कवित्त ॥ कर पद मत्त धनुष्ष । ढाल आनन सुचक्क रथ ॥
पटह छींस घन सह । विपुछ बद्धीय समग पथ ॥
इक बंधिय इक बधिय । एक भंभिय भ्रम भीर ॥
इक्क सु मृग विफुरीय । इक्क चिकरीय दीन सुर ॥
कवि चंद सोर चिहुँ ओर घन । दिग्घ सह दिग अंत भौ ॥
संकिय सयल्ल जिम रंक उर । द्रुम अरन्य आतंक भौ ॥
छं० ॥ १२ ॥ रु० ॥ ५ ॥
अकेले कवि चंद का वन में भूल जाना ।
कवित्त ॥ जंगल धर सुकुमार । करत आखेट सपत्तौ ॥
संग सूर सामंत । गहन गिरि बोह सुरत्तौ ॥
एक सहस सँग स्वान । एक सत चीते संगह ॥
उभै सत्त सँग हिरन । करत मन पवन सुभंगह ॥
सम विषम विचर वन सघन घन । तहां सव्य जित तित्त धुन्न ॥
भूल्यौ सुसंग कवियन वनह । और नचीं जन संग दुन्न ॥
छं० ॥ १३ ॥ रु० ॥ ६ ॥
एक आम के पेड़ के नीचे एक ऋषि से उसकी भेंट होना ।
दूहा ॥ विपन विचर जपल अकल, सकल जीव जड जाल ॥
परसंपर बेली विटप, अवलंबि तरु तमाल ॥ छं० ॥ १४ ॥
सघन छांह रवि करन चष, पग तर पसु भजि जात ॥
सरित सोह सम पवन धुनि, सुनत श्रवन झचनात ॥ छं० ॥ १५ ॥
गिरि तट इक सरिता सजल, झिरत झिरन चिहुँ पास ॥
सुतरु छांह फल अमिय सम, बेली विसद विलास ॥ छं० ॥ १६ ॥
५ पाठान्तर-घत्त । धनुंक । धनुंक । धनुप । आंनन । चक । चध । सद। बदिय । दृक ।
म्रगा । बिफुरिय । चिहु । उर । दिघ । भ्रंस । सकल । सयलं ॥
६ पाठान्तर-करन । आखेटक । संपतौ । हृद । बोहर । संग । साथ । त्तिंत । भूल्यो ।
कबियन ॥
३०२ | पृथ्वीराजरासो । | [छठां समय ४]
तहां सु अँबतर॒ रिषि इक, अस तन अंग सरंग।
दव दह्यौ जनु द्रुम कोइ, कै कोइ भूत भुअंग ॥ कूं० ॥ १७ ॥ रू० ॥ ७ ॥
गाहा ॥ जप माला म्रिग छालो । गेटा विभूतं जोग पहार्यं ॥
कुविजा खप्पर धय्यं । रिद्धं सिद्धाय बचनयं मभं ॥
कूं० ॥ १८ ॥ रू० ॥ ८ ॥*
कविचन्द का ऋषि के पास जाकर पूछना कि आप कौन हैं ?
दूहा ॥ चंद पिषि चर्यौ सुमन, इक कोइ रूप अलेष ।
पग परसैं दरसैं दरस, उत्तिम भूत अशेष ॥ कूं० ॥ १९ ॥
करि बंदन कविचंद कहि, को तुम आदि अनादि ।
तुम दरसन बिन दिन गए, ते सब बीते वादि ॥ कूं० ॥ २० ॥
तुं † धाता करतार तुं ,भरता चरता देव।
तुं दत्ता गोरस तुची, प्रसन होउ प्रभु मेव ॥ कूं० ॥ २१ ॥ रू० ॥ ९ ॥
ऋषि का पूछना कि तुम कौन हो इस बीहड़ बन में कैसे आए ।
दूहा ॥ कहै जंगम तुं कौन नर, क्यों आगम ह्वां कीन ।
जीव जंत घन विघन बन, जीव जीव बल छीन ॥
कूं० ॥ २२ ॥ रू० ॥ १० ॥
चन्द का अपना परिचय देना ।
गाहा ॥ दरसन देव मुनिंदं । चंदं विरहं च दुप्पदं दायं ॥
अव मुक्का कम्म सुफलियं । दिष्पे सुफल रूप तपसीयं ॥ कूं० ॥ २३ ॥
देवान वरं सिद्धाण दरणं । गुरं नरिंद सनमानं ॥
गय भुम्मि दब्ब नट्ठा । पां मिज्जे पुण्य रेहायं ॥ कूं० ॥ २४ ॥ रू० ॥ ११ ॥
७ पाठान्तर—उपरल । परस्पर । अवलंबि ॥ १४ ॥ झूहनांत । झहनाट ॥ १५ ॥ गिर ।
भरत । भरन ॥ १६ ॥ अंतर । तह । जती । अंग न रंग । द्रुम ॥ १७ ॥
८ पाठान्तर—विभूत । पटार्य । मभं । मंमं ॥
- यह रूपक सं० १६४७ वाली पुस्तक में नहीं है ।
९ पाठान्तर—पिषि । को । परसों । दरसों ॥ १९ ॥ तूं । भर्ता । तूं । दंता । तुहीं ।
होहि ॥ २१ ॥ † यह संस्कृत त्वम् का पहिला हिन्दी रूप है ।
.१० पाठान्तर—जती । तूं । कौंन ॥
११ पाठान्तर— गाथां । दंसनं । चंदं न विरहं इदेहं दंदायं । चंदम । दंदाई । कर्म । दिषे ।
सकल ॥ २३ ॥ सिद्धान । दसनं । भूमि । भूमि । पा । मिजै । पुन्य । रेहा इं ॥ २४ ॥
छठां समय ५ ] पृथ्वीराजरासो । ३०३
दूहा ॥ भद्द जानि कवियन नृपति, नाथ नाम सो चंद ।
आनस में गंगा बही, अव्व गए सब दंद ॥ छं० ॥ २५ ॥ रु० ॥ १२ ॥
जती का प्रसन्न होकर एक मंत्र बतलाना जिसके
वश में बावन बीर हैं ।
कवित्त ॥ प्रसन्न चंद सम जतिय । दिन्न इक मंच दृष्ट जिय ॥
इष्ट आराधत भद्द । प्रगट पचास बीर विय ॥
करि साधन इष्ट साध । व्याधि नासत फल धारिय ॥
गुरु उपदेसद्द पाइ । सकल आधीन अकारिय ॥
धरि कान मंच लीनौ कविय । परसि पाइ अग्गै चलिय ॥
करवे सुपरिप्पा मंच की । रचि आसन अग्गैं बलिय ॥
छं० ॥ २६ ॥ रु० ॥ १३ ॥
चन्द का मंत्र की परीक्षा करना और बीरों का प्रगट होना ।
दूहा ॥ भली बुरी निर्मित कछू, मेटि न सक्कै कोइ ।
याही सों भवतव्यता, कहत संयाने लोइ ॥ छं० ॥ २७ ॥
पसु आखेटक करन कौं, संग नृपति वरदाइ ।
ऐसे में इष्ट भावई, अकसमात हुअ आइ ॥ छं० ॥ २८ ॥
मंच परिख्या करन कौं, बन मझ बैठ्यौ चंद ।
रचि रचना सुचि स्नान करि, धूप दीप पढ़ि छंद ॥ छं० ॥ २९ ॥
रचि आसन्न गनेस मँछ, सिद्धि बुद्धि लखि लाभ ।
पुनि मंचह भैरव जपत, उक्कु गरजिय अभ ॥ छं० ॥ ३० ॥
गैन गद्दर गंभीर धुनि, सुनि ससंक भय गात ।
आनन अग गच्च गंज हुअ, जानि उलक्का पात ॥ छं० ॥ ३१ ॥
सुप दाता माता पिता, सेवक सरन सधार ।
उपवन बैठे चंद जहँ, द्वै पचास पधार ॥ छं० ॥ ३२ ॥
मंच जंच धारंत मन, आकर्षे जब चंद ।
प्रगट दरस दीने सबन, कवि उर बध्यौ अनंद ॥ छं० ॥ ३३ ॥
१२ पाठान्तर-नृपति । नांम । आल समैं । आल समय । अब ॥
१३ पाठान्तर-दीन । भट । प्रंचास । ए । नासन । धारीय । अकारीय । पाय । अगों । आगै । करनें । करनैं । परंख्या । अगों ॥
३०४ पृथ्वीराजरासो । [छठां समय ६
महा पुरुष पिष्षै जबै, तब सुअ हरष सरीर।
दंडव्रत अंजुलि करिय, मन आनंद सधीर ॥ कूं० ॥ ३४ ॥ दू० ॥ १४ ॥
बीरों के रूप आदि का वर्णन ॥
कंद पद्धरी ॥ आनंद चंद दरसंत इंद। सोभा सुभंत वज्रंग दंड ॥
तन तेज तरनि ज्यौं घनह श्रोप। प्रगटी कि किरनि धरि अगिन कोप ॥३५॥
चंदन सुलेप कस्तूर चिच । नभ कमल प्रगटि जनु किरन मिच ॥
जनु अगनित नग छवि तन विसाल। रसना कि बैठि जनु भ्रमर व्याल॥३६॥
मृग मद अयूष जनु पिउष पान। प्रभु मुदित मगन नासा रसान ॥
मईन कपूर छवि अंग हंति । सिर रची जानि विभूत पंति ॥ ३७ ॥
कज्जल सुरेश रचि नेन पंति । सुत उरग कमल जनु कोर पंति ॥
चंदन सुचिच रुचि भाल रेश । रजगुन प्रकासतें अरुन भेष ॥ ३८ ॥
रोचन लिलाट सुभ मुदित मोद । रवि बैठि अरुन जनु आनि गोद ॥
घूंघर घसंकि पाइन विसाल । नृत्तंत जननि जनु अग्ग बाल ॥ ३८ ॥
धूसरस भूर बनि वार सीस । छवि बनी मुकट जनु जटा ईस ॥
बनि विसद कंठ इक्क बेलि माल । आभाति उडग्गन निसापाल ॥ ४० ॥
चंपकनि पुहुप बनि कंठ कांति । रस रमत अमर जनु पीत पंति ॥
नृत्तंत एक संगीत अंत। नारद रिझि कर धरत तंति ॥ ४१ ॥
इक्क परत बध्य इक्क खरंत छय्य । गज नहनि केलि जनु सरित सध्य ॥
इक्क प्रगट होत इक्क दुरै जात । परसंत परस्पर सुमन दात ॥ ४२ ॥
क्कित एक होत गिर गरुअ देह । गरजंत एक जनु घटा मेह ॥
इक्क उघटि सब्द संगीत ताल । इक्क पढत भाष नागह विसाल ॥ ४३ ॥
इक्क ब्रह्म पोष सम करत घोष । पौरांनं प्रगट इक्क वचत मोष ॥
दाढाय इक्क चवैत फुनिंद । इक्क धरत ध्यान जानिक मुनिंद ॥ ४४ ॥
इक्क गरनि मुंड मुष रुंड एक । कुंजर सधार गिर तरन तेक ॥
इक्क मुष्य अगिग ज्वाला उठंत । इक्क परह देह बरिषा उठंत ॥ ४५ ॥
१४ पाठान्तर-निमित । भवितव्यता । सयानं ॥ २७ ॥ को । नृपति । असैं । आय ॥ २८ ॥
परिष्या । को। बैठौ । स्रान । परि । चंद ॥ २९ ॥ गनर्डस । तहां । बुधि । उक । गरजिय ॥ ३० ॥
गगन । आंनन । अंगं । गय गंज । औ । जानिक । उलका ॥ ३१ ॥ जहां । तहां द्वै ॥ ३२ ॥
धारता । आकर्षे । बढयौ ॥ ३३ ॥ पुरुष । पिषे । जबैं । हर्ष । शरीर ॥ ३४
एका करत गाज चिक्कार एक । इक सहत सुद्रुत गिरि उड़त केक ॥
इक करत रूप गिरि सिषर कोइ । एका रूप बहुत इक एक होइ ॥ ४६ ॥
धसकंत धरनि इक खात घात । इक स्वास उड़त उपवनह पात ॥
पिपीय चरित ए चंद भट । हर्षित हुल्लास मन में अघट ॥ ४७ ॥
रोमंच अंग उब्भार देह । भैभीति भंति तहँ दिषि एह ॥ छं० ॥ ४८ ॥ रू० ॥ १५ ॥
कवित्त ॥ जिन देवन दरसंत । देव दानव चिय संकचि ॥
किंनर जप गंध्रब्ब । सर्व सनमुख जिन कंपचि ॥
सिध साधक जिन दरसि । तरसि संकट थिय विखम ॥
महाबीर वलवंत । कचन सचि सकै तिनं क्रम ॥
अद्भुत चरित चंदह चरचि । सुर विचित्त चिय हथ्थ क्रिय ॥
आराधि संच मन ताप सह । सावधान सम्भारि जिय ॥ छं०॥४९॥रू०॥१६॥
दूहा ॥ फुनि सुदिष्ट दूरी करन, अकल भयानक भीर ।
विना मंत्र को वसि करै, महाकाय वे वीर ॥ छं० ॥ ५० ॥
अनरिति फल काहू करन, किहिकर अनरित फूल ।
दिव्य वस्त्र काहू करन, नाना वरन अचूल ॥ छं० ॥ ५१ ॥
सत्त मंत को दिष्यित, रज मय के दीसंत ।
तामस के पिष्ये प्रबल, क्रोध कलह किरतंत ॥ छं० ॥ ५२ ॥
को इक कुंजर मद वहत, कोइक सिंघ सरूप ।
को इक पन्नग विष गरल, को इक दिष्यित भूप ॥ छं० ॥ ५३ ॥
ब्रह्मरूप को इक बढ़त, को इक तापस भेष ।
जूप रूप तसकर सुको, छिन में भेष अलेष ॥ छं० ॥ ५४ ॥
अग्निज्वाल किन तन उठत, किन तन बरसै मेह ।
चक्र पवन डंडूर को, केतन कंकर षेह ॥ छं० ॥ ५५ ॥
१५ पाठान्तर-ज्यों । उप । आन ॥ ३५ ॥ अग्नित । अमर ॥ ३६ ॥ सिगमद । पियूप ।
पानि । अंगहुंति । विभूति ॥ ३७ ॥ नैन । प्रकाश ॥ ३८ ॥ आंनि । घुघर । घर्मकि । पांयन । रसाल ।
नृत्यंत । अग ॥ ३९ ॥ वेलि । आभाकि । उड़गन । निशापाल ॥ ४० ॥ नृत्यंत । नारद । रीझ ॥
४१ ॥ हथ । तरुन । स्वस्थ्य । दुरे ॥ ४२ ॥ शब्द ॥ ४३ ॥ ब्रह्म पोपं । पोरान । एक । ध्वांन जांनि
कै । जान कि । मुष । अग्नि । बुठंत ॥ ४५ ॥ चिकार । उठंत ॥ ४६ ॥ घमकंति । स्वांस । पिपिय ।
पिष्यिय । चरित्रं । भट । मैं । अघट्टि । ॥ ४७ ॥ उभार । भय । तहां । दिषि ॥ ४८ ॥
१६ पाठान्तर-जप्प । गंधर्व । सिद्ध । महावीर । अदभुत । चरितं । हथ । सावधानं ॥
३०६ पृथ्वीराजरासो । [ छठां समय ८
सुमन दृष्टि कोइक करत, के फल अन्न रसंस ।
रुधिर मंस तन चमकते, आप परस्पर संस ॥ छं० ॥५६॥ रू० ॥ १७॥
चन्द का बीरों को देख कर प्रसन्न होना ॥
दूहा ॥ दिषि चंद आनंद मन, धनि मुझ गुर उपदेस ।
महा पुरुष पिषे प्रसन, ओ मन मिटि अंदेस ॥ छं० ॥ ५७॥ रू० ॥ १८ ॥
चन्द का बीरों की पूजा करना ॥
कवित्त ॥ सनमुख अंजुलि जाई, करी दंडौत सबन कहुँ ॥
कुसुमंजलि सिर मंडि । धूप नैवेद समुच्च सहुँ ॥
आरति सबनि उतारि । नयन नैनह सब मिलिय ॥
रहे पिषि सब बीर । जांनि पंनग वच षिल्लिय ॥
किंनो सुभ गति भव भवना । चित चंचल सुस्थिर करिय ॥
भय चंद चंद तन मन प्रसन । अस अछूत पुज्जिय रखिय ॥ छं०॥५८॥ रू० १८ ॥
चन्द का पृथ्वीराज के लिये शत्रुशासन मंत्र ग्रहण करना ॥
कवित्त ॥ जिन बीरन बसि करन । जोग जोगी हठ मंडहि ॥
जिन बीरन बसि करन । दुंद आराधन तंडहि ॥
जिन बीरन वसि करन । चरन सत गुर अभ्यासहि ॥
जिन बीरन बसि करन । प्रेत भूतन विसवासहि ॥
सो बीर पंच हुअ सहज सें । जती एक परसाद किय ॥
प्रथिराज भाग बरदाहु बर । सचु समन् इह मंच दिय ॥
छं० ॥ ५८॥ रू० ॥ २० ॥
क्षेत्रपालों (बीरों) का पूछना कि हम लोगों को
क्यों बुलाया है ॥
१७ पाठान्तर—करण । भयानक । बे ॥ ५० ॥ काहूं कद्दण । बर्षे ॥ ५१ ॥ सत । मत ।
दिषियत । में । पिषे । कृत्यंतं ॥ ५२ ॥ पंन्नग । दिषित ॥ ५३ ॥ कोई । भेस । अभेस ॥ ५४ ॥ बरसं ।
मंदूर ॥ ५५ ॥ केइ । करतह । रसस । मंतं । आपस पद परसंस ॥ ५६ ॥
१८ पाठान्तर—दिषि । पिषे । प्रसंन । अंदेश ॥
१९ पाठान्तर—जाई । दंडोत । कहौं । कहुं । नैवद । सहौं । सहुं । सबन । नैन । नैनन ।
मिलिय । पिषि । जांनि । खिलिय । किनी । भवना । सुथिर । प्रसंन । पूजित ॥
२० पाठान्तर-अधंम आतम भ्रम मंडहि । वाशिकरन । विसवासहि । सोइ । पृथ्वीराज । शत्रु ॥
छठां समय ६] पृथ्वीराजरासो । ३०७
दूहा ॥ बेतणउ तव चंद सौं । किन्न हुकम तुंफेव ॥
जंच संच आराध हुत । क्यौं आकर्षे सेव ॥ छं० ॥ ६० ॥ रू० ॥ २१ ॥
चन्द का यह उत्तर देना कि हमने पृथ्वीराज की सहायता
के लिये आप लोगों को बुलाया है ॥
साटक ॥ आकर्षय च देव सेव सवयं, पिथ्यं हितं कारनं ।
विपमं वंक सहाय आय.भहं, घहं भया भैकरं ॥
इच्छेयं मन पेमयं च वरयं, दंडं दत्तं दारुनं ।
श्रीवीराधि सुरिंद चंद नमयं, चर्नस्य सर्नागतं ॥ छं० ॥ ६१ ॥ रू० ॥ २२ ॥
चन्द का प्रार्थना करना कि जैसे आप राम-रावण आदि की
लड़ाई में रक्षा करते आए ऐसे ही पृथ्वीराज की भी करना ॥
कवित्त ॥ मद्दनि मच्चि जब सुरनि । जुद्ध असुरां सुर जब्बह ॥
अमरन अमिय अभीय । मोहि असुरन तव तब्बद्द ॥
काली सुर मच्छिास । त्रिपुर जित्तिय महिषासुर ॥
जालंधर भसमास । राम दसकंध अभंगुर ॥
जहँ जहँ सुदेव वंकम परिय । करिय अभय तुम देव तव ॥
देवाधि देव दानव दलन । चरन सरन हम रप्पि अब ॥
छं० ॥ ६२ ॥ रु० ॥ २३ ॥
बीरों का प्रसन्न होकर कहना कि जब गाढ़
पड़े तब स्मरण करना ॥
कवित्त ॥ षिनक मैंण'रचि देव । बचन चंदह उच्चारिय ॥
हम प्रसंन तुझ सेंव, सुनहु भटं सुभ कारिय ॥
समर संग तुअ राज, जब सु संकट षल जानिय ।
तहाँ सुमरंत सु चंद, दंड हंनिहैं सुन मानिय ॥
२१ पाठान्तर-सों हुकंम । सु ॥
२२ पाठान्तर-पिथं । वंक । सुभटं । घंटं । इच्छेयं । सुरीदं । चरनस्य । सरनागतं ॥
२३ पाठान्तर-मह्न । प्रचि । असुरांन । जबह । अमिय । अमीय । मोह । तबह । रांम ।
दसमथ । जहां २ । संकट । रषि ॥
सिर धारि चंद बाचा लइय, सदा प्रसन सेवक रहै ।
करि क्रिपा नाथ भहं सरिस, विवरि नाम बीरन कहै ॥
छं० ॥ ६३ ॥ रु० ॥ २४ ॥
भैरव का एक बीर को आज्ञा देना कि सब बीरों का नाम
बतला कर चन्द को पहिचनवा दो ॥
दूहा ॥ तब भैरव इक गन सरिस, किंन हुकम घर नंद ।
विवरि नाम वीरन सबन, कहि पिछनावहु चंद ॥
छं० ॥ ६४ ॥ रु० ॥ २५ ॥
सब बीरों का नाम गुण कथन ॥
दूहा ॥ वज्रपाट ता नाम गन । घन तन घोर भयंक्क ॥
पृथुक नाम बरनत सबन । सुनत मिटै तन संक्क ॥
छं० ॥ ६५ ॥ रु० ॥ २६ ॥
छंद पद्धरी ॥ गुन ईस चरन गुन गहर गाइ । फल सिद्धि बुद्धि जा नाम पाइ ॥
बानिय प्रसंन जो प्रथम होइ । करौं प्रसन बीर पचास दोइ ॥ ६६ ॥
आहूक्क बीर यह प्रथम खेव ॥ तिचि प्रसन प्रसन सब जानि देव ॥
वपुलाडू बीर हंनत बिनोद ॥ जिचि प्रसन सदा आनंद सोद ॥ ६७ ॥
बुँदिआइ बीर बन्दौ सनेह ॥ जल मय सुथलनि करि करसि सेह ॥
आनल्लप्रचारिय प्रबल बीर ॥ जिचि जुरत दनुज अरधरै भोर ॥ ६८ ॥
नारीय क्रीडनह दोड कोडू ॥ ब्रह्मा उपास करै टूक दोडू ॥
सूचीय अंज अनगंज बीर ॥ बज्रह सुभंजि दोइ करै चीर ॥ ६९ ॥
समसान लोटना बीर बंक ॥ तिचि पीर भीत अन संक भंक ॥
गढ उपडनाडू तो बीर नाम ॥ क्रोधंत कूट नह लखै ठाम ॥ ७० ॥
सामुद्र तिरन हूह बीर बाव ॥ सप्तम समुद्र मनु वहत बाव ॥
सामुद्र सोष अनभंग बीर ॥ दनु देव समुद्रन घरत नीर ॥ ७१ ॥
२४ पांठान्तर-मोंन । वचन । उच्चारिय । उच्चारीय । प्रसन । हुव । हुअ । भटं । कारीय ।
जानीय । तहां । दंड हमें सनमानीय । सनमांनिय । सदां । प्रसंन । करिं । भट्ठह । बिचारि ।
नांम । कहैं ॥
२५ पाठान्तर-दोहरा । नांम ॥
२६ पाठान्तर-नांम । पृथक । प्रयुक्त । बरनन । मिटे ॥
छठां समय ११] पृथ्वीराजरासो । ३०६
दूच लोच भंजनिय वीर दीन्न ॥ लारन पच्चार भंजे सरीस ॥
संताना चोट दूच नाम धारि । भंजे जँजीर जनु सूत तार ॥ ७२ ॥
विस पाय राय सो वीर जांनि । पचवंत जह्र जनु दूध पानि ॥
रुँडमाल नाम लोहू है देष । पिप्पिय भयंक्र दृक कालसेष ॥ ७३ ॥
अगिग्या वीर कुप्पंत वार । प्रब्बतप्रजारि सो करत खार ॥
विषपिया वीर वीराधि वीर । तिचि क्रोध दनुज संघरै भीर ॥ ७४ ॥
जमघंठ नाम औघह जोर । जिन सहज गाज घन घोर खोर ॥
कान्नाइ नाम दूच वीर लेषि । सब तजै भीर से भीत देषि ॥ ७५ ॥
कुरखाइ नाम दूच चालन जाइ । सुर असुर नाग तातकै पाइ ॥
अगिक्रान्त वीर जब होत कोच । तब जरत तेज गिरसिषर षोच ॥ ७६ ॥
विपकांत वीर अत्यंत वंक । जिन पिष्पि कंक अन संक संक ॥
रगतिया वीर पग रक्त रंग । अरि रक्त वाह सो करत भंग ॥ ७७ ॥
कोइलाइ नाम जो सेव पाइ । तिन कष्ट होत भग्गै सदाइ ॥
कालका नाम करौ वीर सेव । तिचि प्रसन काम दुग्धं कि देव ॥ ७८ ॥
कालवेताइ नाम विन वीर कौन । गम अगम थान जनु वहत पौन
काल घटाइ बज्रंग वान । कोपंत दनुज दच्च चरन पान ॥ ७९ ॥
इंद्र वीराइ वल इंद्र जोर । चौगुन विलास तन धरत रोर ॥
जम वीराइ वीर क्रत्यन्त कोच । सत्तउ समुद्र जल करत गोच ॥ ८० ॥
देवग्नि नाम करौं सेव पाइ । सुभ धने कर्ने दाता सदाइ ॥
उँकार वीर नमि करौं ध्यान । जिहि प्रसन सदा आनन्द ग्यान ॥ ८१ ॥
२७ पाठान्तर-गाय । नांम । पाय । बांनी । प्रसन । होय । करौं। दोय ॥ ६६ ॥ आइझ ।
तिहिं । लाय । जिहिं ॥ ६७ ॥ बुंदि । स एह । थलन । अनल । प्रहारीय । जिहिं ॥ ६८ ॥ छोड़-
नहू । करैं । दोय । अनभंग । दो ॥ ६९ ॥ शमशान । तिहि संक बंक अनभीत वीर । नाय नांम । हल-
हलै ठांम ॥ ७० ॥ सामंद । जनु । बहतु । बायु । सासमुद्र । शोषा सोपै समुद्र सब पिवै नीर ॥
७१ ॥ और । जंजीर ॥ ७२ ॥ बिसप्रापरा । पांनि । मांनि । रुंडमाल । पिषिय । मय ॥ ७३ ॥
अगिया । कोपंत । पब्बत । प्रजार । करै । विषपियाइ । तिहिं ॥ ७४ ॥ यमघंट घाट । चौघट ।
औघट । कालाय । वीर । लेष । तजैं । देष ॥ ७५ ॥ कुरलाय । नांम । तिहिं । जाई। पाय । क्रोध । पोध ।
तब जरत सिपरं गिर तेज पोध ॥ ७६ ॥ वीर । बंक । पिपि । बाह ॥ ७७ ॥ कोयला ।
नांम । भग्गै । कालकाइ । कालका । नांम । करो । तिहिं ॥ ७८ ॥ बिन । किन । कौंन । बहि ।