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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 304, कुल 470 में से

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पृष्ठ 304

२६४ पृथ्वीराजरासो। [ पांचवां समय १४
कूछ करि जूछ संम्रुच्छ को कोक धर ।
रोस रिम राच जेम जीव कुद्है ॥ कुं० ॥ ८२ ॥
पांनि करि पांनि अरि पांनि करंनीय छक ।
सीस अरी पारि सब षेत सींच्यौ ॥
भ्रात सोमेस नृपघात भंजन भरम ।
षेत भयकार षय काल षीज्यौ ॥ कुं० ॥ ८३ ॥ रु० ॥ ४५ ॥
श्लोक ॥ हनिनं निनायकं सेना, कथितं न च पूर्वयम् ।
अयुद्धं चक्रतं एषां, विना स्वामि रणे युधम् ॥ कुं० ॥ ८४ ॥ रु० ॥ ४६ ॥
प्रतापसिंह आदि के मारे जाने का समाचार
सुनकर पृथ्वीराज का अप्रसन्न होना ॥
दूहा ॥ नीठ बिसासत अप्प भर, गह्यौ कन्ह चहुआन ।
गए ग्रेह लै सकल मिलि, प्रथीराज अकुलान ॥ कुं०॥ ८५ ॥ रु० ॥ ४७॥
पारि श्रित्त चालुक्क भर, मध अजमेर प्रमान ।
सात भ्रात भीमच्च छते, रन जीत्यौ भर कांन ॥ कुं० ॥ ८६ ॥ *रु० ॥ ४८ ॥
पृथ्वीराज की अप्रसन्नता सुनकर कान्ह चौहान का घर बैठ
रहना, तीन दिन तक अजमेर में हरताल पड़ना ॥
बत्त सुनी तब कन्ह नें, षिज्यौ कुँअर प्रथिराज ।
बैठि रहें तब निज सुघर, अंदरवार समाज ॥ कुं० ॥ ८७ ॥ †रु० ॥ ४८ ॥
तीन दिवस अजमेर में । परी इंद हटनार ॥
हूछ कोछ बज्यौ विषम । लग्यौ सु भूत भुआर ॥ कुं० ॥ ८८ ॥ रु० ५० ॥
मधि बजार चलि रुधिर नदि । रुस्त तुंड घन मुंड ॥
बर्कि कान्ह चहुआन करि । तिल तिल सम तन तुंड ॥
॥ कुं० ॥ ८९ ॥ रु० ॥ ५१ ॥
४६ पाठान्तर-हननं । यं । असुहुं । स्वामी । रिने । जुधं ॥
४७ पाठान्तर-अप । चहुंआन । अकुलांन ॥
४८ पाठान्तर-मध्य । प्रमान । * यह रूपक सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है ॥
४६ पाठान्तर-बत । षिजयं । कुंअरं । प्रथीराज । रहै । † यह रूपक कौलफील्ड वाली पुस्तक में नहीं है ॥
५० पाठान्तर-हट । हटतार । भुक्तार ॥ ५१ पाठान्तर-चहुवांन । तिन ॥