सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 311, कुल 470 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 311

छठां समय ३] पृथ्वीराजरासो । ३०१
पृथ्वीराज का आखेट के लिये निकलना ।
कवित्त ॥ कर पद मत्त धनुष्ष । ढाल आनन सुचक्क रथ ॥
पटह छींस घन सह । विपुछ बद्धीय समग पथ ॥
इक बंधिय इक बधिय । एक भंभिय भ्रम भीर ॥
इक्क सु मृग विफुरीय । इक्क चिकरीय दीन सुर ॥
कवि चंद सोर चिहुँ ओर घन । दिग्घ सह दिग अंत भौ ॥
संकिय सयल्ल जिम रंक उर । द्रुम अरन्य आतंक भौ ॥
छं० ॥ १२ ॥ रु० ॥ ५ ॥
अकेले कवि चंद का वन में भूल जाना ।
कवित्त ॥ जंगल धर सुकुमार । करत आखेट सपत्तौ ॥
संग सूर सामंत । गहन गिरि बोह सुरत्तौ ॥
एक सहस सँग स्वान । एक सत चीते संगह ॥
उभै सत्त सँग हिरन । करत मन पवन सुभंगह ॥
सम विषम विचर वन सघन घन । तहां सव्य जित तित्त धुन्न ॥
भूल्यौ सुसंग कवियन वनह । और नचीं जन संग दुन्न ॥
छं० ॥ १३ ॥ रु० ॥ ६ ॥
एक आम के पेड़ के नीचे एक ऋषि से उसकी भेंट होना ।
दूहा ॥ विपन विचर जपल अकल, सकल जीव जड जाल ॥
परसंपर बेली विटप, अवलंबि तरु तमाल ॥ छं० ॥ १४ ॥
सघन छांह रवि करन चष, पग तर पसु भजि जात ॥
सरित सोह सम पवन धुनि, सुनत श्रवन झचनात ॥ छं० ॥ १५ ॥
गिरि तट इक सरिता सजल, झिरत झिरन चिहुँ पास ॥
सुतरु छांह फल अमिय सम, बेली विसद विलास ॥ छं० ॥ १६ ॥
५ पाठान्तर-घत्त । धनुंक । धनुंक । धनुप । आंनन । चक । चध । सद। बदिय । दृक ।
म्रगा । बिफुरिय । चिहु । उर । दिघ । भ्रंस । सकल । सयलं ॥
६ पाठान्तर-करन । आखेटक । संपतौ । हृद । बोहर । संग । साथ । त्तिंत । भूल्यो ।
कबियन ॥