पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपांचवां समय १५ ] . पृथ्वीराजरासो : २६५
सात दिन तक कान्हके न आने पर पृथ्वीराज का उनके घर
मनाने को जाना और कहना कि संसार में यह बुराई
हुई कि घर बुलाकर चालुक्यों को मार डाला ॥
कवित्त ॥ सात दिवस जब गए । कन्ह दरबार न आए ॥
तब प्रथिराज कुँआर । अप्प मनए गृह जाण ॥
तुम ऐसी क्यौं करौ । अप्प सिर चढिय सुकाई ॥
कहिहैं सब चहुआन । छने चालुक्क सुराई ॥
आणि विषैं अप्पन सुघर । सो रावर ऐसी करिय ॥
इक दोस अप्प लग्ग्यौ खरौ । बत्त वित्तरीय जग बुरिय ॥
॥ छं० ॥ ८० ॥ रु० ॥ ५२ ॥
कान्ह का कहना कि मेरे सामने दूसरा कौन सभा में बैठकर
मोछ पर ताव रख सकता है ॥
दूहा ॥ कही कन्ह चहुआन तब । सो बैठें कोइ आनि ॥
सभा मद्धि संभरि अवर । मुच्छ धरै क्यौं पानि ॥ छं० ॥ ८१ ॥ रु० ॥ ५३ ॥
पृथ्वीराज का कहना कि तो आप आंख में पट्टी
बांधे रहा कीजिए ॥
करी अरज प्रथिराज वर । जो मानौ इक कन्ह ॥
सभा बुराई जौ मिटै । चष बँधि पह रतन ॥ छं० ॥ ८२ ॥ रु० ॥ ५४ ॥*
पृथ्वीराज का जड़ाऊ पट्टी बनवाकर अपने हाथ से कान्ह
के आंख में बांध देना ।
तब प्रथिराज विचार करि । चष आछौ हो पह ॥
बहुरि कोइ भर भोरछी । धरत परै इक बह ॥ छं० ॥ ८३ ॥ रु० ५५ ॥
५२ पाठान्तर-कुंआर । अप । शिर । काइय । कहिहैं । चालुक । राइय । विषै । करौय । लग्यौ । विस्तारिय ॥
५३ पाठान्तर-कोई । आंनि । मधि । संभरी । मुछ । पांनि ॥
५४ पाठान्तर-पृथ्वीराज । जौँ । माँनौँ । जौँ । बधि । * संवत् १६४० की प्रति में यह नहीं है ॥
५५ पाठान्तर-पृथ्वीराज । घंट । बट ॥
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