पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसिर धारि चंद बाचा लइय, सदा प्रसन सेवक रहै ।
करि क्रिपा नाथ भहं सरिस, विवरि नाम बीरन कहै ॥
छं० ॥ ६३ ॥ रु० ॥ २४ ॥
भैरव का एक बीर को आज्ञा देना कि सब बीरों का नाम
बतला कर चन्द को पहिचनवा दो ॥
दूहा ॥ तब भैरव इक गन सरिस, किंन हुकम घर नंद ।
विवरि नाम वीरन सबन, कहि पिछनावहु चंद ॥
छं० ॥ ६४ ॥ रु० ॥ २५ ॥
सब बीरों का नाम गुण कथन ॥
दूहा ॥ वज्रपाट ता नाम गन । घन तन घोर भयंक्क ॥
पृथुक नाम बरनत सबन । सुनत मिटै तन संक्क ॥
छं० ॥ ६५ ॥ रु० ॥ २६ ॥
छंद पद्धरी ॥ गुन ईस चरन गुन गहर गाइ । फल सिद्धि बुद्धि जा नाम पाइ ॥
बानिय प्रसंन जो प्रथम होइ । करौं प्रसन बीर पचास दोइ ॥ ६६ ॥
आहूक्क बीर यह प्रथम खेव ॥ तिचि प्रसन प्रसन सब जानि देव ॥
वपुलाडू बीर हंनत बिनोद ॥ जिचि प्रसन सदा आनंद सोद ॥ ६७ ॥
बुँदिआइ बीर बन्दौ सनेह ॥ जल मय सुथलनि करि करसि सेह ॥
आनल्लप्रचारिय प्रबल बीर ॥ जिचि जुरत दनुज अरधरै भोर ॥ ६८ ॥
नारीय क्रीडनह दोड कोडू ॥ ब्रह्मा उपास करै टूक दोडू ॥
सूचीय अंज अनगंज बीर ॥ बज्रह सुभंजि दोइ करै चीर ॥ ६९ ॥
समसान लोटना बीर बंक ॥ तिचि पीर भीत अन संक भंक ॥
गढ उपडनाडू तो बीर नाम ॥ क्रोधंत कूट नह लखै ठाम ॥ ७० ॥
सामुद्र तिरन हूह बीर बाव ॥ सप्तम समुद्र मनु वहत बाव ॥
सामुद्र सोष अनभंग बीर ॥ दनु देव समुद्रन घरत नीर ॥ ७१ ॥
२४ पांठान्तर-मोंन । वचन । उच्चारिय । उच्चारीय । प्रसन । हुव । हुअ । भटं । कारीय ।
जानीय । तहां । दंड हमें सनमानीय । सनमांनिय । सदां । प्रसंन । करिं । भट्ठह । बिचारि ।
नांम । कहैं ॥
२५ पाठान्तर-दोहरा । नांम ॥
२६ पाठान्तर-नांम । पृथक । प्रयुक्त । बरनन । मिटे ॥