पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६० पृथ्वीराजरासो । [पांचवां समय १०
चालुकों के मारे जाने से दरबार में कोलाहल होना ॥
दूहा ॥ कोलाहल दरबार भौ । सुनि चालुक मत सध्य ॥
धसिय पौरि गज मत्त सम । पुच्छत पुच्छत कथ्य ॥ छंदं० ॥ ५४ ॥ रु० ॥ ३० ॥
झिंक रुधिर उठ्ठत गिरिय । परिय सच परिधारि ॥
दिषि चालुक भत तेह टग । कुलच्च बाजि जनु डारि ॥ छं० ॥ ५५ ॥ रु० ॥ ३१ ॥
कवित्त ॥ संकर सिंघ कि कुट्टि । कुट्टि इन्द्रच्च कि गरुअ गज ॥
कि महिष कुट्टि मय मत्त । भरिय दीयौ कि दुट्ठ कजि ॥
भौ कि हांस रस रोस । मद्धि रावन्त विरच्चिय ॥
कोलाहल बल कूक । मज्झ रावर छल मचिय ॥
चालुक्क षवास ताकथ्य कथि । कोलाहल इन जानि घर ॥
कुंडिय सयल बोच्चिय नृपति । हनिग कन्ह सारंगधर ॥
छं० ॥ ५६ ॥ रु० ॥ ३२ ॥
दूहा ॥ अर प्रताप दरबार के । ढार घरे मय मत्त ॥
सुनत बत्त इह कन्हि परे । मनु निस तुहि नछत्त ॥ छं० ॥ ५७ ॥ रु० ॥ ३३ ॥
कवित्त ॥ निसि षह तुहि नछिच । रोस महिषा कुटि वातन ॥
परि कि दीप पातंग । सिंघ जनु कुट्टि क्षुधा तन ॥
यों तुहैं भर भरन । अररि भैभीर सुभग्गिय ॥
मनहुँ परा पति चुनत । परिय सिंचान अचिंतिय ॥
परि रौर पौरि दीनी दरकि । धरकि कूच कन्ह पौरि बिचि ॥
झेलत सब संत कलहंत जनु । पारथ सम भारत्थ मचि ॥
छं० ॥ ५८ ॥ रु० ॥ ३४ ॥
दूहा ॥ माया मोह विरत्त मन । तन तिनुका सम डारि ॥
३० पाठान्तर-सथ । मत । पुछत । कथ ॥
३१ पाठान्तर-बाजं । यह रूपक सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है ॥
३२ पाठान्तर-भरीय । दीपि । मधि । रावत । विराचिय । मन्न । मचिय । कथ । जांन ॥
३३ पाठान्तर-मत । बत । मनौं । नछिच ॥
३४ पाठान्तर-नक्छित्र । परियं । संघ । मनौं । मनहुं । अचितीय । दीनीय । बच । पेलंत । स । भारंथ ॥
३५ पाठान्तर-विरतं । पिय ॥ यह रूपक सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है ॥