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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 309, कुल 470 में से

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पृष्ठ 309

अथ आखेटक वीर वरदान वर्णन समय लिख्यते ॥
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( छठां समय )
पृथ्वीराज के कुँअरपने के तपतेज का वर्णन ।
कवित्त ॥ कुँअरप्पन प्रथिराज । वर्ष विय सपत समर तन ॥
समुच्च तेज असहेंज । हरन तम शेर समर गन ॥
उर किवार भुज वज्र । अंग वज्रंग पलन लुच्च ॥
भुज भुजंग वर जोर । जोर ब्रंनह संचुन भुच्च ॥
अनभंग अंग जनु अंगदह । पवन पाइ आखेट सहि ॥
सँग डारि श्वान जीवन लषै । सवन अग्ग अपजह निवहि ॥
छं० ॥ १ ॥ रू० ॥ १ ॥
कवित्त ॥ वर्षत सोभा नैन । मैन जनु मुदित सरित सर ॥
हरष हास मुख कंति । विकासि जनु कमल सूर वर ॥
मधुर सबद गुंजार । जानि गंभीर हरिय सद ॥
गयन गरुअ गज भंति । चलत कुल चालि वेद वद ॥
चहुआन सूर सोमेस सुच्च । धुअ जनु सुच्च अवतार लिय ॥
मन हरनि हरत मन पिष्पि कै । जनुँ विधिना अप हथ्थ किय ॥
छं० ॥ २ ॥ रू० ॥ २ ॥
छंद पद्धरी ॥ रहै सुभट यह प्रथिराज संग । जै पैज गंग सुच्च कप्पि पंग ।
षट रस विलास अंनन अपार । भुक्तंत भोग भट सुभट लार ॥ छं० ॥ ३ ॥
१ पाठान्तर–सं० १६४७ की पुस्तक में इस का ऐसा पाठ है:–“कुअरपन पृथीराज । वर्ष
विय बीस समर वरय । समुह तेज अस हेज । जोर ब्रंनह संचुन भय । भुज भुजंग वर जोर । हरन
तरोर समरगन । उर किवार भुज वज्र । अंग वज्रंग पलन मन” ॥ बाकी दोनों तुक जैसे
के तैसे हैं ॥
२ पाठान्तर–शोभा । नैन । मैंन । उदित । सरनि । कांति । विकसित । जांनि । कुलि ।
चहुआन । सुय । मंन । पिषिकैँ । हथ ॥