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सर्वकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 315, कुल 470 में से

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पृष्ठ 315

एका करत गाज चिक्कार एक । इक सहत सुद्रुत गिरि उड़त केक ॥
इक करत रूप गिरि सिषर कोइ । एका रूप बहुत इक एक होइ ॥ ४६ ॥
धसकंत धरनि इक खात घात । इक स्वास उड़त उपवनह पात ॥
पिपीय चरित ए चंद भट । हर्षित हुल्लास मन में अघट ॥ ४७ ॥
रोमंच अंग उब्भार देह । भैभीति भंति तहँ दिषि एह ॥ छं० ॥ ४८ ॥ रू० ॥ १५ ॥
कवित्त ॥ जिन देवन दरसंत । देव दानव चिय संकचि ॥
किंनर जप गंध्रब्ब । सर्व सनमुख जिन कंपचि ॥
सिध साधक जिन दरसि । तरसि संकट थिय विखम ॥
महाबीर वलवंत । कचन सचि सकै तिनं क्रम ॥
अद्भुत चरित चंदह चरचि । सुर विचित्त चिय हथ्थ क्रिय ॥
आराधि संच मन ताप सह । सावधान सम्भारि जिय ॥ छं०॥४९॥रू०॥१६॥
दूहा ॥ फुनि सुदिष्ट दूरी करन, अकल भयानक भीर ।
विना मंत्र को वसि करै, महाकाय वे वीर ॥ छं० ॥ ५० ॥
अनरिति फल काहू करन, किहिकर अनरित फूल ।
दिव्य वस्त्र काहू करन, नाना वरन अचूल ॥ छं० ॥ ५१ ॥
सत्त मंत को दिष्यित, रज मय के दीसंत ।
तामस के पिष्ये प्रबल, क्रोध कलह किरतंत ॥ छं० ॥ ५२ ॥
को इक कुंजर मद वहत, कोइक सिंघ सरूप ।
को इक पन्नग विष गरल, को इक दिष्यित भूप ॥ छं० ॥ ५३ ॥
ब्रह्मरूप को इक बढ़त, को इक तापस भेष ।
जूप रूप तसकर सुको, छिन में भेष अलेष ॥ छं० ॥ ५४ ॥
अग्निज्वाल किन तन उठत, किन तन बरसै मेह ।
चक्र पवन डंडूर को, केतन कंकर षेह ॥ छं० ॥ ५५ ॥


१५ पाठान्तर-ज्यों । उप । आन ॥ ३५ ॥ अग्नित । अमर ॥ ३६ ॥ सिगमद । पियूप ।
पानि । अंगहुंति । विभूति ॥ ३७ ॥ नैन । प्रकाश ॥ ३८ ॥ आंनि । घुघर । घर्मकि । पांयन । रसाल ।
नृत्यंत । अग ॥ ३९ ॥ वेलि । आभाकि । उड़गन । निशापाल ॥ ४० ॥ नृत्यंत । नारद । रीझ ॥
४१ ॥ हथ । तरुन । स्वस्थ्य । दुरे ॥ ४२ ॥ शब्द ॥ ४३ ॥ ब्रह्म पोपं । पोरान । एक । ध्वांन जांनि
कै । जान कि । मुष । अग्नि । बुठंत ॥ ४५ ॥ चिकार । उठंत ॥ ४६ ॥ घमकंति । स्वांस । पिपिय ।
पिष्यिय । चरित्रं । भट । मैं । अघट्टि । ॥ ४७ ॥ उभार । भय । तहां । दिषि ॥ ४८ ॥
१६ पाठान्तर-जप्प । गंधर्व । सिद्ध । महावीर । अदभुत । चरितं । हथ । सावधानं ॥