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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 316, कुल 470 में से

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पृष्ठ 316

३०६ पृथ्वीराजरासो । [ छठां समय ८
सुमन दृष्टि कोइक करत, के फल अन्न रसंस ।
रुधिर मंस तन चमकते, आप परस्पर संस ॥ छं० ॥५६॥ रू० ॥ १७॥
चन्द का बीरों को देख कर प्रसन्न होना ॥
दूहा ॥ दिषि चंद आनंद मन, धनि मुझ गुर उपदेस ।
महा पुरुष पिषे प्रसन, ओ मन मिटि अंदेस ॥ छं० ॥ ५७॥ रू० ॥ १८ ॥
चन्द का बीरों की पूजा करना ॥
कवित्त ॥ सनमुख अंजुलि जाई, करी दंडौत सबन कहुँ ॥
कुसुमंजलि सिर मंडि । धूप नैवेद समुच्च सहुँ ॥
आरति सबनि उतारि । नयन नैनह सब मिलिय ॥
रहे पिषि सब बीर । जांनि पंनग वच षिल्लिय ॥
किंनो सुभ गति भव भवना । चित चंचल सुस्थिर करिय ॥
भय चंद चंद तन मन प्रसन । अस अछूत पुज्जिय रखिय ॥ छं०॥५८॥ रू० १८ ॥
चन्द का पृथ्वीराज के लिये शत्रुशासन मंत्र ग्रहण करना ॥
कवित्त ॥ जिन बीरन बसि करन । जोग जोगी हठ मंडहि ॥
जिन बीरन बसि करन । दुंद आराधन तंडहि ॥
जिन बीरन वसि करन । चरन सत गुर अभ्यासहि ॥
जिन बीरन बसि करन । प्रेत भूतन विसवासहि ॥
सो बीर पंच हुअ सहज सें । जती एक परसाद किय ॥
प्रथिराज भाग बरदाहु बर । सचु समन् इह मंच दिय ॥
छं० ॥ ५८॥ रू० ॥ २० ॥
क्षेत्रपालों (बीरों) का पूछना कि हम लोगों को
क्यों बुलाया है ॥
१७ पाठान्तर—करण । भयानक । बे ॥ ५० ॥ काहूं कद्दण । बर्षे ॥ ५१ ॥ सत । मत ।
दिषियत । में । पिषे । कृत्यंतं ॥ ५२ ॥ पंन्नग । दिषित ॥ ५३ ॥ कोई । भेस । अभेस ॥ ५४ ॥ बरसं ।
मंदूर ॥ ५५ ॥ केइ । करतह । रसस । मंतं । आपस पद परसंस ॥ ५६ ॥
१८ पाठान्तर—दिषि । पिषे । प्रसंन । अंदेश ॥
१९ पाठान्तर—जाई । दंडोत । कहौं । कहुं । नैवद । सहौं । सहुं । सबन । नैन । नैनन ।
मिलिय । पिषि । जांनि । खिलिय । किनी । भवना । सुथिर । प्रसंन । पूजित ॥
२० पाठान्तर-अधंम आतम भ्रम मंडहि । वाशिकरन । विसवासहि । सोइ । पृथ्वीराज । शत्रु ॥