पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 312, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ें३०२ | पृथ्वीराजरासो । | [छठां समय ४]
तहां सु अँबतर॒ रिषि इक, अस तन अंग सरंग।
दव दह्यौ जनु द्रुम कोइ, कै कोइ भूत भुअंग ॥ कूं० ॥ १७ ॥ रू० ॥ ७ ॥
गाहा ॥ जप माला म्रिग छालो । गेटा विभूतं जोग पहार्यं ॥
कुविजा खप्पर धय्यं । रिद्धं सिद्धाय बचनयं मभं ॥
कूं० ॥ १८ ॥ रू० ॥ ८ ॥*
कविचन्द का ऋषि के पास जाकर पूछना कि आप कौन हैं ?
दूहा ॥ चंद पिषि चर्यौ सुमन, इक कोइ रूप अलेष ।
पग परसैं दरसैं दरस, उत्तिम भूत अशेष ॥ कूं० ॥ १९ ॥
करि बंदन कविचंद कहि, को तुम आदि अनादि ।
तुम दरसन बिन दिन गए, ते सब बीते वादि ॥ कूं० ॥ २० ॥
तुं † धाता करतार तुं ,भरता चरता देव।
तुं दत्ता गोरस तुची, प्रसन होउ प्रभु मेव ॥ कूं० ॥ २१ ॥ रू० ॥ ९ ॥
ऋषि का पूछना कि तुम कौन हो इस बीहड़ बन में कैसे आए ।
दूहा ॥ कहै जंगम तुं कौन नर, क्यों आगम ह्वां कीन ।
जीव जंत घन विघन बन, जीव जीव बल छीन ॥
कूं० ॥ २२ ॥ रू० ॥ १० ॥
चन्द का अपना परिचय देना ।
गाहा ॥ दरसन देव मुनिंदं । चंदं विरहं च दुप्पदं दायं ॥
अव मुक्का कम्म सुफलियं । दिष्पे सुफल रूप तपसीयं ॥ कूं० ॥ २३ ॥
देवान वरं सिद्धाण दरणं । गुरं नरिंद सनमानं ॥
गय भुम्मि दब्ब नट्ठा । पां मिज्जे पुण्य रेहायं ॥ कूं० ॥ २४ ॥ रू० ॥ ११ ॥
७ पाठान्तर—उपरल । परस्पर । अवलंबि ॥ १४ ॥ झूहनांत । झहनाट ॥ १५ ॥ गिर ।
भरत । भरन ॥ १६ ॥ अंतर । तह । जती । अंग न रंग । द्रुम ॥ १७ ॥
८ पाठान्तर—विभूत । पटार्य । मभं । मंमं ॥
- यह रूपक सं० १६४७ वाली पुस्तक में नहीं है ।
९ पाठान्तर—पिषि । को । परसों । दरसों ॥ १९ ॥ तूं । भर्ता । तूं । दंता । तुहीं ।
होहि ॥ २१ ॥ † यह संस्कृत त्वम् का पहिला हिन्दी रूप है ।
.१० पाठान्तर—जती । तूं । कौंन ॥
११ पाठान्तर— गाथां । दंसनं । चंदं न विरहं इदेहं दंदायं । चंदम । दंदाई । कर्म । दिषे ।
सकल ॥ २३ ॥ सिद्धान । दसनं । भूमि । भूमि । पा । मिजै । पुन्य । रेहा इं ॥ २४ ॥