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परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

५२ परशुरामकल्पसूत्रम्
एकैकापूर्वजनकत्वात् तन्मध्ये एकस्य विस्मरणे पुनस्तद्गणमारभ्यैव अनुष्ठानं
न सकलादिमारभ्य।
श्रीश्रीपतीत्येकं, गिरिजागिरिजापतीत्येकं मिथुनम्। एवं रीत्या एकं
स्त्रीलिङ्गान्तमेकञ्च पुंलिङ्गान्तं मिथुनं ज्ञेयम्। एवं त्रयोदशमिथुनेषु एकैकां देवतां
द्वितीयान्तमुच्चार्य तर्पयामीति योजयेत्। इत्थं चोक्तरीत्या एकदेवतायाश्चतुर्वारं
तर्पणम्, ततो मूलेन चतुर्वारं कार्यं पूर्ववत्। तदित्थं मूलतर्पणानि २२८ वर्ण-
तर्पणानि ११२ मिथुनतर्पणानि १०४ आहत्य ४४४ तर्पणानि भवन्तीत्यर्थः॥३॥
मूलमन्त्र पहले उच्चारण कर उसके साथ 'तर्पयामि' क्रिया लगाकर तर्पण
का मन्त्र बनता है। इसी तरह सर्वत्र मूल के साथ 'तर्पयामि' क्रिया का संनियोजन
करना चाहिये। चार बार तर्पण में क्रिया की आवृत्ति आवश्यक नहीं होती। मन्त्र
की आवृत्ति नितान्त आवश्यक मानी जाती है। स्वाहान्त शब्द प्रयोग का तात्पर्य
प्रतिवर्ण मन्त्र में 'स्वाहा' का प्रयोग आवश्यक है, यही मानना चाहिये। स्वाहा
के अनन्तर 'तर्पयामि' क्रियायोग ही परम्परा में गृहीत है।
इस प्रकार मूल के एक वर्ण और इसके साथ बिन्दु के प्रयोग शिष्टस्वीकृत
माने जाते हैं। इसके बाद 'स्वाहा' का प्रयोग और तदनन्तर 'तर्पयामि' क्रिया
का प्रयोग कर तर्पण मन्त्र का निर्माण करते हैं। इस मन्त्र से चार बार तर्पण
कर पुनः मूलमन्त्र से ही चार बार तर्पण करना चाहिये, इस तरह ऊह द्वारा
वर्ण मन्त्रों का प्रयोग कर तर्पण का विधान पूरा करने का नियम है। गण के
अनुसार तर्पण का निर्देश सूत्रों से प्राप्त होता है। जैसे पहले १२ बारह बार
तर्पण करने की प्रक्रिया से प्रथम गण का सूचन हो रहा है। पुनः चतुर्वार तर्पण
की बात से यह स्पष्ट हो रहा है कि, यह एक पृथक् गण है। 'पुनः' के प्रयोग
के आधार पर इसके बाद तेरह मिथुनों का तर्पण सूचित हो रहा है। यह एक
तीसरा गण प्रतीत होता है। इन गणों के पृथक्-पृथक् तर्पण का फल भी बड़ा
अच्छा मिलता है। कभी बीच में विस्मृतिवश यदि प्रमाद घटित हो जाय तो,
उसी गण से पुनः प्रारम्भ किया जाता है। अन्यथा इसे प्रारम्भ से शुरू करना
पड़ता है।
श्री और श्रीपति का एक मिथुन, गिरिजा-गिरिजापति यह द्वितीय मिथुन,
इसी तरह एक स्त्रीलिङ्ग शब्द तथा साथ के पुल्लिङ्ग शब्द को मिलाकर तेरह

महागणपतिक्रमः ५३
मिथुनों का सूत्र में उल्लेख है। इनमें से एक-एक देवता के साथ द्वितीया विभक्ति
लगाकर 'तर्पयामि' क्रिया का प्रयोग कर तर्पण करना चाहिये। इस तरह एक
देवता का चार बार तर्पण कर पुनः मूल से भी चार बार तर्पण करने का विधान
है। इस तरह मूल तर्पण २२८ बार, वर्ण तर्पण ११२ बार, मिथुन तर्पण १०४
बार होते हैं। कुल मिलाकर चार सौ चौवालिस तर्पण होते हैं॥३॥
एवं तर्पणक्रममुक्त्वा पूजाविधिं वक्तुमुपक्रमते
अथ यागविधिः। गृहमागत्य स्थण्डिलमुपलिप्य द्वारदेश
उभयपार्श्वयोर्भद्रकाल्यै, भैरवाय, द्वारोर्ध्वं लम्बोदराय नम इति अन्तः
प्रविश्य आसनमन्त्रेण आसने स्थित्वा, प्राणानायम्य षडङ्गानि विन्यस्य
मूलेन व्यापकं कृत्वा स्वात्मनि देवं सिद्धलक्ष्मीसमाश्लिष्ट-
पार्श्वम् अर्द्धेन्दुशेखरमारक्तवर्णं मातुलुङ्गगदापुण्ड्रेक्षु-कार्मुकशूल-
सुदर्शनशङ्खपाशोत्पलधान्यमञ्जरीनिजदन्ताञ्चलरत्नकलशपरिष्कृत-
पाण्येकादशकं प्रभिन्नकटमानन्दपूर्णमशेषविघ्नध्वंसनिघ्नं विघ्नेश्वरं
ध्यात्वा ॥४॥
अथ अधिकारान्तरवाक्यमिदम्। एतेन तर्पणप्रकरणं समाप्तम्। गृहमाग-
त्येत्यनेन तर्पणं नद्यादौ गृहाद्बहिः कार्यम् इति सूचितम्। स्थण्डिलं यागदेश-
मुपलिप्य गोमयेनेति शेषः। उभयपार्श्वयोरित्यत्रानादेशाद्दक्षिणं प्रथमं पश्चाद्वामम्।
दक्षवामौ द्वाराद्बहिर्निर्गमनवेलायां तौ ग्राह्यौ। नम इत्युत्तरं यजेदिति शेषः।
अन्तः प्रविश्य इत्यनेन द्वारपूजा बहिः स्थित्वैव कार्या इति सिद्धम्। आसन-
मन्त्रेणेत्यनेन श्यामाप्रकरणपठितो मन्त्रो ज्ञेयः, सन्निकृष्टत्वात्। प्राणायामः
श्वासनिरोधः। षडङ्गानि मूलमन्त्रषडङ्गानि हृदयादीनि। तेषु विन्यस्य सर्वाङ्गे
विन्यसेत्। इदमेव व्यापककरणम्। स्वात्मनि स्वहृदये। गदा आयुधविशेषः,
पुण्ड्रेक्षुः नानारेखायुक्तेक्षुः। कार्मुकश्चापः। शूल आयुधविशेषः। सुदर्शनं चक्रम्।
शङ्खपाशौ प्रसिद्धौ। एवं मातुलुङ्गादिरत्नकलशान्तैः परिष्कृतं पाण्येकादशकं
यस्येदृशम्। यद्यपि श्रीमहागणपतिमूर्तेः दश भुजाः प्रसिद्धाः, अत्रैकादशेति
विरुद्धम्, तथापि पाणिपदेन शुण्डादण्डोऽप्यत्र ग्राह्यः, तत्र पाण्यपरपर्यायेणः
करः हस्त इति व्यवहारात्। करी हस्तीति सर्वलोकप्रसिद्धेः। इत्थं च दश

५४ परशुरामकल्पसूत्रम्
भुजाः, एकादशः शुण्डादण्ड इति तदभिप्रायेण सूत्रकृता भगवता
पाण्येकादश-मित्युक्तम्। प्रभिन्नः प्रस्रवन् कटो गण्डो यस्य तम्। अशेषा ये
विघ्नजनिता ध्वंसा अनिष्टकलापास्तेषां निघ्नं नाशकं विघ्नेश्वरम्
उक्तगुणविशिष्टं ध्यायेत् ।।४।।
'अथ' यह अव्यय शब्द पूरे एक वाक्य के लिये प्रयुक्त है। इससे यह
सूचित हो रहा है कि, एक वर्ण्यविषय का अधिकार क्षेत्र समाप्त हो गया,
अर्थात् पूर्वप्रवर्त्तित तर्पण प्रकरण समाप्त हुआ। अब याग-विधि का वर्णन यहाँ
से प्रारम्भ हो रहा है। इसके तुरत बाद 'गृहमागत्य' इस वाक्य में पूर्वकालिक
क्रिया का प्रयोग किया गया है। इससे यह सूचना-सी प्राप्त हो रही है कि,
तर्पण की प्रक्रिया नदी आदि में घर से बाहर पूरी करनी चाहिये। बाहर तर्पण
कर याग-गृह में आने का उपक्रम करना चाहिये। सर्वप्रथम स्थण्डिल के स्थान
अर्थात् यागभूमि को गाय के गोबर से लीप कर पवित्र करना आवश्यक माना
जाता है।
द्वार में प्रवेश के पहले ही द्वार के उभयपार्श्व में द्वारपूजा के उद्देश्य से
दाहिनी ओर 'भद्रकाल्यै नमः', बायीं ओर 'भैरवाय नमः' और ऊपर 'लम्बोदराय
नमः' ये तीन नमस्कार मन्त्र लिखना चाहिये। द्वारपूजा बाहर रहकर ही पूरी की
जाती है। दक्ष और वाम पार्श्व का निर्णय प्रवेश की दृष्टि से नहीं, वरन् निर्गम
की दृष्टि से करना चाहिये।
अब याग गृह में उस द्वार से प्रवेश कर आसनशुद्धि के मन्त्र से आसन
को दिव्य बनाकर उस पर उपवेशन करना चाहिये। यह आसन मन्त्र श्यामा
प्रकरण में लिखा गया है। उसी का प्रयोग करना उचित है। आसन पर आसीन
होकर मूलमन्त्र से प्राणायाम की प्रक्रिया पूरी करनी चाहिये। यद्यपि सूत्र में संकल्प
का उल्लेख नहीं है फिर भी 'श्रीविद्या की उपासना में निर्विघ्नता की सिद्धि के
लिये श्रीमहागणपति-क्रम का अनुपालन कर रहा हूँ' यह संकल्प अवश्य कर
लेना चाहिये।
तदनन्तर षडङ्गन्यास का क्रम आता है। मूलमन्त्र से हृदय, शिर, शिखा,
नेत्रत्रय, कवच और अस्त्रात्मक विन्यास आवश्यक है। इसमें क्रमशः नमः स्वाहा,
वषट्, वौषट्, हुम् और फट् इन पूरकों का उच्चारण चतुर्थ्यन्त अङ्गशब्दों के साथ

महागणपतिक्रमः ५५
करना विधिसम्मत है। इसके बाद सर्वाङ्ग न्यास करना चाहिये। इसे ही ‘व्यापक’
प्रक्रिया भी कहते हैं। यह प्रक्रिया भी मूल मन्त्र से ही पूरी की जाती है।
इसके बाद स्वात्म में सिद्धलक्ष्मी द्वारा समाश्लिष्ट पार्श्व, रक्तवर्ण,
अर्धेन्दुशेखर, एकादश हस्तों में एकादश प्रकार के आयुध एवं पदार्थ धारण
करने वाले, मद प्रभिन्न गण्डस्थल, परमानन्दनिमग्न और निखिल विघ्नराशि से
उत्पन्न उपद्रवों के दारक भगवान् विघ्नेश्वर का ध्यान करना चाहिये।
उनके द्वारा धार्यमाण द्रव्य एवं आयुध—
१. मातुलुङ्ग— एक प्रकार का जम्बीर चकोतरा (नींबू)
२. गदा— प्रसिद्ध आयुध।
३. पुण्ड्रेक्षु— एक प्रकार का गन्ना (पुण्ड्र-कमल, इक्षु-गन्ना) यह अर्थ भी है।
४. कार्मुक— धनुष।
५. शूल— प्रसिद्ध आयुध।
६. सुदर्शन— चक्र।
७. शङ्ख
८. पाश
९. उत्पल— कमल (संख्या तीन में कमल अर्थ गौण है)
१०. धान्य-मञ्जरी।
११. निजदन्ताञ्चल-रत्नकलश।
इन सभी से उनके हाथ शाश्वत परिष्कृत अर्थात् शोभायमान रहते हैं।
जहाँ तक स्वात्म शब्द का प्रश्न है, टीकाकार ने उसका अर्थ मन लगाया है
और मन तथा हृदय के ऐक्य का समर्थन किया है। तान्त्रिक दृष्टि इससे पृथक्
है। स्वात्म अपनी शैवसत्ता का केन्द्र होता है। मन को जीत कर हृदय केन्द्र
में ध्यान की विधि पूरी की जाती है॥४॥
एवं ध्यानान्तमुक्त्वा ततोऽर्घ्यस्थापनविधिं वक्तुमुपक्रमते
पुरतो मूलसप्ताभिमन्त्रितेन गन्धाक्षतपुष्पपूजितेन शुद्धेन वारिणा
त्रिकोण-षट्कोण-वृत्त-चतुरस्राणि विधाय तस्मिन् पुष्पाणि विकीर्य

५६ परशुरामकल्पसूत्रम्
वह्नीशासुरवायुषु मध्ये दिक्षु च षडङ्गानि विन्यस्य अग्निमण्डलाय
दशकलात्मने अर्घ्यपात्राधाराय नमः, सूर्यमण्डलाय द्वादशकलात्मने
अर्घ्यपात्राय नमः, सोममण्डलाय षोडशकलात्मने अर्घ्यामृताय नम
इति शुद्धजलमापूर्य अस्त्रेण संरक्ष्य कवचेनावकुण्ठ्य धेनु-योनि-
मुद्रां प्रदर्शयेत् ॥५॥
पुरतः स्वस्येति शेषः। मूलेन सप्तत्वम् आवृत्त्या सम्पादनीयम्। तैः
अभिमन्त्रितेन गन्धपुष्पाक्षतैः पूजितेन शुद्धेन पवित्रेण पटपूतेन वारिणा
त्रिकोणषट्कोण-वृत्त-चतुरस्राणि विधाय निर्माय तस्मिन् सङ्घात्मके मण्डले
पुष्पाणि विकीर्य वह्नीशासुरवायुषु मध्ये दिक्षु च षडङ्गानि मूलषडङ्गानि
विन्यस्य अग्निमण्डलाय नम इत्यारभ्य लिङ्गेन विभज्य मन्त्राणां त्रयाणाम्
‘आधाराय नमः’ ‘पात्राय नमः’ ‘अमृताय नमः’ इत्यन्तं शुद्धजलमापूर्य
अस्त्रमन्त्रेण संरक्ष्य कवचेनावकुण्ठ्य अन्यत्र गमनशक्तिरहितं कृत्वा
धेनुयोनिमुद्रां प्रदर्शयेत् ॥५॥
अपने समक्ष मूलमन्त्र से सात बार अभिमन्त्रित गन्ध, अक्षत और पुष्पों
द्वारा पूजित शुद्ध जल से त्रिकोण, षट्कोण, वृत्त और चतुष्कोणों का निर्माण
कर उन पर फूलों को बिखेर कर अग्नि और ईशान तथा नैऋत्य और वायव्य
कोणों में मध्य में और पूर्वादि दिशाओं में भी षडङ्गविन्यास करना चाहिये।
त्रिकोण आदि का निर्माण निर्धारित मुद्रा द्वारा ही करणीय है। सर्वप्रथम चतुरस्र
में, पुनः वृत्त में और इसके बाद त्रिकोण में अर्घ्यविधि सम्पन्न करनी चाहिये।
त्रिकोण, षट्कोण और चतुरस्र मण्डलों में तीन दिव्य मण्डलों की पूजा की
जाती है— १. अग्निमण्डल, २. सूर्यमण्डल और ३. सोममण्डल। अपने
स्वात्म रूप गणपति में त्रिनेत्र अग्निमण्डल, दक्षनेत्र सूर्यमण्डल और वाम नेत्र
सोममण्डल माना जाता है। अग्नि की दश कलायें होती हैं। इन दशों की पूजा
होती है। सम्प्रदायान्तर में इसे दशार रूप दश कला संयुक्त के स्थान पर
अष्टार चक्र कहते हैं। अग्निमण्डल में अर्घ्य पात्र का आधार स्थापित होता है।
अग्नि बीज के साथ और मूल मन्त्रों के साथ स्थापना की विधि पूरी होती है।
सूर्यमण्डल द्वादशार चक्र माना जाता है। सूर्य की द्वादश कलायें होती
हैं। इसमें मूल मन्त्र के साथ सविता का ‘आ सत्येन रजसा वर्त्तमानः’ इस मन्त्र

महागणपतिक्रमः ५७
में हकारयुक्त सबिन्दु दीर्घस्वर मन्त्र के साथ 'पात्राय नमः' कहकर पात्र की
स्थापना की जाती है।
इसी तरह सोममण्डल षोडशार चक्र होता है। चन्द्र की १६ कलायें
विख्यात हैं। समस्त सबिन्दुक स्वर इनके बीज हैं। इसमें 'अमृताय नमः' कहकर
अमृत रूप वारि सम्पूरण किया जाता है।
अस्त्र मन्त्र में इनकी संरक्षण प्रक्रिया पूरी होती है। कवच मुद्रा से
इन्हें सुप्ररुद्ध कर स्थिर कर देते हैं। इसके बाद धेनु और योनि मुद्रा का
प्रदर्शन करते हैं। धेनु मुद्रा से महागणपति का अनुग्रह दुग्धवत् स्रवित होने
लगता है और योनि मुद्रा से उनके आदि कारण होने की मान्यता का समर्थन
होता है। महागणपति के अर्घ्य स्थापन की यह प्रक्रिया गुरु के पास बैठकर
सीखनी चाहिये। शास्त्रपारङ्गत सिद्ध साधक स्वयं भी करने में समर्थ हो जाता
है॥५॥
अर्घ्यसंस्कारशेषानाह
सप्तवारमभिमन्त्र्य तज्जल-विप्रुड्भिरात्मानं पूजोपकरणानि च
सम्प्रोक्ष्य तज्जलेन पूर्वोक्तं मण्डलं परिकल्प्य तद्वदादिमं संयोज्य
तत्रोपादिमं मध्यमं च निक्षिप्य वह्न्यर्केन्दुकला अभ्यर्च्य वक्रतुण्ड-
गायत्र्या गणानां त्वेत्यनया ऋचा चाभिमन्त्र्य अस्त्रादिरक्षणं कृत्वा
तद्विन्दुभिस्त्रिशः शिरसि गुरुपादुकामाराधयेत् ।।६।।
मूलमन्त्रेण सप्तवारमित्यस्यादिः। तज्जलेन सामान्यार्घ्योदकेन आत्मानं
पूजोपकरणानि च सम्प्रोक्ष्य पूर्वोक्तं त्रिकोणादिरूपं मण्डलं संस्कृतदेशविशेषम्।
आदिमं प्रथमं संयोज्य आधारे वह्निकलाः धूम्रार्चिरादयः, पात्रे सूर्यकलाः
तापिन्यादयः, अमृते अमृतादयः चन्द्रकलाः चतुर्थ्यन्ततत्तन्नामभिः प्रागादि-
प्रादक्षिणयेन वृत्ताकारं यजेत्। वक्रतुण्डगायत्र्या 'तत्पुरुषाय विद्महे वक्रतुण्डाय
धीमहि। तन्नो दन्ती प्रचोदयात्' इत्यनया। 'गणानां त्वा' प्रसिद्धा ऋक्।
अभिमन्त्र्य अभिमन्त्रणं नाम मन्त्रपठनकाले संस्कार्य द्रव्यस्पर्शः। तद्विन्दुभिः
संस्कृतप्रथमबिन्दुभिः त्रिशः त्रिवारं शिरसि विधिबिले गुरुपादुकामारा-
धयेत् ।।६।।

५८ परशुरामकल्पसूत्रम्
मूलमन्त्र से सात बार अभिमन्त्रण करना चाहिये। सामान्यार्घ्य के जल-
बिन्दुओं से अपने को और पूजा के द्रव्यों का सम्प्रोक्षण भी आवश्यक है। उसी
जल से पहले कहे गये त्रिकोण, षट्कोण और चतुरस्र मण्डलों की परिकल्पना
कर आदि से अन्त तक की योजनाबद्ध रूप से आधार में वह्निकलाओं की,
पात्र में सूर्य-कलाओं की एवं अमृत में अमृतादि चन्द्र-कलाओं की पूजा करनी
चाहिये। कलाओं की पूजा उनके चतुर्थ्यन्त नामों के साथ पूर्व से दक्षक्रमानुसार
करनी चाहिये। जैसे 'श्रीं ह्रीं क्लीं यं धूम्रार्चिकलायै नमः' कहकर पूर्व में
धूम्रार्चिकला की पूजा की जाती है। इसके पहले मूलमन्त्र अग्नि ऋक् और
अग्निबीज में सबिन्दु दीर्घस्वरों के प्रयोग के साथ रमलवरयूं कहकर अग्निमण्डल
की कल्पना पूरी कर लेनी चाहिये।
यही क्रम सूर्य और सोम-कलाओं की पूजा में मूलमन्त्र और अन्य स्वीकृत
बीज मन्त्रों से पात्र एवं अमृत की स्थापना कर तापिन्यादि एवं अमृतकलादि
कलाओं की सविधि पूजा होनी चाहिये। वक्रतुण्ड गायत्री संस्कृत टीका में लिखी
है। 'गणानां त्वा' गणेश मन्त्र प्रसिद्ध मन्त्र है। इससे सभी उपचार द्रव्यों का
अभिमन्त्रण कर अस्त्र मन्त्र से संरक्षित करने का उल्लेख किया जा चुका
है। अर्घ्य जल से स्वात्म को संस्कृत कर गुरुपादुका को शिर पर धारण करना
चाहिये। इसकी आराधना के भी निर्धारित मन्त्र हैं। उन्हें गुरुदेव से सीखना
उचित है ॥६॥
पीठनियमपूर्वकं यन्त्रोद्धारमाह
पुरतो रक्तचन्दननिर्मिते पीठे महागणपतिप्रतिमायां वा चतुर-
स्राष्टदलषट्कोणत्रिकोणमये चक्रे वा तीव्रायै, ज्वालिन्यै, नन्दायै,
भोगदायै, कामरूपिण्यै, उग्रायै, तेजोवत्यै, सत्यायै, विघ्ननाशिन्यै,
ऋं धर्माय, ॠं ज्ञानाय, लृं वैराग्याय, लूं ऐश्वर्याय, ॠं अधर्माय,
ॠं अज्ञानाय, लृं अवैराग्याय, लूं अनैश्वर्याय नम इति पीठशक्ती-
धर्माद्यष्टकं चाभ्यर्च्य मूलमुच्चार्य 'महागणपतिमावाहयामि' इत्यावाह्य
पञ्चधोपचर्य दशधा सन्तर्प्य मूलेन मिथुनाङ्गब्राह्म्यादीन्द्रादिरूपपञ्चा-
वरणपूजां कुर्यात् ॥७॥

महागणपतिक्रमः ५९
पुरत इति पीठे इत्यन्तं मूर्त्याधारनियामकम्। वाकारद्वयं समविकल्प-
द्योतकम्। चतुरस्रं सर्वस्माद् बहिः, तदन्तः अष्टदलं तदन्तः षट्कोणं तदन्तः
त्रिकोणम् इति क्रमो ज्ञेयः। तीव्रादिषु पीठशक्तिरिति सङ्केताद् आसां
श्रीगणपत्याधारभूतपीठे रक्तचन्दननिर्मिते पूजनमिति ज्ञायते। तत्र क्रमानुक्तौ
प्रागादिष्वष्टदिक्षु मध्ये च नवशक्तयः पूज्याः। धर्मादीनां चतुष्टयं वायव्यादि-
विदिक्षु अधर्मादि चतुष्टयं पश्चिमादिप्रादक्षिण्येन पीठ एव समर्च्चयेत्। पीठशक्तीः
धर्माद्यष्टकं चेति द्वयोरेकदेशस्य श्रुतत्वात्। धर्मादीनां दिङ्नियमो वायुकोणतः।
पञ्चधा पञ्चप्रकारैः गन्ध-पुष्प-धूप-दीप-नैवेद्यरूपैः। उपचर्य पूजयित्वा। अत्र
मन्त्राः —
'लं' पृथिव्यात्मने गन्धं कल्पयामि। 'हं' आकाशात्मने पुष्पं कल्पयामि।
'यं' वाय्वात्मने धूपं कल्पयामि। 'रं' अग्न्यात्मने दीपं कल्पयामि। 'वं'
अमृतात्मने अमृतनैवेद्यं कल्पयामि।
मूलेन दशधा दशवारम्। सन्तर्प्य इत्यत्र तर्पण-साधनद्रव्यं
विशेषार्घ्यपात्रम्। तत्प्रकारश्च श्यामाक्रमे वक्ष्यमाणधर्म एव ग्राह्यः। एवमावरण-
पूजायामपि तत एव ग्राह्यः। तर्पणे तु मूलमुक्त्वा श्रीमहागणपतिं तर्पयामि इति
मन्त्रशेषः। मिथुनानामावरणद्वयम्। अङ्गदेवतास्तृतीयावरणम्। ब्राह्मयाद्याश्चतुर्था-
वरणम्। इन्द्राद्याः पञ्चमावरणम्। एवं पञ्चावरणपूजां कुर्यात् ।।७।।
समक्ष सुव्यवस्थित चन्दन निर्मित पीठ पर श्रीमहागणपति की पावन
प्रतिमा प्रतिष्ठित है। उसी प्रतिमा में निर्धारित देवियों, धर्माद्यष्टक और पीठ-
शक्तियों की पूजा की जाती है। इसमें विकल्पान्तर की प्रक्रिया सूत्रकार भी
स्वीकार करते हैं। वे कहते हैं कि, यह पूजा प्रतिमा के अतिरिक्त चतुरस्र,
अष्टदल, षट्कोण अथवा त्रिकोणमय चक्र में भी लोग करते हैं।
पूजा करने योग्य पीठशक्तिरूपा देवियों का सूत्र में नामोल्लेखपूर्वक
कथन है। वे हैं— १. तीव्रा, २. ज्वालिनी, ३. नन्दा, ४. भोगदा, ५. काम-
रूपिणी, ६. उग्रा, ७. तेजोवती, ८. सत्या और ९. विघ्नविनाशिनी। इनके
अतिरिक्त धर्माद्यष्टक की समन्त्रक पूजा की जाती है। श्रीरामेश्वरवृत्ति में उनका

६० परशुरामकल्पसूत्रम्

उल्लेख कर दिया गया है। उन्हीं मन्त्रों से इनकी पूजा पूरी करने के उपरान्त
मूल का उच्चारण कर 'मैं महागणपति का आवाहन कर रहा हूँ। इस प्रकार
श्रीमहागणपति का आवाहन करने के उपरान्त गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और
नैवेद्य से 'लं' पृथिव्यात्मकं गन्धं समर्पयामि, 'हं' आकाशात्मकं पुष्पं समर्पयामि,
'यं' वाय्वात्मकं धूपमाघ्रापयामि और 'वं' अमृतात्मने अमृतातकं नैवेद्यं
निवेदयामि इन मन्त्रों से पञ्चोपचार पूजन का विधान है। इसके बाद मूल से
दश बार सन्तर्पण करना चाहिये। तर्पण का साधक द्रव्य विशेषार्घ्यपात्र में
अवस्थित रहना चाहिये। तर्पण के लिये श्यामाक्रम में निर्दिष्ट विधि का
अनुसरण करना चाहिये। पञ्चावरण पूजा का क्रम तर्पण के बाद ही आता है।
दो आवरण तो मिथुनाङ्गभूत तर्पण मात्र हैं। तीसरा आवरण अङ्गदेवताओं के
लिये सुरक्षित माना जाता है। चौथे आवरण में ब्राह्मी आदि देवियों की पूजा
होती है और पञ्चम आवरण इन्द्र आदि देवों की पूजा के लिये निर्धारित है।
इस प्रकार पञ्चावरण पूजा पूरी होती है॥७॥
तत्र प्रधानदेवतातर्पणदेशं सविस्तरं प्रपञ्चयति
त्रिकोणे देवः, तस्य षडस्रस्यान्तराले श्रीश्रीपत्यादि-चतुर्मिथुनानि
अङ्गानि च ऋद्ध्यामोदादि-षण्मिथुनानि षडस्रे मिथुनद्वयं षडस्रोभय-
पार्श्वयोस्तत्सन्धिष्वङ्गानि ब्राह्मयाद्या अष्टदले चतुरस्राष्टदिक्ष्विन्द्राद्याः
पूज्याः सर्वत्र देवतानामसु श्रीपूर्वपादुकामुच्चार्य पूजयामीत्यष्टाक्षरीं
योजयेत् ।।८।।
त्रिकोणे देवः, तर्प्य इति शेषः। तत् त्रिकोणं षडस्रं च तयोरन्तराले
अनुक्तत्वात् प्रागादिदिक्षु चतुरावृत्तितर्पणपाठक्रमानुरोधेन श्रीश्रीपतिप्रभृति-
मिथुनचतुष्टयं पूज्यम्। एतावत् प्रथमावरणम्। ऋद्ध्यामोदमिथुनमारभ्य
षण्मिथुनानि षडस्रकोणेषु। एतदुत्तरवृत्ति मिथुनद्वयं षडस्रपार्श्वद्वये इति
द्वितीयावरणम्। षट्कोणयन्त्रे रेखोपरि रेखा यत्र गच्छति स तत्सन्धिः। तत्र
ईदृशाः सन्धयः षट् सन्ति, तादृशसन्धिषु क्रमस्यानुक्तत्वाद् अग्नीशा-
सुरवायुकोणक्रमस्यासम्भवात् प्रागपवर्गता उत्तरापवर्गता यथा स्यात् तथा,
क्रममनादृत्य षडङ्गानि यजेत्। इति तृतीयावरणम्।

महागणपतिक्रमः ६१
अष्टदले क्रमाकाङ्क्षायां श्रीविद्यार्णवोक्तः। आद्यचतसृणां वायव्यादि-
विदिक्षु प्रादक्षिण्‍येन पूज्या ब्राह्मयाद्या अष्टमातर इति चतुर्थावरणम्। चतुरस्रे
प्रागाद्यष्टदिक्षु तत्तद्दिक्पतीन् यजेत्, मन्त्राकाङ्क्षासत्त्वात् सन्निकृष्टश्यामाक्रमोक्त-
दिक्पालमन्त्रा ग्राह्याः। अथवा वक्ष्यमाणाष्टाक्षरीयुक्तनाममन्त्रेणैव। इति
पञ्चमावरणम्। सर्वत्र पूजासामान्ये देवतानामसु नाममन्त्रेषु। श्रीपूर्व-प्रथम-
पदमुच्चार्य ततः पादुकाम् इति। ततः पूजयामीति। तथा च श्रीपादुकां
पूजयामीति योज्यमिति यावत् ॥८॥
त्रिकोण में देवेश्वर का तर्पण करना चाहिये। तस्य अर्थात् त्रिकोण और
षट्कोण के अन्तराल में पूर्वांदिक् से प्रारम्भ कर श्री-श्रीपति से लेकर महालक्ष्मी-
महालक्ष्मीपति पर्यन्त चार मिथुनों की पूजा करनी चाहिये। इसमें यह ध्यान रखना
चाहिये कि, सूत्रकार ने चतुरावृत्तितर्पण क्रम का ही उल्लेख किया है। यह प्रथम
आवरण की पूजा है।
द्वितीय आवरण में ऋद्ध्यामोद मिथुन से लेकर वसुमती-पद्मनिधि पर्यन्त
छः मिथुन षट्कोण के छः कोणों में पूजित होते हैं। सातवाँ और आठवाँ
मिथुन षडङ्ग के पार्श्वद्वय में पूजनीय है। यह द्वितीयावरण की पूजा मानी जाती
है। षट्कोण यन्त्र में छः सन्धियाँ होती हैं। एक रेखा को जब दूसरी रेखा
काटती है, तो उस स्पर्श बिन्दु को सन्धि कहते हैं। इन सन्धि बिन्दुओं पर
प्रथमतः अग्निकोण, द्वितीयतः ईशानकोण, तृतीयतः निर्ऋति और चतुर्थतः
वायव्यकोण का क्रम न अपना कर छः अङ्गों की इस तरह पूजा करनी
चाहिये, जिससे प्रागपवर्गता और उत्तरापवर्गता का क्रम सिद्ध हो सके। पूरी
व्याप्ति से अपकर्षण की दृष्टि को अपवर्ग कहते हैं। समाप्ति को भी अपवर्ग
कहते हैं। यहाँ अपवर्ग का मोक्ष अर्थ नहीं है। प्राक्पूर्ति और उत्तरपूर्ति का क्रम
अर्थात् हृदय से अस्त्र पर्यन्त ही इसका अर्थ है। इस तरह की यह पूजा तृतीय
आवरण में होती है।
ब्राह्मी आदि अष्ट मातृकाओं की पूजा अष्टदल वाले अष्टकोणों में होनी
चाहिये। ब्राह्मी आदि चार मातृकाओं की पश्चिम उत्तर पूर्व और दक्षिण तथा
वाराही की वायव्य में, माहेन्द्री की ईशान में, चामुण्डा की अग्नि में और
महालक्ष्मी की नैर्ऋत्य में पूजा करनी चाहिये। यह चतुर्थ आवरण की पूजा है।

६२ परशुरामकल्पसूत्रम्
पञ्चम आवरण में चतुष्कोण की रेखाओं में पूर्व से प्रारम्भ कर मूल मन्त्र
के साथ श्यामा-क्रम के अनुसार अथवा अष्टाक्षरी नाम-मन्त्रानुसार पूजा करनी
चाहिये। जैसे श्रीं ह्रीं क्लीं लां इन्द्राय वज्रहस्ताय सुराधिपतये ऐरावतवाहनाय
सपरिवाराय नमः, इन्द्र श्रीपादुकां पूजयामि नमः। इस मन्त्र से पूर्व रेखा पर
इन्द्र की पूजा करनी चाहिये। इसी तरह अन्य पञ्चमावरण देवताओं की आगे
रेखाओं पर पूजा करनी चाहिये। अन्त में सामान्यार्घ्योदक से देवहस्त में पूजा
का अर्पण करना चाहिये॥८॥
गणनाथस्य पुनरुपतर्पणादि
एवं पञ्चावरणीमिष्ट्वा पुनर्देवं गणनाथं दशधोपतर्प्य
षोडशोपचारैरुपचर्य प्रणवमायान्ते सर्वविघ्नकृद्भ्यः सर्वभूतेभ्यो हुं
स्वाहा इति त्रिः पठित्वा बलिं दत्त्वा गणपतिबुद्ध्यैकं बटुकं
सिद्धलक्ष्मीबुद्ध्यैकां शक्तिं चाहूय गन्धपुष्पाक्षतैरभ्यर्च्यादिमोपादिम-
मध्यमान् दत्त्वा मम निर्विघ्नं मन्त्रसिद्धिर्भूयादित्यनुग्रहं कारयित्वा
नमस्कृत्य यथाशक्ति जपेत् ॥९॥
एवम् उक्तप्रकारेण पञ्चानामावरणानाम् आवरणदेवतानां समूहः
पञ्चावरणी, ‘द्विगोः’ इति ङीप्। ताम् इष्ट्वा पूजयित्वा। दशधा दशवारम्।
षोडशोपचारैरुपचर्य पूजयित्वा प्रणवः प्रसिद्धः। माया ह्रीं एतयोरन्ते स्वाहान्तं
शेषं पठेत्। बलिदानमन्त्रं त्रिः पठित्वा ततो बलिदानं कुर्यात्। गणपतिबुद्ध्या
गणपतिस्वरूपं भावयित्वेति यावत्। पाठक्रमं बाधित्वा अर्थक्रमेण आदौ
आवाहनं पश्चाद् भावनं ततोऽर्चनम्। एवमग्रेऽपि। आदिमं स्पष्टम्। उपादिमं
द्वितीयम्। मध्यमं तृतीयञ्च दत्त्वा। अनुग्रहं कारयित्वा। तयोरनुग्रहो यथा भवेत्
तथा तत्सन्तोषं स्वयं सम्पादयेद् इति भावः। नम इत्यारभ्य जपेद् इत्यन्तः
स्पष्टार्थः ॥९॥
पहले निर्देश के अनुसार पाँचों आवरण देवताओं की पूजा करनी चाहिये।
इसी में गणनाथ के अर्चन का क्रम विधिपूर्वक पूरा कर गणनाथ का तर्पण भी
कर लेना चाहिये। सोलह उपचारों— पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र,
आभूषण, गन्ध, पुष्प, धूप दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, नीराजन, पुष्पाञ्जलि, प्रदक्षिणा,

महागणपतिक्रमः ६३
साष्टाङ्ग प्रणति ये षोडशोपचार में गृहीत हैं। इस प्रक्रिया में होम का ग्रहण नहीं
किया गया है। इसके बाद तीन बार मन्त्रपाठ करने का विधान है। मन्त्र का
निर्देश सूत्रकार ने किया है 'प्रणव, मायाबीज 'ह्रीं' सर्वविघ्नकृद्भ्यः सर्वभूतेभ्यो
हुं स्वाहा' यह मन्त्रोद्धार का स्वरूप है। इस मन्त्र को तीन बार पढ़कर बलि
देनी चाहिये। बलि-प्रक्रिया पूरी कर लेने के अनन्तर गणपति की भावना से
भावित कर बटुक और सिद्धलक्ष्मी की भावना से भावित की गयी एक
शक्तिरूपिणी कुमारी को वहाँ बिठा कर गन्ध, पुष्प और अक्षत आदि से संक्षिप्त
पूजा करनी चाहिये। आवाहन, देवबुद्धि से भावन और तत्पश्चात् पूजन का क्रम
ही वास्तविक क्रम होता है। वहाँ जो दानीय पदार्थ सुरक्षित है, उसमें पहला,
दूसरा, तीसरा पदार्थ बटुक और शक्ति के उद्देश्य से दान कर देना चाहिये।
उनसे यह प्रार्थना आवश्यक होती है— 'हे शक्ति और शक्तिमन्त के
प्रतीक बटुक और शक्ति! मेरी निर्विघ्न मन्त्रसिद्धि सम्पन्न हो'। इस प्रार्थना के
आधार पर अनुग्रह का अमृतोद्वलन होने लगता है। इस तरह उनको अपनी
ओर आकर्षित कर उन्हें सन्तुष्ट और तृप्त कर और नमस्कार कर महागणपति
के गुरुप्रदत्त मन्त्र का यथाशक्ति जप करना चाहिये।
गणपत्युद्वासनम्
यद्यदग्निकार्यसम्पत्तिर्बलेः पूर्वं विधिवत् संस्कृतेऽग्नौ स्वाहान्तैः
श्रीश्रीपत्यादिविघ्नकर्त्तृपर्यन्तैर्मन्त्रैर्हुत्वा पुनरागत्य देवं त्रिवारं सन्तर्प्य
योग्यैस्सह मपञ्चकमुररीकृत्य महागणपतिमात्मन्युद्वास्य सिद्धसङ्कल्पः
सुखी विहरेद् इति शिवम् ॥१०॥
यदीत्यनेन होमस्य कृताकृतत्वं सूचितम्। बलेः पूर्वमित्यनेन क्रमशेषः
सूचितः। विधिवत्। श्रीश्रीपतिमिथुनमेका देवता श्रीश्रीपतिभ्यां स्वाहेति मन्त्र-
स्वरूपम्। विघ्नकर्त्तृपर्यन्तैरिति अग्रिममिथुननिवर्त्तकम्। हुत्वा इत्यत्र द्रव्या-
काङ्क्षायाम् 'अनादिष्ट आज्यं भवति' इति परिभाषया आज्यमेव।
कामनाविशेषे तु द्रव्यविशेषो मोदकादिः। पुनरागत्य इत्यनेन पूजाप्रदेशादन्यो
होमप्रदेशः। योग्यैः सम्प्रदायाभिज्ञैः सह। मपञ्चकमुररीकृत्य स्वीकृत्य।
उद्वासनमुद्रया उद्वास्य। सिद्धसङ्कल्पः सिद्धकार्यः। सुखी विहरेद् इति

६४ परशुरामकल्पसूत्रम्
प्रतिपादितकर्मणो न केवलं प्रत्यूहनाशः किन्तु इदमपि फलं दर्शितम्।
शिवमिति पूर्ववत् प्रकरणसमाप्तिद्योतकम्।
।। इति श्रीपरशुरामकल्पसूत्रे श्रीरामेश्वरनिर्मितायां सौभाग्योदयनाम्न्यां
परशुरामकल्पसूत्रवृत्तौ (मुख्यांशमात्रायां) गणनायकपद्धतिर्नाम
द्वितीयः खण्डः सम्पूर्णः ।।
यदि शब्द के प्रयोग से यह अर्थ सूचित हो रहा है कि, गणपतिक्रम
की प्रक्रियाओं के अन्त में हवन कार्य करते भी हैं और नहीं भी करते हैं।
कोई अनिवार्य नहीं है कि, हवन करना ही चाहिये। न करने में भी कोई दोष
नहीं है। यदि करने का निर्णय आचार्य ने ले ही लिया है, तो बलि कर्म के
पहले ही इसे सम्पादित करना उचित है। वह्निसंस्कार वैदिक द्वारा वैदिक मन्त्रों
से करना चाहिये अथवा श्यामादिक्रम में जो विधि लिखी गयी है, उसके ही
अनुसार पूरा करना चाहिये। श्री-श्रीपति से लेकर अविघ्नद्राविणी-विघ्नकर्तृ पर्यन्त
मिथुन रूप देवताओं के साथ स्वाहा शब्द प्रयोग के साथ मन्त्रोद्धार कर हवन
करना चाहिये। जैसे, 'श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीश्रीपतिभ्यां स्वाहा' इस मन्त्र से श्री-श्रीपति
मिथुन के लिये हवन करना चाहिये। इसी तरह १० मिथुनों का हवन आवश्यक
माना जाता है। यह ध्यान रखना चाहिये कि, यह हव्य की और चरु की आहुति
नहीं होती, वरन् मात्र आज्याहुति ही होती, शास्त्र में यह स्पष्ट उल्लेख है कि,
जहाँ हवनीय किसी द्रव्य का उल्लेख नहीं होता है वहाँ मात्र आज्य का ही
ग्रहण होता है, किसी काम्य कर्म में कामना विशेष में मोदक आदि द्रव्यों के
हवन भी किये जाते हैं।
उस स्थान पर जहाँ हवन होता है, वह पूजा प्रदेश से पृथक् रहना
चाहिये। यहाँ सूत्रोल्लिखित पुनरागत्य शब्द यही व्यक्त कर रहा है। पूजा देश
में आकर महागणपति का तीन बार सन्तर्पण करना चाहिये। देवतर्पण के अनन्तर
योग्य कुलाचार विशेषज्ञ उपासकों के साथ मपञ्चक अर्थात् पञ्चमकार का सेवन
किया जाना चाहिये। पञ्चमकार का प्रयोग गुरु के निर्देश में होना चाहिये।
स्वच्छन्द आचार कुलाचार नहीं होता। इसीलिये श्री भार्गव महोपाध्याय परशुराम
को कुलाचार्य भी कहा गया है।
तदनन्तर महागणपति का उद्वासन करना चाहिये। उद्वासन शब्द लोक में
जिस अर्थ में प्रयुक्त होता है, उसके विपरीत यहाँ स्वात्मसात् करने अर्थ में

महागणपतिक्रमः ६५
प्रयुक्त किया गया है। बहिर्याग में बाहर उनकी पूजा सम्पन्न हो चुकी। अब स्वात्म
में समाहित कर स्वयं गणपतिरूप बनकर दिव्य अनुभूतियों से भर जाना चाहिये।
इस तरह व्यक्ति सिद्धसंकल्प हो जाता है। विघ्नों के विनाशक विघ्नेश्वर की
प्रसन्नता और स्वात्म संविदुत्कर्ष के फलस्वरूप सुखपूर्वक विश्व में विहार कर
सकता है। अन्त में समाप्तिपूर्वक कल्याण कामना के लिये 'इति शिवम्' इस
मन्त्र रूप मङ्गल शब्द का प्रयोग सम्प्रदाय के अनुकूल है।
।। श्रीरामेश्वरकृत मुख्यांश सौभाग्योदयवृत्तिसहित
डॉ. परमहंसमिश्रकृत नीर-क्षीर-विवेक भाषा-भाष्य-समन्वित
श्रीपरशुरामकल्पसूत्र का महागणपतिक्रम नामक द्वितीय खण्ड परिपूर्ण ।। २ ।।
।। शुभं भूयात् ।।

श्रीक्रमः
श्रीललिताधिकारः
[ तृतीयः खण्डः ]
एवं श्रीललितोपास्यङ्गभूतं गणपत्युपासनमुक्त्वा श्रीपरदेवतायाः श्रीललितायाः
क्रमं वक्तुमुपक्रमते
एवं गणपतिमिष्ट्वा विधूतसमस्तविघ्नव्यतिकरः शक्तिचक्रैक-
नायिकायाः श्रीललितायाः क्रममारभेत ।। १ ।।
एवमिति विघ्नव्यतिकर इत्यन्तेन ग्रन्थेन पूर्वं कञ्चित्कालं गणपत्या-
राधनं कृत्वा पश्चात् श्रीललितोपास्त्यारम्भ इति सूचितम्। एवं पूर्वोक्तप्रकारेण
इष्ट्वा उपास्य विधूता निरस्ताः समस्ताः सम्पूर्णा विघ्नानां प्रत्यूहव्यतिकराः
सङ्घाता येन, विधूतसमस्तविघ्नव्यतिकर इति पूर्वोक्तफलस्यानुवादकम्। एवं
चारम्भो नाम सङ्कल्पविशेषः। ललिताक्रममारभेत इत्यनेन यावज्जीवं वर्त्तिष्य
इति सङ्कल्पः सिद्धः। तदङ्गं गणपत्याराधनम्।
गणपत्युपास्तिं सम्पाद्य सम्पन्नाधिकारस्ततः श्रीविद्योपास्तिं कुर्यात्।
शक्तिचक्रैकनायिकायाः शक्तिचक्राणि श्रीचक्रावयवनवचक्राणां मध्ये
त्रिकोणादीनि पञ्चचक्राणि। तदुक्तं ब्रह्माण्डपुराणे—
चतुर्भिः शिवचक्रैश्च शक्तिचक्रैश्च पञ्चभिः।
नवचक्रैश्च संसिद्धं श्रीचक्रं शिवयोर्वपुः।।
त्रिकोणमष्टकोणं च दशकोणद्वयं तथा ।
चतुर्दशारं चैतानि शक्तिचक्राणि पञ्च च ।।

श्रीक्रमः ६७
तेषामेका मुख्या नायिका या तस्याः। यद्वा शक्तयः सधवाः स्त्रिय-
स्तासां चक्रं समूहस्तेषां मध्ये एका अद्वितीया चेदं नायिका जगन्नियन्त्री। यद्वा
शक्तयः श्यामा-वार्ताली-प्रभृतयः। ता एव चक्रं परिवारस्तासामेका नायिका,
अद्वितीयनियन्त्री। एतेन श्रीविद्यायाः प्राधान्यं सूचितम्। शक्तिचक्रनायिकेति
ललिताया गुणः। इत्थं च यत्र देवतानामकीर्तनमावश्यकं तत्र गुणविशिष्टस्यैव
कीर्तनम्। यथा सन्ध्या-जपादौ शक्तिचक्रैकनायिकायाः श्रीललितायाः प्रीतये
अमुकं कर्म करिष्य इति। क्रमं पूजामुपासनां वाऽऽरभेत। ललितं शृङ्गारभाव-
जन्यः क्रियाविशेषः, तद्वती ललिता ।।१।।
एवं से विघ्नव्यतिकर पर्यन्त सूत्रवाक्य द्वारा यह स्पष्ट होता है कि,
गणपति की आराधनासिद्धि के उपरान्त ही परमाम्बा श्रीललिताम्बा की उपासना
का आरम्भ करना चाहिये। इस प्रकार गणपति की उपासना पूरी करने से उपासक
के समस्त विघ्नसंघात स्वतः निरस्त और इष्ट के अनुग्रह से ध्वस्त हो जाते
हैं। ऐसा उपासक निर्विघ्न श्रीविद्या उपासना में संलग्न होकर सिद्धि प्राप्त कर
सकता है। इस प्रकार के आरम्भ में संकल्प विशेष का स्वरूप भी
दृष्टिगोचर होता है।
अन्त में ललिता-क्रम का आरम्भ करे, यह सूत्रकार का निर्देश है। इससे
यह स्पष्ट हो रहा है कि, उपासक यह संकल्प ले कि, मैं आजीवन माँ की
उपासना के लिये स्वात्म को अर्पित कर रहा हूँ। वास्तविकता यह है कि,
गणपति की आराधना मातृ-उपासना का ही एक अंग है।
भगवान् श्री महागणपति की उपासना का यह सुखप्रद परिणाम है कि,
उपासक श्रीललिताम्बा की उपासना का अधिकारी बन जाता है। सम्पन्नाधिकार
उपासक ही माँ की उपासना में प्रवृत्त हो, यही उचित है। माँ शक्तिचक्र की
एकमात्र नायिका है। शक्तिचक्र शब्द पर विशेष ध्यान देना चाहिये। श्रीचक्र के
अवयव रूप नव चक्र प्रसिद्ध हैं। उनके मध्य में त्रिकोण आदि पाँच चक्र हैं।
यह सभी उपासक जानते हैं। इस सम्बन्ध में श्री ब्रह्माण्ड-पुराण में
स्पष्ट उल्लेख है कि—
“चार शिव-चक्र' 'पाँच शक्ति-चक्र' और नव चक्रों से निर्मित श्रीचक्र
शिव और शक्ति का सामरस्यमय साकारविग्रह है। इसमें त्रिकोण, अष्टकोण,
द्वादश कोण, पाँच शक्तिचक्र रूप चतुर्दशार श्रीचक्र सर्वातिशायित्वेन वर्त्तमान
उपास्य चक्र है।”

६८ परशुरामकल्पसूत्रम्
शक्तिचक्रैकनायिका शब्द श्लिष्ट अर्थों का उत्स है। इसके कुछ अर्थ इस
प्रकार किये गये हैं—
१. वह उक्त चक्रों की एकमात्र मुख्य नायिका अर्थात् सर्वनियामिका नियन्त्री
शक्ति है।
२. शक्ति-चक्र अर्थात् सधवा स्त्रियों का समूह। उनके मध्य एका अर्थात्
अद्वितीया जयन्त्रियन्त्री माँ श्रीललिताम्बा।
३. सर्वस्वरूपा सर्वेश्वरी सर्वशक्ति-समन्विता सर्वकार्य-निर्वाहिका शक्तियों की
एकमात्र प्रेरयित्री माँ जगदीश्वरी ललिता।
४. श्यामा, वार्ताली आदि अङ्गभूत शक्तियों के चक्र रूप परिवार की एकमात्र
संचालिका।
इन अर्थों में माँ ललिताम्बा श्रीविद्या की प्रधानता का ही द्योतन हो रहा
है। इससे एक और. संकेत मिलता है कि, जब किसी प्रसङ्ग में देवता का नाम
लिया जाय, तो उसके वैशिष्ट्य-बोधक आदरयुक्त विशेषणों के साथ ही लिया
जाय। जैसे सन्ध्या या जप के संकल्प में 'शक्तिचक्रैकनायिकायाः श्रीललिताम्बाया
आराधनमहं करिष्ये' इस प्रकार का योजन करना उचित है। इसी तरह इस क्रम
को आरम्भ करना चाहिये। यह वाक्य क्रमार्थक उपासना का ही अध्याहार करता
है। ललित शब्द का अर्थ शृङ्गारभाव रूप क्रियाविशेष माना जाता है। उसी
विशेषता से पूरित माँ श्रीललिताम्बा भी हैं॥१॥
ततो गुरुध्यानादीनुपदिशति सूत्रद्वयेन
ब्राह्मे मुहूर्त्ते ब्राह्मणे मुक्तस्वापः पापविलापाय परमशिवरूपं
गुरुमभिमृश्य ॥२॥
ब्राह्मो मुहूर्त्तः, दिवसः षष्टिघटिकात्मकं त्रिंशता विभज्य अष्टाविंशो
मुहूर्तः स ब्राह्मः। तदुक्तं देवीभागवते—
अष्टाविंशतितमो यश्च मुहूर्त्तो ब्रह्मनामकः।
तस्मिन्नुत्थाय मतिमाँश्चिन्तयेदात्मनो हितम् ।।
तस्मिन् ब्राह्मणे मुक्तस्वापो निद्रां त्यक्त्वा ईदृशकाल उत्थाय सर्वपाप-
क्षयाय शिव एव गुरुः, न ततोऽन्य इति अभिमृश्य मनसि ध्यात्वा ॥२॥

श्रीक्रमः ६९
६० घड़ियों का एक दिन माना जाता है। इसमें ३० भाग करने पर
जो अट्ठाइसवाँ भाग आता है, उसे ब्राह्म मुहूर्त कहते हैं। देवीभागवत में यह
स्पष्ट उल्लेख है कि, सूर्योदय से सूर्योदय तक के ६० घटी के काल को तीस
भागों में बाँटने पर अट्ठाइसवाँ मुहूर्त महत्त्वपूर्ण होता है। उसे 'ब्राह्म' नाम से
जानते हैं। वही ब्राह्म मुहूर्त है। इसमें उठकर सुबुद्ध पुरुष आत्मकल्याण अर्थात्
निःश्रेयस् का चिन्तन करे।
उस अतिविशिष्ट मुहूर्त में नींद से जागकर बिस्तर छोड़ दें। बाह्यान्तर
शुद्धि कर समस्त जन्मजन्मान्तरीय दुरितों के क्षय के लिये तत्परतापूर्वक लग
जाना चाहिये। एतदर्थ सर्वप्रथम 'शिव ही मेरे गुरुदेव हैं। उनके अतिरिक्त नहीं'
इस आन्तर चिन्तन में रत होना चाहिये। उसे ही अभिमर्श कहते हैं। विमर्श
का ही यह पहला परामर्श है। ध्यान की यह एक मानस-प्रक्रिया है। श्रद्धा का
यहाँ से उद्रेक होने लगता है॥२॥
मूलादिविधिपर्यन्तं तडित्कोटिकडारं तरुण-दिवाकरपिञ्जरं
ज्वलन्तीं मूलसंविदं ध्यात्वा तद्रश्मिनिहतकश्मलजालः कादिं हादिं
वा मूलविद्यां मनसा दशवारमावर्त्य ।।३।।
मूलाधारचक्रं तदादि तदारभ्य विधिबलिपर्यन्तम्। एतस्य ज्वलन्ती-
मित्यनेनान्वयः। तडित्कोटयो विद्युत्कोटयस्तद्वत् कडारं कपिशां, तरुण-
दिवाकरो नभोमध्यवर्ती सूर्यस्तद्वत् पिञ्जरामत एव ज्वलन्तीं मूलसंविदं
निर्विषयचितं ध्यात्वा तद्रश्मिभिर्निहतानि परिहृतानि कश्मलानां जालानि
समूहा येन ईदृशः सन् कादिं कामोपास्तीहादिं लोपामुद्रोपासितां वा विद्यां
पञ्चदशीं मनसा क्रमविशिष्टान् वर्णान् ध्यात्वा।।३।।
मूलाधार चक्र से ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्त संविद् तत्त्वरूपा मूल निर्विकल्पिका
चितिशक्ति जीवन के वरदान रूप से शरीर में शाश्वत व्याप्त है। उसकी भूरे
रंग से भाव्यमान आभा करोड़ों की संख्या में एक साथ कौंधने वाली बिजलियों
की कपिशवर्णी शोभा के समान प्रकाशमान रहती है। आकाशमध्यवर्त्ती ज्येष्ठ
के तपते आदित्य की दीप्ति के समान पिञ्जरवर्णी संवित्ति देवी अपनी दिव्यता
से शाश्वत उद्दीप्त रहती है। उसका ध्यान श्रीविद्या का उपासक ब्राह्म मुहूर्त में

७० परशुरामकल्पसूत्रम्

करे, यह सूत्रकार कह रहे हैं। इस ध्यान का सुपरिणाम साधक को तत्काल
प्राप्त हो जाता है। संवित्ति देवी की दिव्य रश्मियों की आन्तर आग से उपासक
के सारे कश्मल-जाल जल जाते हैं। अब वह तप्त दिव्य काञ्चन की तरह दिव्य
बन जाता है। इस दशा में अब वह काम द्वारा उपासना से सिद्ध कादि अथवा
लोपामुद्रा द्वारा उपासित हादि नामक मूलविद्या का मन ही मन दश बार आवर्त्तन
करे। यहाँ सूत्रकार ने मुख्य रूप से अनिवार्य करणीय कृत्य का ही निर्देश दिया
है। इस प्रसङ्ग में मुद्राओं से पादुका-पूजन, अनेकानेक श्लोक-पाठ, दन्तधावन
और गण्डूष मन्त्र आदि को त्याज्य ही सिद्ध कर दिया गया है॥३॥

ततः स्नानसन्ध्ये वदति

स्नानकर्मणि प्राप्ते मूलेन दत्त्वा त्रिः सलिलाञ्जलीन् त्रिस्तद-
भिमन्त्रिताः पीत्वापस्त्रिस्सन्तर्प्य त्रिः प्रोक्ष्यात्मानं परिधाय वाससी हां
हीं हूं सः इत्युक्त्वा मार्त्तण्डभैरवाय प्रकाशशक्तिसहिताय स्वाहेति
त्रिः सवित्रे दत्त्वार्घ्यः ॥४॥

स्नानकर्मणि प्राप्ते स्नानावसरे। एतेन वैदिक-स्नानोत्तरत्वम् अस्य
सूचितम्। मूलेन मूलमुच्चारयन्नित्यर्थः। दत्त्वा स्वशिरसि त्रिः सलिलाञ्जलीन्,
अत्र प्रत्यञ्जलि मन्त्रावृत्तिः। त्रिः तदभिमन्त्रिता मूलाभिमन्त्रिता आपः पीत्वा।
मूलत्रिवाराभिमन्त्रितानाम् अपां सकृदेव प्राशनम्। त्रिः सन्तर्प्य, मूलमुच्चार्य
शक्तिचक्रैकनायिकां श्रीललितां तर्पयामीति मन्त्रस्य सकृत्पाठः। त्रिः आत्मानं
(मूलेन) सम्प्रोक्ष्य, वाससी परिधाय, वस्त्रपरिधानं स्मृतिप्राप्तमनूद्यते। 'हां हीं
हूं सः' इत्युक्त्वा स्वाहान्तो अर्घ्यदानमन्त्रः। सवित्रे दत्त्वार्घ्यः॥४॥

स्नान उपासना का एक अंग है। इससे शारीरिक सुचिता की प्राप्ति होती
है। स्नान के अवसर पर कुछ विशेष करणीय कृत्य के निर्देश यहाँ दिये गये
हैं, वे क्रमशः इस प्रकार हैं—
१. सर्वप्रथम वैदिक विधि से स्नान् करने के उपरान्त ही तान्त्रिक विधि से स्नान
करना त्रैवर्णिक का धर्म है।
२. मूल श्रीविद्या के मन्त्र से तीन बार प्रत्यञ्जलि मन्त्र पढ़कर शिर पर डालना
चाहिये।

श्रीक्रमः ७१
३. मूलाभिमन्त्रित (मूल से तीन बार अभिमन्त्रित) पेय जल पीना चाहिये।
४. माँ श्रीललिताम्बा का (मूलमन्त्र पढ़ते हुए) 'शक्तिचक्रैकनायिकां श्रीललितां
तर्पयामि' इस मन्त्र से तीन बार तर्पण करना चाहिये।
५. मूल मन्त्र से ही तीन बार स्वात्म का संप्रोक्षण करना चाहिये। इससे शरीर
में दिव्यता का आधान हो जाता है।
६. इतनी प्रक्रिया पूरी कर वस्त्र का परिधान कर्म पूरा होता है। कपड़ा पहनने
से स्नान की प्रक्रिया पूरी हो जाती है।
७. इसके बाद सूर्य को तीन बार अर्घ्य देना चाहिये। अर्घ्य का मन्त्र सूत्र में
निर्दिष्ट है। वह इस प्रकार है—
'हां हीं हूं सः मार्तण्डभैरवाय प्रकाशसहिताय स्वाहा'। इस मन्त्र से अर्घ्य
देकर मार्तण्डभैरव रूप सूर्य का प्रणाम करना चाहिये। इस तरह स्नान की प्रक्रिया
पूरी कर उपासक अब नयी चेतना प्राप्त कर लेता है। एतदुपरान्त उपासना के
आगे के अंगों का विधान उसे पूरा करना चाहिये॥४॥
ततः श्रीचक्रभावनं, सवितृमण्डले देव्यै अर्घ्यदानं च विधीयते
तन्मण्डलमध्ये नवयोनिचक्रमनुचिन्त्य 'वाचमुच्चार्य त्रिपुर-
सुन्दरि विद्महे काममुच्चार्य पीठकामिनि धीमहि शक्तिमुच्चार्य तन्नः
क्लिन्ना प्रचोदयात्' इति त्रिमहेश्यै दत्तार्घ्यः शतमष्टोत्तरमामृश्य मनु-
मौनमालम्ब्य ।।५।।
तस्य सवितृमण्डलस्य मध्ये नवयोनयः चतस्रः पराङ्मुखा पञ्च
स्वाभिमुखा योनयो यस्मिन् तद् नवयोनिचक्रं श्रीचक्रमित्यर्थः। वाचं
प्रथमकूटम्। प्रथमकूटानन्तरं विद्महे इत्यन्तं पठेत्। ततः कामं मध्यकूटं
तदुच्चार्य 'पीठकामिनि धीमहि' इति पठेत्। शक्तिं शक्तिकूटं तृतीयमुच्चार्य
पठित्वा ततः प्रचोदयादित्यन्तं पठेत्। इदं त्रिपुरागायत्रीत्यप्युच्यते। आमृश्य
जपित्वा। शेषं स्पष्टम्।।५।।
सूर्य-मण्डल जो देखने में वर्तुलाकार प्रतीत होता है, उसके मध्य अर्थात्
केन्द्र भाग में श्रीचक्र का ध्यान करना चाहिये। श्रीचक्र को ही नवयोनिचक्र,