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परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 100, कुल 320 में से

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५८ परशुरामकल्पसूत्रम्
मूलमन्त्र से सात बार अभिमन्त्रण करना चाहिये। सामान्यार्घ्य के जल-
बिन्दुओं से अपने को और पूजा के द्रव्यों का सम्प्रोक्षण भी आवश्यक है। उसी
जल से पहले कहे गये त्रिकोण, षट्कोण और चतुरस्र मण्डलों की परिकल्पना
कर आदि से अन्त तक की योजनाबद्ध रूप से आधार में वह्निकलाओं की,
पात्र में सूर्य-कलाओं की एवं अमृत में अमृतादि चन्द्र-कलाओं की पूजा करनी
चाहिये। कलाओं की पूजा उनके चतुर्थ्यन्त नामों के साथ पूर्व से दक्षक्रमानुसार
करनी चाहिये। जैसे 'श्रीं ह्रीं क्लीं यं धूम्रार्चिकलायै नमः' कहकर पूर्व में
धूम्रार्चिकला की पूजा की जाती है। इसके पहले मूलमन्त्र अग्नि ऋक् और
अग्निबीज में सबिन्दु दीर्घस्वरों के प्रयोग के साथ रमलवरयूं कहकर अग्निमण्डल
की कल्पना पूरी कर लेनी चाहिये।
यही क्रम सूर्य और सोम-कलाओं की पूजा में मूलमन्त्र और अन्य स्वीकृत
बीज मन्त्रों से पात्र एवं अमृत की स्थापना कर तापिन्यादि एवं अमृतकलादि
कलाओं की सविधि पूजा होनी चाहिये। वक्रतुण्ड गायत्री संस्कृत टीका में लिखी
है। 'गणानां त्वा' गणेश मन्त्र प्रसिद्ध मन्त्र है। इससे सभी उपचार द्रव्यों का
अभिमन्त्रण कर अस्त्र मन्त्र से संरक्षित करने का उल्लेख किया जा चुका
है। अर्घ्य जल से स्वात्म को संस्कृत कर गुरुपादुका को शिर पर धारण करना
चाहिये। इसकी आराधना के भी निर्धारित मन्त्र हैं। उन्हें गुरुदेव से सीखना
उचित है ॥६॥
पीठनियमपूर्वकं यन्त्रोद्धारमाह
पुरतो रक्तचन्दननिर्मिते पीठे महागणपतिप्रतिमायां वा चतुर-
स्राष्टदलषट्कोणत्रिकोणमये चक्रे वा तीव्रायै, ज्वालिन्यै, नन्दायै,
भोगदायै, कामरूपिण्यै, उग्रायै, तेजोवत्यै, सत्यायै, विघ्ननाशिन्यै,
ऋं धर्माय, ॠं ज्ञानाय, लृं वैराग्याय, लूं ऐश्वर्याय, ॠं अधर्माय,
ॠं अज्ञानाय, लृं अवैराग्याय, लूं अनैश्वर्याय नम इति पीठशक्ती-
धर्माद्यष्टकं चाभ्यर्च्य मूलमुच्चार्य 'महागणपतिमावाहयामि' इत्यावाह्य
पञ्चधोपचर्य दशधा सन्तर्प्य मूलेन मिथुनाङ्गब्राह्म्यादीन्द्रादिरूपपञ्चा-
वरणपूजां कुर्यात् ॥७॥