परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ परशुरामकल्पसूत्रम्
पञ्चम आवरण में चतुष्कोण की रेखाओं में पूर्व से प्रारम्भ कर मूल मन्त्र
के साथ श्यामा-क्रम के अनुसार अथवा अष्टाक्षरी नाम-मन्त्रानुसार पूजा करनी
चाहिये। जैसे श्रीं ह्रीं क्लीं लां इन्द्राय वज्रहस्ताय सुराधिपतये ऐरावतवाहनाय
सपरिवाराय नमः, इन्द्र श्रीपादुकां पूजयामि नमः। इस मन्त्र से पूर्व रेखा पर
इन्द्र की पूजा करनी चाहिये। इसी तरह अन्य पञ्चमावरण देवताओं की आगे
रेखाओं पर पूजा करनी चाहिये। अन्त में सामान्यार्घ्योदक से देवहस्त में पूजा
का अर्पण करना चाहिये॥८॥
गणनाथस्य पुनरुपतर्पणादि
एवं पञ्चावरणीमिष्ट्वा पुनर्देवं गणनाथं दशधोपतर्प्य
षोडशोपचारैरुपचर्य प्रणवमायान्ते सर्वविघ्नकृद्भ्यः सर्वभूतेभ्यो हुं
स्वाहा इति त्रिः पठित्वा बलिं दत्त्वा गणपतिबुद्ध्यैकं बटुकं
सिद्धलक्ष्मीबुद्ध्यैकां शक्तिं चाहूय गन्धपुष्पाक्षतैरभ्यर्च्यादिमोपादिम-
मध्यमान् दत्त्वा मम निर्विघ्नं मन्त्रसिद्धिर्भूयादित्यनुग्रहं कारयित्वा
नमस्कृत्य यथाशक्ति जपेत् ॥९॥
एवम् उक्तप्रकारेण पञ्चानामावरणानाम् आवरणदेवतानां समूहः
पञ्चावरणी, ‘द्विगोः’ इति ङीप्। ताम् इष्ट्वा पूजयित्वा। दशधा दशवारम्।
षोडशोपचारैरुपचर्य पूजयित्वा प्रणवः प्रसिद्धः। माया ह्रीं एतयोरन्ते स्वाहान्तं
शेषं पठेत्। बलिदानमन्त्रं त्रिः पठित्वा ततो बलिदानं कुर्यात्। गणपतिबुद्ध्या
गणपतिस्वरूपं भावयित्वेति यावत्। पाठक्रमं बाधित्वा अर्थक्रमेण आदौ
आवाहनं पश्चाद् भावनं ततोऽर्चनम्। एवमग्रेऽपि। आदिमं स्पष्टम्। उपादिमं
द्वितीयम्। मध्यमं तृतीयञ्च दत्त्वा। अनुग्रहं कारयित्वा। तयोरनुग्रहो यथा भवेत्
तथा तत्सन्तोषं स्वयं सम्पादयेद् इति भावः। नम इत्यारभ्य जपेद् इत्यन्तः
स्पष्टार्थः ॥९॥
पहले निर्देश के अनुसार पाँचों आवरण देवताओं की पूजा करनी चाहिये।
इसी में गणनाथ के अर्चन का क्रम विधिपूर्वक पूरा कर गणनाथ का तर्पण भी
कर लेना चाहिये। सोलह उपचारों— पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र,
आभूषण, गन्ध, पुष्प, धूप दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, नीराजन, पुष्पाञ्जलि, प्रदक्षिणा,