परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहागणपतिक्रमः ५७
में हकारयुक्त सबिन्दु दीर्घस्वर मन्त्र के साथ 'पात्राय नमः' कहकर पात्र की
स्थापना की जाती है।
इसी तरह सोममण्डल षोडशार चक्र होता है। चन्द्र की १६ कलायें
विख्यात हैं। समस्त सबिन्दुक स्वर इनके बीज हैं। इसमें 'अमृताय नमः' कहकर
अमृत रूप वारि सम्पूरण किया जाता है।
अस्त्र मन्त्र में इनकी संरक्षण प्रक्रिया पूरी होती है। कवच मुद्रा से
इन्हें सुप्ररुद्ध कर स्थिर कर देते हैं। इसके बाद धेनु और योनि मुद्रा का
प्रदर्शन करते हैं। धेनु मुद्रा से महागणपति का अनुग्रह दुग्धवत् स्रवित होने
लगता है और योनि मुद्रा से उनके आदि कारण होने की मान्यता का समर्थन
होता है। महागणपति के अर्घ्य स्थापन की यह प्रक्रिया गुरु के पास बैठकर
सीखनी चाहिये। शास्त्रपारङ्गत सिद्ध साधक स्वयं भी करने में समर्थ हो जाता
है॥५॥
अर्घ्यसंस्कारशेषानाह
सप्तवारमभिमन्त्र्य तज्जल-विप्रुड्भिरात्मानं पूजोपकरणानि च
सम्प्रोक्ष्य तज्जलेन पूर्वोक्तं मण्डलं परिकल्प्य तद्वदादिमं संयोज्य
तत्रोपादिमं मध्यमं च निक्षिप्य वह्न्यर्केन्दुकला अभ्यर्च्य वक्रतुण्ड-
गायत्र्या गणानां त्वेत्यनया ऋचा चाभिमन्त्र्य अस्त्रादिरक्षणं कृत्वा
तद्विन्दुभिस्त्रिशः शिरसि गुरुपादुकामाराधयेत् ।।६।।
मूलमन्त्रेण सप्तवारमित्यस्यादिः। तज्जलेन सामान्यार्घ्योदकेन आत्मानं
पूजोपकरणानि च सम्प्रोक्ष्य पूर्वोक्तं त्रिकोणादिरूपं मण्डलं संस्कृतदेशविशेषम्।
आदिमं प्रथमं संयोज्य आधारे वह्निकलाः धूम्रार्चिरादयः, पात्रे सूर्यकलाः
तापिन्यादयः, अमृते अमृतादयः चन्द्रकलाः चतुर्थ्यन्ततत्तन्नामभिः प्रागादि-
प्रादक्षिणयेन वृत्ताकारं यजेत्। वक्रतुण्डगायत्र्या 'तत्पुरुषाय विद्महे वक्रतुण्डाय
धीमहि। तन्नो दन्ती प्रचोदयात्' इत्यनया। 'गणानां त्वा' प्रसिद्धा ऋक्।
अभिमन्त्र्य अभिमन्त्रणं नाम मन्त्रपठनकाले संस्कार्य द्रव्यस्पर्शः। तद्विन्दुभिः
संस्कृतप्रथमबिन्दुभिः त्रिशः त्रिवारं शिरसि विधिबिले गुरुपादुकामारा-
धयेत् ।।६।।