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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 113, कुल 320 में से

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पृष्ठ 113

श्रीक्रमः ७१
३. मूलाभिमन्त्रित (मूल से तीन बार अभिमन्त्रित) पेय जल पीना चाहिये।
४. माँ श्रीललिताम्बा का (मूलमन्त्र पढ़ते हुए) 'शक्तिचक्रैकनायिकां श्रीललितां
तर्पयामि' इस मन्त्र से तीन बार तर्पण करना चाहिये।
५. मूल मन्त्र से ही तीन बार स्वात्म का संप्रोक्षण करना चाहिये। इससे शरीर
में दिव्यता का आधान हो जाता है।
६. इतनी प्रक्रिया पूरी कर वस्त्र का परिधान कर्म पूरा होता है। कपड़ा पहनने
से स्नान की प्रक्रिया पूरी हो जाती है।
७. इसके बाद सूर्य को तीन बार अर्घ्य देना चाहिये। अर्घ्य का मन्त्र सूत्र में
निर्दिष्ट है। वह इस प्रकार है—
'हां हीं हूं सः मार्तण्डभैरवाय प्रकाशसहिताय स्वाहा'। इस मन्त्र से अर्घ्य
देकर मार्तण्डभैरव रूप सूर्य का प्रणाम करना चाहिये। इस तरह स्नान की प्रक्रिया
पूरी कर उपासक अब नयी चेतना प्राप्त कर लेता है। एतदुपरान्त उपासना के
आगे के अंगों का विधान उसे पूरा करना चाहिये॥४॥
ततः श्रीचक्रभावनं, सवितृमण्डले देव्यै अर्घ्यदानं च विधीयते
तन्मण्डलमध्ये नवयोनिचक्रमनुचिन्त्य 'वाचमुच्चार्य त्रिपुर-
सुन्दरि विद्महे काममुच्चार्य पीठकामिनि धीमहि शक्तिमुच्चार्य तन्नः
क्लिन्ना प्रचोदयात्' इति त्रिमहेश्यै दत्तार्घ्यः शतमष्टोत्तरमामृश्य मनु-
मौनमालम्ब्य ।।५।।
तस्य सवितृमण्डलस्य मध्ये नवयोनयः चतस्रः पराङ्मुखा पञ्च
स्वाभिमुखा योनयो यस्मिन् तद् नवयोनिचक्रं श्रीचक्रमित्यर्थः। वाचं
प्रथमकूटम्। प्रथमकूटानन्तरं विद्महे इत्यन्तं पठेत्। ततः कामं मध्यकूटं
तदुच्चार्य 'पीठकामिनि धीमहि' इति पठेत्। शक्तिं शक्तिकूटं तृतीयमुच्चार्य
पठित्वा ततः प्रचोदयादित्यन्तं पठेत्। इदं त्रिपुरागायत्रीत्यप्युच्यते। आमृश्य
जपित्वा। शेषं स्पष्टम्।।५।।
सूर्य-मण्डल जो देखने में वर्तुलाकार प्रतीत होता है, उसके मध्य अर्थात्
केन्द्र भाग में श्रीचक्र का ध्यान करना चाहिये। श्रीचक्र को ही नवयोनिचक्र,