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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 105, कुल 320 में से

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पृष्ठ 105

महागणपतिक्रमः ६३
साष्टाङ्ग प्रणति ये षोडशोपचार में गृहीत हैं। इस प्रक्रिया में होम का ग्रहण नहीं
किया गया है। इसके बाद तीन बार मन्त्रपाठ करने का विधान है। मन्त्र का
निर्देश सूत्रकार ने किया है 'प्रणव, मायाबीज 'ह्रीं' सर्वविघ्नकृद्भ्यः सर्वभूतेभ्यो
हुं स्वाहा' यह मन्त्रोद्धार का स्वरूप है। इस मन्त्र को तीन बार पढ़कर बलि
देनी चाहिये। बलि-प्रक्रिया पूरी कर लेने के अनन्तर गणपति की भावना से
भावित कर बटुक और सिद्धलक्ष्मी की भावना से भावित की गयी एक
शक्तिरूपिणी कुमारी को वहाँ बिठा कर गन्ध, पुष्प और अक्षत आदि से संक्षिप्त
पूजा करनी चाहिये। आवाहन, देवबुद्धि से भावन और तत्पश्चात् पूजन का क्रम
ही वास्तविक क्रम होता है। वहाँ जो दानीय पदार्थ सुरक्षित है, उसमें पहला,
दूसरा, तीसरा पदार्थ बटुक और शक्ति के उद्देश्य से दान कर देना चाहिये।
उनसे यह प्रार्थना आवश्यक होती है— 'हे शक्ति और शक्तिमन्त के
प्रतीक बटुक और शक्ति! मेरी निर्विघ्न मन्त्रसिद्धि सम्पन्न हो'। इस प्रार्थना के
आधार पर अनुग्रह का अमृतोद्वलन होने लगता है। इस तरह उनको अपनी
ओर आकर्षित कर उन्हें सन्तुष्ट और तृप्त कर और नमस्कार कर महागणपति
के गुरुप्रदत्त मन्त्र का यथाशक्ति जप करना चाहिये।
गणपत्युद्वासनम्
यद्यदग्निकार्यसम्पत्तिर्बलेः पूर्वं विधिवत् संस्कृतेऽग्नौ स्वाहान्तैः
श्रीश्रीपत्यादिविघ्नकर्त्तृपर्यन्तैर्मन्त्रैर्हुत्वा पुनरागत्य देवं त्रिवारं सन्तर्प्य
योग्यैस्सह मपञ्चकमुररीकृत्य महागणपतिमात्मन्युद्वास्य सिद्धसङ्कल्पः
सुखी विहरेद् इति शिवम् ॥१०॥
यदीत्यनेन होमस्य कृताकृतत्वं सूचितम्। बलेः पूर्वमित्यनेन क्रमशेषः
सूचितः। विधिवत्। श्रीश्रीपतिमिथुनमेका देवता श्रीश्रीपतिभ्यां स्वाहेति मन्त्र-
स्वरूपम्। विघ्नकर्त्तृपर्यन्तैरिति अग्रिममिथुननिवर्त्तकम्। हुत्वा इत्यत्र द्रव्या-
काङ्क्षायाम् 'अनादिष्ट आज्यं भवति' इति परिभाषया आज्यमेव।
कामनाविशेषे तु द्रव्यविशेषो मोदकादिः। पुनरागत्य इत्यनेन पूजाप्रदेशादन्यो
होमप्रदेशः। योग्यैः सम्प्रदायाभिज्ञैः सह। मपञ्चकमुररीकृत्य स्वीकृत्य।
उद्वासनमुद्रया उद्वास्य। सिद्धसङ्कल्पः सिद्धकार्यः। सुखी विहरेद् इति