परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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६० घड़ियों का एक दिन माना जाता है। इसमें ३० भाग करने पर
जो अट्ठाइसवाँ भाग आता है, उसे ब्राह्म मुहूर्त कहते हैं। देवीभागवत में यह
स्पष्ट उल्लेख है कि, सूर्योदय से सूर्योदय तक के ६० घटी के काल को तीस
भागों में बाँटने पर अट्ठाइसवाँ मुहूर्त महत्त्वपूर्ण होता है। उसे 'ब्राह्म' नाम से
जानते हैं। वही ब्राह्म मुहूर्त है। इसमें उठकर सुबुद्ध पुरुष आत्मकल्याण अर्थात्
निःश्रेयस् का चिन्तन करे।
उस अतिविशिष्ट मुहूर्त में नींद से जागकर बिस्तर छोड़ दें। बाह्यान्तर
शुद्धि कर समस्त जन्मजन्मान्तरीय दुरितों के क्षय के लिये तत्परतापूर्वक लग
जाना चाहिये। एतदर्थ सर्वप्रथम 'शिव ही मेरे गुरुदेव हैं। उनके अतिरिक्त नहीं'
इस आन्तर चिन्तन में रत होना चाहिये। उसे ही अभिमर्श कहते हैं। विमर्श
का ही यह पहला परामर्श है। ध्यान की यह एक मानस-प्रक्रिया है। श्रद्धा का
यहाँ से उद्रेक होने लगता है॥२॥
मूलादिविधिपर्यन्तं तडित्कोटिकडारं तरुण-दिवाकरपिञ्जरं
ज्वलन्तीं मूलसंविदं ध्यात्वा तद्रश्मिनिहतकश्मलजालः कादिं हादिं
वा मूलविद्यां मनसा दशवारमावर्त्य ।।३।।
मूलाधारचक्रं तदादि तदारभ्य विधिबलिपर्यन्तम्। एतस्य ज्वलन्ती-
मित्यनेनान्वयः। तडित्कोटयो विद्युत्कोटयस्तद्वत् कडारं कपिशां, तरुण-
दिवाकरो नभोमध्यवर्ती सूर्यस्तद्वत् पिञ्जरामत एव ज्वलन्तीं मूलसंविदं
निर्विषयचितं ध्यात्वा तद्रश्मिभिर्निहतानि परिहृतानि कश्मलानां जालानि
समूहा येन ईदृशः सन् कादिं कामोपास्तीहादिं लोपामुद्रोपासितां वा विद्यां
पञ्चदशीं मनसा क्रमविशिष्टान् वर्णान् ध्यात्वा।।३।।
मूलाधार चक्र से ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्त संविद् तत्त्वरूपा मूल निर्विकल्पिका
चितिशक्ति जीवन के वरदान रूप से शरीर में शाश्वत व्याप्त है। उसकी भूरे
रंग से भाव्यमान आभा करोड़ों की संख्या में एक साथ कौंधने वाली बिजलियों
की कपिशवर्णी शोभा के समान प्रकाशमान रहती है। आकाशमध्यवर्त्ती ज्येष्ठ
के तपते आदित्य की दीप्ति के समान पिञ्जरवर्णी संवित्ति देवी अपनी दिव्यता
से शाश्वत उद्दीप्त रहती है। उसका ध्यान श्रीविद्या का उपासक ब्राह्म मुहूर्त में