परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८ परशुरामकल्पसूत्रम्
शक्तिचक्रैकनायिका शब्द श्लिष्ट अर्थों का उत्स है। इसके कुछ अर्थ इस
प्रकार किये गये हैं—
१. वह उक्त चक्रों की एकमात्र मुख्य नायिका अर्थात् सर्वनियामिका नियन्त्री
शक्ति है।
२. शक्ति-चक्र अर्थात् सधवा स्त्रियों का समूह। उनके मध्य एका अर्थात्
अद्वितीया जयन्त्रियन्त्री माँ श्रीललिताम्बा।
३. सर्वस्वरूपा सर्वेश्वरी सर्वशक्ति-समन्विता सर्वकार्य-निर्वाहिका शक्तियों की
एकमात्र प्रेरयित्री माँ जगदीश्वरी ललिता।
४. श्यामा, वार्ताली आदि अङ्गभूत शक्तियों के चक्र रूप परिवार की एकमात्र
संचालिका।
इन अर्थों में माँ ललिताम्बा श्रीविद्या की प्रधानता का ही द्योतन हो रहा
है। इससे एक और. संकेत मिलता है कि, जब किसी प्रसङ्ग में देवता का नाम
लिया जाय, तो उसके वैशिष्ट्य-बोधक आदरयुक्त विशेषणों के साथ ही लिया
जाय। जैसे सन्ध्या या जप के संकल्प में 'शक्तिचक्रैकनायिकायाः श्रीललिताम्बाया
आराधनमहं करिष्ये' इस प्रकार का योजन करना उचित है। इसी तरह इस क्रम
को आरम्भ करना चाहिये। यह वाक्य क्रमार्थक उपासना का ही अध्याहार करता
है। ललित शब्द का अर्थ शृङ्गारभाव रूप क्रियाविशेष माना जाता है। उसी
विशेषता से पूरित माँ श्रीललिताम्बा भी हैं॥१॥
ततो गुरुध्यानादीनुपदिशति सूत्रद्वयेन
ब्राह्मे मुहूर्त्ते ब्राह्मणे मुक्तस्वापः पापविलापाय परमशिवरूपं
गुरुमभिमृश्य ॥२॥
ब्राह्मो मुहूर्त्तः, दिवसः षष्टिघटिकात्मकं त्रिंशता विभज्य अष्टाविंशो
मुहूर्तः स ब्राह्मः। तदुक्तं देवीभागवते—
अष्टाविंशतितमो यश्च मुहूर्त्तो ब्रह्मनामकः।
तस्मिन्नुत्थाय मतिमाँश्चिन्तयेदात्मनो हितम् ।।
तस्मिन् ब्राह्मणे मुक्तस्वापो निद्रां त्यक्त्वा ईदृशकाल उत्थाय सर्वपाप-
क्षयाय शिव एव गुरुः, न ततोऽन्य इति अभिमृश्य मनसि ध्यात्वा ॥२॥