परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 106, कुल 320 में से
संदर्भ में पढ़ें६४ परशुरामकल्पसूत्रम्
प्रतिपादितकर्मणो न केवलं प्रत्यूहनाशः किन्तु इदमपि फलं दर्शितम्।
शिवमिति पूर्ववत् प्रकरणसमाप्तिद्योतकम्।
।। इति श्रीपरशुरामकल्पसूत्रे श्रीरामेश्वरनिर्मितायां सौभाग्योदयनाम्न्यां
परशुरामकल्पसूत्रवृत्तौ (मुख्यांशमात्रायां) गणनायकपद्धतिर्नाम
द्वितीयः खण्डः सम्पूर्णः ।।
यदि शब्द के प्रयोग से यह अर्थ सूचित हो रहा है कि, गणपतिक्रम
की प्रक्रियाओं के अन्त में हवन कार्य करते भी हैं और नहीं भी करते हैं।
कोई अनिवार्य नहीं है कि, हवन करना ही चाहिये। न करने में भी कोई दोष
नहीं है। यदि करने का निर्णय आचार्य ने ले ही लिया है, तो बलि कर्म के
पहले ही इसे सम्पादित करना उचित है। वह्निसंस्कार वैदिक द्वारा वैदिक मन्त्रों
से करना चाहिये अथवा श्यामादिक्रम में जो विधि लिखी गयी है, उसके ही
अनुसार पूरा करना चाहिये। श्री-श्रीपति से लेकर अविघ्नद्राविणी-विघ्नकर्तृ पर्यन्त
मिथुन रूप देवताओं के साथ स्वाहा शब्द प्रयोग के साथ मन्त्रोद्धार कर हवन
करना चाहिये। जैसे, 'श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीश्रीपतिभ्यां स्वाहा' इस मन्त्र से श्री-श्रीपति
मिथुन के लिये हवन करना चाहिये। इसी तरह १० मिथुनों का हवन आवश्यक
माना जाता है। यह ध्यान रखना चाहिये कि, यह हव्य की और चरु की आहुति
नहीं होती, वरन् मात्र आज्याहुति ही होती, शास्त्र में यह स्पष्ट उल्लेख है कि,
जहाँ हवनीय किसी द्रव्य का उल्लेख नहीं होता है वहाँ मात्र आज्य का ही
ग्रहण होता है, किसी काम्य कर्म में कामना विशेष में मोदक आदि द्रव्यों के
हवन भी किये जाते हैं।
उस स्थान पर जहाँ हवन होता है, वह पूजा प्रदेश से पृथक् रहना
चाहिये। यहाँ सूत्रोल्लिखित पुनरागत्य शब्द यही व्यक्त कर रहा है। पूजा देश
में आकर महागणपति का तीन बार सन्तर्पण करना चाहिये। देवतर्पण के अनन्तर
योग्य कुलाचार विशेषज्ञ उपासकों के साथ मपञ्चक अर्थात् पञ्चमकार का सेवन
किया जाना चाहिये। पञ्चमकार का प्रयोग गुरु के निर्देश में होना चाहिये।
स्वच्छन्द आचार कुलाचार नहीं होता। इसीलिये श्री भार्गव महोपाध्याय परशुराम
को कुलाचार्य भी कहा गया है।
तदनन्तर महागणपति का उद्वासन करना चाहिये। उद्वासन शब्द लोक में
जिस अर्थ में प्रयुक्त होता है, उसके विपरीत यहाँ स्वात्मसात् करने अर्थ में