परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० परशुरामकल्पसूत्रम्
उल्लेख कर दिया गया है। उन्हीं मन्त्रों से इनकी पूजा पूरी करने के उपरान्त
मूल का उच्चारण कर 'मैं महागणपति का आवाहन कर रहा हूँ। इस प्रकार
श्रीमहागणपति का आवाहन करने के उपरान्त गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और
नैवेद्य से 'लं' पृथिव्यात्मकं गन्धं समर्पयामि, 'हं' आकाशात्मकं पुष्पं समर्पयामि,
'यं' वाय्वात्मकं धूपमाघ्रापयामि और 'वं' अमृतात्मने अमृतातकं नैवेद्यं
निवेदयामि इन मन्त्रों से पञ्चोपचार पूजन का विधान है। इसके बाद मूल से
दश बार सन्तर्पण करना चाहिये। तर्पण का साधक द्रव्य विशेषार्घ्यपात्र में
अवस्थित रहना चाहिये। तर्पण के लिये श्यामाक्रम में निर्दिष्ट विधि का
अनुसरण करना चाहिये। पञ्चावरण पूजा का क्रम तर्पण के बाद ही आता है।
दो आवरण तो मिथुनाङ्गभूत तर्पण मात्र हैं। तीसरा आवरण अङ्गदेवताओं के
लिये सुरक्षित माना जाता है। चौथे आवरण में ब्राह्मी आदि देवियों की पूजा
होती है और पञ्चम आवरण इन्द्र आदि देवों की पूजा के लिये निर्धारित है।
इस प्रकार पञ्चावरण पूजा पूरी होती है॥७॥
तत्र प्रधानदेवतातर्पणदेशं सविस्तरं प्रपञ्चयति
त्रिकोणे देवः, तस्य षडस्रस्यान्तराले श्रीश्रीपत्यादि-चतुर्मिथुनानि
अङ्गानि च ऋद्ध्यामोदादि-षण्मिथुनानि षडस्रे मिथुनद्वयं षडस्रोभय-
पार्श्वयोस्तत्सन्धिष्वङ्गानि ब्राह्मयाद्या अष्टदले चतुरस्राष्टदिक्ष्विन्द्राद्याः
पूज्याः सर्वत्र देवतानामसु श्रीपूर्वपादुकामुच्चार्य पूजयामीत्यष्टाक्षरीं
योजयेत् ।।८।।
त्रिकोणे देवः, तर्प्य इति शेषः। तत् त्रिकोणं षडस्रं च तयोरन्तराले
अनुक्तत्वात् प्रागादिदिक्षु चतुरावृत्तितर्पणपाठक्रमानुरोधेन श्रीश्रीपतिप्रभृति-
मिथुनचतुष्टयं पूज्यम्। एतावत् प्रथमावरणम्। ऋद्ध्यामोदमिथुनमारभ्य
षण्मिथुनानि षडस्रकोणेषु। एतदुत्तरवृत्ति मिथुनद्वयं षडस्रपार्श्वद्वये इति
द्वितीयावरणम्। षट्कोणयन्त्रे रेखोपरि रेखा यत्र गच्छति स तत्सन्धिः। तत्र
ईदृशाः सन्धयः षट् सन्ति, तादृशसन्धिषु क्रमस्यानुक्तत्वाद् अग्नीशा-
सुरवायुकोणक्रमस्यासम्भवात् प्रागपवर्गता उत्तरापवर्गता यथा स्यात् तथा,
क्रममनादृत्य षडङ्गानि यजेत्। इति तृतीयावरणम्।