पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
४६ पाराशरस्मृतिः [ पञ्चमो-
शुना घ्राताऽवलीढस्य नखैर्विलिखितस्य च ।
अद्भिः प्रक्षालनाच्छुद्धिर्ग्निना चोपचूलनम् ॥ ६ ॥
जिस वस्तु को कुत्ते ने सूंघ अथवा चाट लिया हो अथवा अपने
नाखूनों से खसोट लिया हो, उस वस्तु की शुद्धि जल से धोकर आग में
तपा देने से हो जाती है ॥ ६ ॥
शुना तु ब्राह्मणी दष्टा जम्बुकेन वृकेण वा ।
उदितं १सोमनक्षत्रं दृष्ट्वा सद्यः शुचिर्भवेत् ॥ ७ ॥
जिस ब्राह्मणी को कुत्ते, गीदड़ अथवा भेड़िये ने काट लिया हो
वह उसी समय उदय होनेवाले चन्द्रमा सहित ताराओं को देखकर
शुद्ध हो जाती है ॥ ७ ॥
कृष्णपक्षे यदा सोमो न दृश्येत कदाचन ।
यां दिशं व्रजते सोमस्तां दिशं वाऽवलोकयेत् ॥ ८ ॥
यदि कदाचित् कृष्णपक्ष के होने से चन्द्रमा दिखाई न दें तो जिस
दिशा में चन्द्रमा जानेवाले हों उस दिशा को ही देख ले। चन्द्रमा की
दिशा गति इस प्रकार है—मेष२, सिंह और धनु राशि में पूर्व दिशा में,
वृष, कन्या, मकर राशि में दक्षिण दिशा में, मिथुन, तुला, कुम्भ में
पश्चिम दिशा में, कर्क, वृश्चिक तथा मीन में उत्तर दिशा में चन्द्रमा
रहते हैं ॥ ८ ॥
असद्ब्राह्मणके ग्रामे शुना दष्टो द्विजोत्तमः ।
वृषं प्रदक्षिणीकृत्य सद्यः स्नात्वा शुचिर्भवेत् ॥ ९ ॥
१. 'ग्रह-' इति ।
२. मेषे च सिंहे धन पूर्वभागे वृषे च कन्या मकरे तु याम्याम् ।
मिथुने तुले कुम्भसु पश्चिमायां कर्काऽलि-मीने दिशि चोत्तरस्याम् ॥
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ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ४७
यदि किसी ऐसे गाँव में ब्राह्मण को कुत्ते ने काट लिया हो, जिसमें
एक भी ब्राह्मण न हो तो वह बेल की प्रदक्षिणा कर स्नान कर लेवे ।
इतने से ही वह शुद्ध हो जाता है ॥ ९ ॥
चाण्डालेन श्वपाकेन गोभिर्विप्रैर्हतो यदि ।
अहिताग्निर्मृतो विप्रो विषेणात्महतो यदि ॥१०॥
यदि कोई अग्निहोत्री, चाण्डाल ( ब्राह्मणी में शूद्र से उत्पन्न ),
श्वपाक ( क्षत्राणी में शूद्र से उत्पन्न ), गौ अथवा ब्राह्मण के मारने से
मर गया हो अथवा स्वयं विष खाकर आत्महत्या कर ले, तो ॥१०॥
दहेत्तं ब्राह्मणं विप्रो लोकाग्नौ मन्त्रवर्जितम् ।
स्पृष्ट्वा वोढ्वा च दग्ध्वा च सपिण्डेषु च सर्वथा ॥११॥
उस अग्निहोत्री ब्राह्मण को उसका कोई सपिण्डी ब्राह्मण बिना
मन्त्र पढ़े ही लौकिक अग्नि में जला देवे और उसके स्पर्श, श्मशान तक
वहन तथा दाह करने के पाप के निमित्त, ॥११॥
प्राजापत्यं चरेत् पश्चाद् विप्राणामनुशासनात् ।
दग्ध्वाऽस्थीनि पुनर्गृह्य क्षीरैः प्रक्षालयेत् द्विजः ॥१२॥
ब्राह्मणों की आज्ञा लेकर प्राजापत्य व्रत करे । फिर वह ब्राह्मण
उसकी हड्डियों का पुनः दाह कर उसे दूध से धोवे ॥१२॥
स्वेनाग्निना स्वमन्त्रेण पृथगेतत् पुनर्दहेत् ।
आहिताग्निर्द्विजः कश्चित् प्रवसन् कालचोदितः ॥१३॥
पुनः उसे अलग किसी स्थान पर अग्निहोत्र की अग्नि से मन्त्रपूर्वक
जलावे ( पश्चात् उसकी क्रिया करे ) । यदि कोई अग्निहोत्री ब्राह्मण
दुर्देव से परदेश में जाकर, ॥१३॥
देहनाशमनुप्राप्तस्तस्याऽग्निर्वर्तते गृहे ।
प्रेताऽग्निहोत्र-संस्कारः१ श्रूयतामृषिपुङ्गवाः ॥१४॥
[Footnote]
१. 'श्रोताग्निहोत्रसंस्कारः इति पा० ।
४८ पाराशरस्मृतिः [ पञ्चमो-
मर जाय और उसकी अग्नि उसके घर में हो, तो हे ऋषियो !
उसके अग्निहोत्र संस्कार को आप लोग सुनें ॥१४॥
कृष्णाजिनं समास्तीर्य कुशैस्तु पुरुषाकृतिम् ।
षट्शतानि शतं चैव पलाशानां च वृन्ततः ॥१५॥
काले मृग का चर्म फैलाकर, उसपर कुशा से पुरुष की आकृति
बनावे । कुश न मिले तो ७०० पलाश के पत्तों को लेकर, ॥१५॥
चत्वारिंशच्छिरो दद्याच्छतं कण्ठे तु विन्यसेन् ।
बाहुभ्यां दशकं दद्यादङ्गुलीषु दशैव तु ॥१६॥
शिर में ४० पत्ते, गला में १०० पत्ते, बाहु में १० पत्ते, हाथ की
अँगुलियों में १० पत्ते, ॥१६॥
शतं तु जघने दद्यात् द्विशतं तूदरे तथा ।
दद्यादष्टौ वृषणयोः पञ्च मेढे तु विन्यसेत् ॥१७॥
जांघ में १०० पत्ते, उदर में २०० पत्ते, अण्डकोश में ८ पत्ते, लिङ्ग
में ५ पत्ते, ॥१७॥
एकविंशतिमूरुभ्यां द्विशतं जानु-जंघयोः ।
पादाङ्गुलीषु षड् दद्यात् यज्ञपात्रं ततो न्यसेत् ॥१८॥
ऊरु में २१ पत्ते, जानु तथा जंघा में २०० पत्ते तथा पैर की
अँगुलियों में ६ पत्ते देवे । तदनन्तर यज्ञपात्रों को रखे ॥१८॥
शम्यां शिश्ने विनिःक्षिप्यः अरणी मुष्कयोरपि ।
जुहूं च दक्षिणे हस्ते वामे तूपभृतं न्यसेत् ॥१९॥
१. 'पादाङ्गुष्ठेषु' इति ।
ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ४९
यज्ञ के पात्रों के रखने का प्रकार ऐसा है—शमी को लिंग पर,
अरणी को अण्डकोश पर, जुहू (स्रुवा) को दाहिने हाथ पर, उपभृत् को
बाँयें हाथ पर, ॥१९॥
कर्णे चोलूखलं दद्यात् पृष्ठे च मुशलं न्यसेत् ।
उरसि क्षिप्य दृषदं तण्डुलाऽऽज्य-तिलान् मुखे ॥२०॥
ऊलूखल को कान पर, मुसल को पीठ पर, दृषत् को छाती पर,
चावल, घी तथा तिल को मुख में देवे ॥२०॥
श्रोत्रे च प्रोक्षणीं दद्यादाज्यस्थालीं तु चक्षुषोः ।
कर्णे नेत्रे मुखे घ्राणे हिरण्यशकलं क्षिपेत्१ ॥२१॥
प्रोक्षणीपात्र कान पर, आज्यस्थाली आँखों पर तथा कान, आँख,
नाक एवं मुँह में सुवर्ण का टुकड़ा देवे ॥२१॥
अग्निहोत्रोपकरणमशेषं तत्र विन्यसेत् ।
‘असौ स्वर्गाय लोकाय स्वाहे’ त्येकाहुतिं सकृत् ॥२२॥
इस प्रकार उसके अग्निहोत्र का सारा उपकरण रखकर 'असौ
स्वर्गाय लोकाय स्वाहा' ऐसा कहकर एक आहुति देवे ॥२२॥
दद्यात् पुत्रोऽथवा भ्राताऽप्यन्यो वाऽपि च बान्धवः।
यथा दहनसंस्कारस्तथा कार्यं विचक्षणैः ॥२३॥
इस प्रकार उस अग्निहोत्री का पुत्र, भाई अथवा दूसरा कोई
सजातीय बान्धव आहुति देकर विज्ञ लोग विधानतः उसका दाह-
संस्कार करें ॥२३॥
ईदृशं तु विधिं कुर्याद् ब्रह्मलोके गतिर्ध्रुवम्२ ।
दहन्ति ये द्विजास्तं तु ते यान्ति परमां गतिम् ॥२४॥
१. 'न्यसेत्' इति । २. 'गतिः स्मृता' इति ।
५० पाराशरस्मृतिः [ षष्ठो-
उपर्युक्त प्रकार की विधि करने से उस अग्निहोत्री को निश्चय ही
ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है और जो ब्राह्मण इस प्रकार दाहसंस्कार
करते हैं वे भी उत्तम लोक को प्राप्त करते हैं ॥२४॥
अन्यथा कुर्वते कर्म त्वात्मबुद्ध्या प्रचोदिताः ।
भवन्त्यल्पायुषस्ते वै पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥२५॥
इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
जो लोग अपनी बुद्धि की कल्पना से अन्यथा ( विपरीत ) काम
करते हैं वे अल्पायु होकर अत्यन्त अपवित्र नरक में गिरते हैं ॥२५॥
इस प्रकार पण्डित शिवदत्तमिश्रशास्त्रिकृत 'शिवदत्ती' भाषाटीका में पाराशरीय
धर्मशास्त्र में पाँचवाँ अध्याय समाप्त ॥ ५ ॥
६. षष्ठोऽध्यायः
अतः परं प्रवक्ष्यामि प्राणहत्यासु निष्कृतिम् ।
पराशरेण पूर्वोक्तां मन्वर्थेऽपि च विस्तृताम् ॥ १ ॥
अशौच प्रकरण के अनन्तर अब मैं प्राणहत्या का प्रायश्चित्त कहता
हूँ, जिसे महर्षि पराशर ने पहले ही कहा है तथा मन्वादि स्मृतियों में
भी विस्तारपूर्वक वर्णित है ॥१॥
क्रौञ्च-सारस-हंसांश्च चक्रवाकं च कुक्कुटम् ।
जालपादं च शरभं हत्वाऽहोरात्रतः शुचिः ॥ २ ॥
क्रौंच, सारस, हंस, चक्रवाक, मुर्ग, बत्तक तथा शरभ इनमें से किसी
की हत्या करने से पुरुष एक दिन-रात का उपवास कर शुद्ध
होता है ॥२॥
ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ५१
बलाका-टिट्टिभौ वाऽपि शुक-पारावतावपि ।
अटीन-बकघाती च शुद्धयते नक्तभोजनात् ॥ ३ ॥
बलाका, टिट्टिभ, तोता, पारावत ( पनडुब्बी पक्षी ), अटीन तथा
बकुले को मारकर दिन में उपवास कर रात में भोजन करे तो शुद्धि
होती है ॥३॥
वृक-काक कपोतानां सारी तित्तिरघातकः ।
अन्तर्जले उभे सन्ध्ये प्राणायामेन शुद्धयति ॥ ४ ॥
वृक ( भेड़िया ) कौवा, कबूतर, मैना तथा तित्तिर को मारकर
जल के बीच सायंकाल एवं प्रातःकाल प्राणायाम करे तो शुद्धि
होती है ॥४॥
गृध्र श्येन शशादीनामुल्लूकस्य च घातकः ।
अपक्वाशी दिनं तिष्ठेत् त्रिकालं मारुताशनः ॥ ५ ॥
गिद्ध, वाज, खरगोश और उल्लू को मारने से पहले दिन बिना पका
हुआ तथा दूसरे दिन तीसरे पहर भोजन कर, तीसरे दिन उपवास
रहने से शुद्धि होती है ॥५॥
वल्गुली टिट्टिभानां च कोकिला खञ्जरीटके ।
लाविका रक्तपक्षेषु शुद्धयते नक्तभोजनात् ॥ ६ ॥
बल्गुली, टिट्टिभ, कोयल, खिरहिच, बटेर तथा जिनके पंख लाल
हों इस प्रकार के पक्षियों को मारकर दिन में उपवास करे, पश्चात्
रात्रि में भोजन करे तो शुद्धि होती है ॥६॥
कारण्डव चकोराणां पिङ्गला कुररस्य च ।
भारद्वाजादिकं हत्वा शिवं सम्पूज्य शुद्धयति ॥ ७ ॥
कारण्डव, चकोर, पिंगला, कुरर तथा भारद्वाज आदि पक्षियों को
मारे तो भगवान् शंकर की पूजा कर शुद्ध होता है ॥७॥
५२ पराशरस्मृतिः [ षष्ठो-
भेरुण्डं चाषं भासांश्च पारावत कपिञ्जलान्¹।
पक्षिणां चैव सर्वेषामहोरात्रमभोजनम् ॥ ८ ॥
भेरुण्ड, चाष ( नीलकण्ठ या गरुड़ ), भास, पारावत और कपिंजल
( पपीहा ) आदि पक्षियों को मारने से एक दिन-रात भोजन न करे
तो शुद्धि होती है ॥८॥
हत्वा मूषक-मार्जार-सर्पा-ऽजगर-डुण्डुभान् ।
कृसरं भोजयेद् विप्रान् लौहदण्डं च दक्षिणाम् ॥ ९ ॥
चूहा, बिल्ली, सांप, अजगर और डोंड़हा सर्प को मारे तो कृसरान्न
( खिचड़ी ) ब्राह्मणों को खिलाकर लोहे का डण्डा दक्षिणा में देवे तब
उसकी शुद्धि होती है ॥९॥
शिशुमारं तथा गोधां हत्वा कूर्मं च शल्यकम्² ।
वृन्ताकफलभक्षी ³चाऽप्यहोरात्रेण शुद्ध्यति ॥१०॥
शिशुमार ( सूइस ), गोधा ( गोह ), कछुआ तथा साही को
मारने से वृन्ताक का फल खाकर दिन-रात रहने से शुद्धि
होती है ॥१०॥
वृक जम्बुक ऋक्षाणां तरक्षूणां च घातने⁴ ।
तिलप्रस्थं द्विजे दद्याद् वायुभक्षो दिनत्रयम् ॥११॥
भेड़िया, सियार, भालू तथा तरक्षु ( गैंडा ) को मारे तो एक
प्रस्थ तिल ब्राह्मण को देवे और तीन उपवास करे तब शुद्धि
होती है ॥११॥
गजस्य च तुरङ्गस्य महिषोष्ट्रनिपातने ।
प्रायश्चित्तमहोरात्रं त्रिसन्ध्यमवगाहनम् ॥१२॥
१. 'कपिञ्जली' इति । २. 'शल्यकं' इति । ३. 'वा' इति । ४. 'घातकः' इति ।
ऽध्यायः ] · भाषाटीकासहिता ५३
हाथी, घोड़ा, भैंसा तथा ऊँट को मारने से एक दिन-रात उपवास
करे और तीनों काल (प्रातः, मध्याह्न, सायं) स्नान करे तो शुद्ध
होता है ॥१२॥
कुरङ्गं वानरं सिंहं चित्रं व्याघ्रं च घातयन् ।
शुद्धयते स त्रिरात्रेण विप्राणां तर्पणेन च ॥१३॥
हरिन, वानर, सिंह, चीता और बाघ को मारे तो तीन दिन
उपवास करे और ब्राह्मणों को भोजनादि से सन्तुष्ट करे तब शुद्धि
होती है ॥१३॥
मृग रोहिद् वराहाणामवेर्वस्तस्य घातकः ।
अफालकृष्टमश्नीयादहोरात्रमुपोष्य सः ॥१४॥
मृग, रोही, शूकर, भेड़ तथा बकरे को मारे तो एक दिन-रात
उपवास करे, दूसरे दिन बिना जोते हुए ही जो अन्न उत्पन्न हो उसे
खाये तब शुद्धि होती है ॥१४॥
एवं चतुष्पदानां च सर्वेषां वनचारिणाम् ।
अहोरात्रोषितस्तिष्ठेज्जपन् वै जातवेदसम्¹ ॥१५॥
इस प्रकार सम्पूर्ण जानवरों को अथवा जंगली चारपायों को मारे
तो एक दिन-रात उपवास करे और 'ॐ जातवेदसे सुनवाम'-मन्त्र का
जप करे, तो शुद्ध होता है ॥१५॥
शिल्पिनं कारुकं शूद्रं स्त्रियं वा यस्तु घातयेत् ।
प्राजापत्यद्वयं कृत्वा वृषैकादश दक्षिणा ॥१६॥
१. ॐ जातवेदसे सुनवाम सोममरातीयतो निदहाति वेदः ।
स नः पर्षदति दुर्गाणि विश्वा नावेव सिन्धुं दुरितात्यग्निः ॥—ऋ० १,१९,१
५४ पाराशरस्मृतिः [ षष्ठो-
शिल्पी ( चित्रकला करनेवाला ), काहक ( रसोइया ), शूद्र और
स्त्री को जो मारे वह दो प्राजापत्य व्रत करे तथा वृष के सहित ग्यारह
गौ दक्षिणा में देवे तब शुद्ध होता है ॥१६॥
वैश्यं वा क्षत्रियं वापि निर्दोषं योऽभिघातयेत् ।
१सोऽतिकृच्छ्रद्वयं कुर्याद् गोविंशद् दक्षिणां ददेत् ॥१७॥
जो निर्दोष क्षत्रिय अथवा वैश्य को मारे, वह दो अतिकृच्छ्र व्रत
करे और बीस गायों का दान करे तब शुद्ध होता है ॥१७॥
वैश्यं शूद्रं क्रियाऽऽसक्तं विकर्मस्थं द्विजोत्तमम् ।
हत्वा चान्द्रायणं २कुर्याद् दद्याद् गोत्रिंश दक्षिणाम् ॥१८॥
स्वक्रिया में निरत वैश्य अथवा शूद्र को किंवा स्वकर्म परिभ्रष्ट
ब्राह्मण को यदि कोई मारे, तो चान्द्रायण व्रत कर तीस गौ का दान
करने से वह शुद्ध होता है ॥१८॥
चाण्डालं हतवान् कश्चिद् ब्राह्मणो यदि कश्चन ॥
प्राजापत्यं चरेत् कृच्छ्रं गोद्वयं दक्षिणां ददेत् ॥१९॥
यदि किसी ब्राह्मण ने चाण्डाल का वध कर दिया हो तो वह
प्राजापत्य कृच्छ्र करे और दो गौ को दक्षिणा में देवे ॥१९॥
क्षत्रियेणाऽपि वैश्येन शूद्रेणैवेतरेण वा ।
चाण्डालस्य वधे प्राप्ते कृच्छ्रार्द्धेन विशुद्ध्यति ॥२०॥
यदि क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र अथवा किसी अन्य ने चाण्डाल का वध कर
दिया हो तो आधा कृच्छ्र व्रत से उसकी शुद्धि होती है ॥२०॥
३चौराः ४श्वपाकचाण्डाला विप्रेणाभिहता ५ यदि ।
अहोरात्रोषितः स्नात्वा पञ्चगव्येन शुद्ध्यति ॥२१॥
१. 'सोऽपि' इति । २. 'तस्य त्रिंशद् गाश्चैव दक्षिणा' इति क्वचित्पुस्तके ।
३. 'चोरः' इति । ४. 'पूर्वपाकश्चाण्डालो' इति । ५. 'विप्रेणाभिहतो' इति ।
ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ५५
यदि ब्राह्मण ने चोर, श्वपाक अथवा चाण्डाल का वध कर दिया हो
तो वह दिन-रात उपवास कर पंचगव्य का प्राशन करे, तब उसकी
शुद्धि होती है ॥२१॥
श्वपाकं १वाऽपि चाण्डालं विप्रः सम्भाषते यदि ।
द्विजसम्भाषणं कुर्यात् सावित्रीं च सकृज्जपेत् ॥२२॥
यदि ब्राह्मण श्वपाक अथवा चाण्डाल से संभाषण करे, तो वह अन्य
ब्राह्मण से संभाषण कर एक बार गायत्री का जप करे तब उसकी
शुद्धि होती है ॥२२॥
चाण्डालैः सह सुप्ते तु त्रिरात्रमुपवासयेत् ।
चाण्डालैकपथं गत्वा गायत्रीस्मरणाच्छुचिः ॥२३॥
चाण्डाल के साथ सोनेवाला तीन राततक उपवास करे और
उसके साथ रास्ता चलनेवाला गायत्री का स्मरण करे तब उसकी
शुद्धि होती है ॥२३॥
चाण्डालदर्शने सद्य आदित्यमवलोकयेत् ।
चाण्डालस्पर्शने चैव सचैलं स्नानमाचरेत् ॥२४॥
यदि चाण्डाल को देख ले तो सूर्य-दर्शन से शुद्ध हो जाता है, और
यदि चाण्डाल का स्पर्श हो ( छू ) जाय तो वस्त्र-सहित स्नान करे तब
वह शुद्ध होता है ॥२४॥
चाण्डाल खात वापीषु पीत्वा सलिलमग्रजः ।
अज्ञानाच्चैकभक्तेन त्वहोरात्रेण शुद्ध्यति ॥२५॥
यदि कोई ब्राह्मण अज्ञान से चाण्डाल के द्वारा निर्माण कराये गये
वापी, कूप अथवा तालाब आदि का जल पी ले, या स्नान कर ले तो
१. 'चाऽपि' ।
५६ पाराशरस्मृतिः [ षष्ठो-
एक भक्त करे, फिर दिन-रात उपवास करे, तब उसकी शुद्धि
होती है ॥२५॥
चाण्डालभाण्डसंस्पृष्टं पीत्वा कूपगतं जलम् ।
गोमूत्र यावकाहार स्त्रिरात्राच्छुद्धिमाप्नुयात् । २६॥
जिस कूप में चाण्डाल ने अपना जलपात्र डाल रखा हो, उस कुएँ
का जल पी ले, तो तीन दिनों तक गोमूत्र में जव पकाकर खावे तब
शुद्धि होती है ॥२६॥
चाण्डालघटसंस्थं तु यत्तोयं पिवति द्विजः ।
तत्क्षणात् क्षिपते यस्तु प्राजापत्यं समाचरेत् ॥२७॥
यदि कोई ब्राह्मण चाण्डाल के घड़े का जल पी ले और ज्ञात होने
पर उसी क्षण वमन कर दे, तो उसे शुद्धि के लिए प्राजापत्य व्रत करना
चाहिए ॥२७॥
यदि न क्षिपते तोयं शरीरे यस्य जीर्यति ।
प्राजापत्यं तदावश्यं कृच्छ्रं सान्तपनं चरेत् ॥२८॥
जो चाण्डाल के घड़े का जल पीकर ज्ञात होने पर भी वमन न
करे और वह जल उसके शरीर में पच गया हो तो उसे शुद्धि के लिए
कृच्छ्र सान्तपन व्रत करना चाहिए ॥२८॥
चरेत् सान्तपनं विप्रः प्राजापत्यमनन्तरः ।
तदर्द्धं तु चरेद् वैश्यः पादं शूद्रस्य दापयेत् ॥२९॥
ब्राह्मण कृच्छ्र सान्तपन करे, क्षत्रिय चाण्डाल का जल पचाकर
प्राजापत्य करे । वैश्य चाण्डाल का जल पचाकर अर्द्धप्राजापत्य तथा शूद्र
प्राजापत्य का चतुर्थांश व्रत करे ॥२९॥
भाण्डस्थमन्त्यजानां तु जलं दधि पयः पिवेत् ।
ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रश्चैव प्रमादतः ॥३०॥
ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ५७
यदि प्रमाद-वश ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र-इन चार वर्णों में से
कोई भी चाण्डाल के बरतन में रखे गये जल, दधि अथवा दूध को
पी ले, तो ॥३०॥
ब्रह्मकूर्चोपवासेन द्विजातीनां तु निष्कृतिः ।
शूद्रस्य चोपवासेन तथा दानेन शक्तितः ॥३१॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की शुद्धि ब्रह्मकूर्च तथा उपवास से होती
है । शूद्र उपवास तथा यथाशक्ति दान से शुद्ध हो जाता है ॥३१॥
भुङ्क्ते ऽज्ञानाद् द्विजश्रेष्ठश्चाण्डालान्नं कथञ्चन ।
गोमूत्रं यावकाहाराद् दशरात्रेण शुद्ध्यति ॥३२॥
यदि ब्राह्मण अनजान में किसी भाँति चाण्डाल का अन्न खा ले तो
गोमूत्र में पकाये हुए ( यावक ) को दश रात तक खाने से शुद्ध
होता है । ३२॥
एकैकं ग्रासमश्नीयाद् ³गोमूत्रयावकस्य च ।
दशाहं नियमस्तस्य व्रतं ⁴तत्र विनिर्दिशेत् ॥३३॥
दश रात तक गोमूत्र में पके हुए यावक को दश दिन तक एक-एक
ग्रास प्रतिदिन खाये तथा उतने ही दिन नियम से रहे तो अनजान में
खाये हुए चाण्डाल के अन्न से शुद्धि होती है ॥३३॥
१. ब्रह्मकूर्चम्—
अहोरात्रोषितो भूत्वा पौर्णमास्यां विशेषतः ।
पञ्चगव्यं पिवेत् प्रातः 'ब्रह्मकूर्चम्' इति स्मृतम् ॥
अन्यत्राऽपि—
पञ्चगव्येन देवेशं यः स्नापयति भक्तितः ।
ब्रह्मकूर्चाभिधानेन विष्णुलोके महीयते ॥ इति ।
२ '-यावकाहारो' इति । ३. 'गोमूत्रे' इति । ४. 'तत्तु' इति ।
५८ पाराशरस्मृतिः [ षष्ठो-
अविज्ञातस्तु चाण्डालो यत्र वेश्मनि तिष्ठति ।
विज्ञाते तूपसंन्यस्य द्विजाः कुर्युItemरनुग्रहम् ॥३४॥
जिसके घर में बिना जाने चाण्डाल निवास करे। फिर ज्ञात हो
जाने पर उसे अपने घर से बाहर निकाल देवे और ब्राह्मण का अनुग्रह
प्राप्त कर, प्रायश्चित्त करे ॥३४॥
मुनिवक्त्रोद्गतान् धर्मान् गायन्तो वेदपारगाः ।
पतन्तमुद्धरेयुस्ते धर्मज्ञाः पापसङ्कटात् ॥३५॥
वेद-पारंगत धर्मज्ञ ब्राह्मण उस पतित हुए पुरुष का पराशरादि
धर्मज्ञ महर्षियों के द्वारा उपदिष्ट प्रायश्चित्त बताकर धर्मसंकट से
उद्धार करें ॥३५॥
दध्ना च सर्पिषा चैव क्षीरे गोमूत्र यावकम् ।
भुञ्जीत सह भृत्यैश्च* त्रिसन्ध्यमवगाहनम् ॥३६॥
महर्षियों के द्वारा उपदिष्ट प्रायश्चित्त जिसे उस पतित को करना
चाहिए, इस प्रकार है : पतित पुरुष-जिसके घर में अनजाने चाण्डाल
ने निवास किया हो-गोमूत्र में पके हुए यावक को दही, घी तथा
दूध से भृत्यों के साथ भोजन करे और तीनों काल स्नान भी
करे ॥३६॥
त्र्यहं भुञ्जीत दध्ना च त्र्यहं भुञ्जीत सर्पिषा ।
त्र्यहं क्षीरेण भुञ्जीत एकैकेन दिनत्रयम् ॥३७॥
उपर्युक्त गोमूत्र में पके हुए यावक को खाने की विधि इस प्रकार
है-तीन दिन तक ( यावक को ) दही से, तीन दिन तक घृत से
तथा तीन दिन तक दूध से । इस प्रकार एक-एक से तीन दिन भोजन
करे ॥३७॥
- 'सर्वैश्च' इति ।
ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ५९
भावदुष्टं न भुञ्जीत नोच्छिष्टं कृमिदूषितम्।
दधि क्षीरस्य त्रिपलं पलमेकं घृतस्य तु॥३८॥
यदि यावक, अपवित्र (भावदुष्ट), उच्छिष्ट अथवा कृमि से दूषित
हो, तो उसे न खावे। तीन दिनों तक यावक से खाये जानेवाले दही
तथा दूध का परिमाण प्रतिदिन तीन पल (बारह तोले) तथा घी का
परिमाण एक पल (चार तोले) होना चाहिए ॥३८॥
भस्मना तु भवेच्छुद्धिुरुभयोः ताम्र कांस्ययोः।
जलशौचेन वस्त्राणां परित्यागेन मृण्मयम् ॥३९॥
काँसे एवं ताँबे के पात्रों की शुद्धि भस्म (राख) से, वस्त्रों की
शुद्धि जल के द्वारा तथा मिट्टी के पात्रों की शुद्धि उसे त्यागकर करनी
चाहिए ॥३९॥
कुसुम्भं गुड कार्पास लवणं तैल मर्पिषी।
द्वारे कृत्वा तु धान्यानि दद्याद् वेश्मनि पावकम् ॥४०॥
कुसुम्भ, गुड़, कपास, नमक, तेल तथा घी और अन्न को घर से
बाहर द्वार पर निकालकर उस घर में आग लगा देनी चाहिए जिसमें
चाण्डाल ने निवास किया हो ॥४०॥
एवं शुद्धस्ततः पश्चात् कुर्याद् ब्राह्मणतर्पणम्।
१विंशति गा वृषं चैकं दद्याद् विप्रेषु दक्षिणाम् ॥४१॥
इस प्रकार घर की शुद्धि तथा अपनी शुद्धि कर उस पुरुष को
ब्राह्मण-भोजन कराने के उपरान्त बीस गौ तथा एक बैल का दान
करना चाहिए, जिसके घर में चाण्डाल ने निवास किया हो ॥४१॥
१. 'त्रिंशतं' इत्यपि पाठः।
प्रथम उस घर की भूमि को लीपने, खनने, होम तथा जपादि से
६० पाराशरस्मृतिः [षष्ठो-
पुनर्लेपन खातेन होम जंप्येन शुद्धयति ।
आधारेण च विप्राणां भूमिदोषो न विद्यते ॥४२॥
प्रथम उस घर की भूमि को लीपने, खनने, होम तथा जपादि से
शुद्ध करना चाहिए। फिर ब्राह्मणों को बिठाकर भोजन कराना
चाहिए। क्योंकि ब्राह्मणों के बैठने से ही भूमि का दोष नष्ट हो
जाता है ॥४२॥
चाण्डालैः सह सम्पर्कं मासं मासार्द्धमेव वा ।
गोमूत्रयावकाहारो मासार्द्धेन विशुद्धयति ॥४३॥
यदि चाण्डालों का साथ एक महीने अथवा एक पाख तक रहा हो
तो १५ दिन तक गोमूत्र में पके हुए जव के खाने से उस पुरुष की शुद्धि
होती है ॥४३॥
रजकी कर्मकारी च लुब्धकी वेणुजीविनी ।
चातुर्वर्ण्यस्य च गृहे त्वविज्ञाता तु तिष्ठति ॥४४॥
धोबिन, चमाइन, बहेलिन ( बहेलिये की स्त्री ) अथवा बाँस से
जीविका करनेवाली (घरकारिन) यदि चारों वर्गों के घर में अनजान
में निवास कर ले, तो ॥४४॥
ज्ञात्वा तु निष्कृतिं कुर्यात् पूर्वोक्तस्यार्द्धमेव हि ।
गृहदाहं न कुर्वीत शेषं सर्वं च कारयेत् ॥४५॥
पता लगने पर चारों वर्गों को उसका प्रायश्चित्त करना चाहिए।
केवल घर में आग न लगावे, शेष जैसा चाण्डाल के निवास का प्रायश्चित्त
कहा है वह सभी प्रायश्चित्त करना चाहिए ॥४५॥
१. 'जाप्येन' इति । २. 'अनुतिष्ठति' इति ।
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ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ६१
गृहस्याभ्यन्तरं गच्छेच्चाण्डालो यदि कस्यचित् ।
तमागाराद् विनिर्वास्य¹ मृद्भाण्डं तु विसर्जयेत् ॥४६॥
यदि किसी के घर में चाण्डाल चला जाय तो उस चाण्डाल को
घर से बाहर निकालकर घर के मिट्टी के बर्तनों को फेंक देना
चाहिए ॥४६॥
रसपूर्णं तु मृद्भाण्डं न त्यजेत्तु कदाचन ।
गोमयेन तु सम्मिश्रैर्जलैः प्रोक्षेद् गृहं तथा ॥४७॥
जिन मिट्टी के बर्तनों में रस, तेल, घी आदि भरा हो उसका त्याग
नहीं करना चाहिए, गोबर से घर को लीप देना चाहिए ॥४७॥
ब्राह्मणस्य व्रणद्वारे पूय-शोणितसम्भवे ।
कृमिरुत्पद्यते यस्य प्रायश्चित्तं कथं भवेत् ? ॥४८॥
यदि ब्राह्मण को व्रण (फोड़ा-घाव) होकर उसमें से खून अथवा पीब
बहने लगे अथवा यदि उसमें कीड़े पड़ गये हों तो उसका प्रायश्चित्त
किस प्रकार करना चाहिए ? ॥४८॥
गवां मूत्र पुरीषेण ²दध्ना क्षीरेण सर्पिषा ।
त्र्यहं स्नात्वा च पीत्वा च कृमिदुष्टः शुचिर्भवेत् ॥४९॥
उस पुरुष को जिसके व्रण में कृमि पड़ गयी हों, तीन दिन तक
पञ्चगव्य से स्नान करना चाहिए तथा पञ्चगव्य ही खाना चाहिए तो
कृमिदोष से शुद्ध हो जाता है ॥४९॥
क्षत्रियोऽपि सुवर्णस्य पञ्च माषान् ³प्रदाय तु ।
गोदक्षिणां तु वैश्यस्याऽप्युपवासं विनिर्दिशेत् ॥५०॥
१. ‘विनिःसार्य’ इति । २. ‘दधि-क्षीरेण’ इति । ३. ‘प्रदापयेत्’ इति ।
Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
६२ पाराशरस्मृतिः [ षष्ठो-
यदि किसी क्षत्रिय के व्रण में कृमि पड़ गयी हों तो उसे पांच मासे
सोने का दान करना चाहिए। यदि वैश्य हो तो उसे एक दिन उपवास
कर गो-दान करना चाहिए। इस प्रकार करने से क्षत्रिय तथा वैश्य की
शुद्धि होती है ॥५०॥
शूद्राणां नोपवासः स्यात् शूद्रो दानेन शुद्ध्यति ।
अच्छिद्रमिति यद्-वाक्यं वदन्ति क्षितिदेवताः ॥५१॥
यदि शूद्र के व्रण में कृमि पड़ गयी हों तो उसे उपवास करने की
आवश्यकता नहीं है । वह केवल दान मात्र से ही शुद्ध हो जाता है ।
ब्राह्मण दान के अनन्तर यदि 'अच्छिद्रमस्तु' कह दें, तो ॥५१॥
प्रणम्य शिरसा ग्राह्यमग्निष्टोमफलं हि तत् ।
जपच्छिद्रं तपश्छिद्रं यच्छिद्रं यज्ञकर्मणि ॥५२॥
उन्हें प्रणाम कर, उनके दिये हुए अक्षत को माथे पर चढ़ाने से
अग्निष्टोम के तुल्य फल होता है। जप, तप तथा यज्ञादि में कोई छिद्र
(दोष-त्रुटि) हो जाय तो ॥५२॥
सर्वं भवति निश्चिद्रं ब्राह्मणैरुपपादितम् ।
व्याधि-व्यसनि-निश्रान्ते दुर्भिक्षे डामरे तथा ॥५३॥
ब्राह्मणों के द्वारा कहे गये 'अच्छिद्रमस्तु' इस वाक्य मात्र से ही
यजमान के समस्त जप, तप तथा यज्ञादि कर्म पूर्ण हो जाते हैं।
व्याधि में, व्यसन में, थकी हुई अवस्था में, दुर्भिक्ष तथा राज-विप्लव
होने पर, ॥५३॥
उपवासो व्रतं होमो द्विजसम्पादितानि वै ।
अथवा ब्राह्मणास्तुष्टाः सर्वे कुर्वन्त्यनुग्रहम् ॥५४॥
ब्राह्मणों के द्वारा जप, होम तथा व्रत करावे, यदि इस प्रकार
ब्राह्मण सन्तुष्ट होकर अनुग्रह करें तो ॥५४॥
सर्वान् कामानवाप्नोति द्विजसम्पादितैरिह ।
ऽध्यायः भाषाटीकासहिता ६३
सर्वान् कामानवाप्नोति द्विजसम्पादितैरिह ।
दुर्बलेऽनुग्रहः प्रोक्तस्तथा वै बाल-वृद्धयोः ॥५५॥
इस प्रकार ब्राह्मण द्वारा व्रतादि से पुरुष की समस्त अभिलाषा
पूर्ण हो जाती है। ब्राह्मणों को भी दुर्बल, बालक तथा वृद्ध पर विशेष
रूप से अनुग्रह रखना चाहिए ॥५५॥
अतोऽन्यथा भवेद् दोषस्तस्मान्नानुग्रहः स्मृतः ।
स्नेहाद् वा यदि वालोभाद् भयादज्ञानतोऽपि वा ॥५६॥
इसके अतिरिक्त यदि बिना कारण ही ब्राह्मण अनुग्रह करे तो
दोष होता है, क्योंकि किसी पर स्नेह, लोभ, भय तथा अज्ञान से किया
गया अनुग्रह ॥५६॥
कुर्वन्त्यनुग्रहं ये तु तत्पापं तेषु गच्छति ।
शरीरस्याऽत्यये प्राप्ते वदन्ति नियमं तु ये ॥५७॥
ब्राह्मणों के लिए ही पाप का कारण बन जाता है। इसलिए दुर्बल
बालक तथा वृद्ध के अतिरिक्त किसी पर भी स्नेहादिवश ब्राह्मण
अनुग्रह न करे। शरीर के नाश होने की अवस्था में जो उसे नियम
तथा व्रत का उपदेश करता है ॥५७॥
महत्कार्योपरोधेन न स्वस्थस्य कदाचन ।
स्वस्थस्य मूढाः कुर्वन्ति वदन्ति नियमं चं^१ ये ॥५८॥
अथवा किसी बड़े कार्य में लगे या स्वस्थ व्यक्ति को उपदेश नहीं
देते एवं वे मन्दबुद्धि उपदेशक स्वस्थों के लिए नियम का उपदेश नहीं
करते ॥५८॥
ते तस्य विघ्नकर्तारः पतन्ति नरकेऽशुचौ ।
स्वयमेव व्रतं कृत्वा ब्राह्मणं योऽवमन्यते ॥५९॥
१. 'तु' इति ।
६४ पाराशरस्मृतिः षष्ठो-
इस प्रकार उपदेश करनेवाले लोग उस पुरुष के कार्य में विघ्न
उत्पन्न करते हैं और अनुचित नरक में गिरते हैं। तथा जो ब्राह्मण के
उपदेश के बिना ही स्वयं व्रत, नियम आदि का आचरण करते हैं ॥५९॥
वृथा तस्योपवासः स्यान्न स पुण्येन युज्यते ।
स एव नियमो ग्राह्यो यमेकोऽपि वदेद् द्विजः ॥६०॥
ब्राह्मण के अपमान को करनेवाले उपपुरुष ( जिसने ब्राह्मण के
उपदेश के बिना ही व्रत तथा उपवास का अनुष्ठान किया है) का किया
हुआ समस्त व्रत एवं उपवास व्यर्थ है, उसे कोई फल नहीं प्राप्त होता ।
इसलिए व्रत अथवा उपवास वेदज्ञ ब्राह्मण के उपदेश करने पर ही
फलप्रद होता है ॥६०॥
कुर्याद् वाक्यं द्विजाना च त्वन्यथा भ्रूणहा भवेत् ।
ब्राह्मणा जङ्गमं तीर्थं तीर्थभूता हि साधवः ॥६१॥
ब्राह्मणों की आज्ञा माननी चाहिए। न मानने पर भ्रूणहत्या-जैसा
महापाप लगता है। ब्राह्मण चलने-फिरनेवाले तीर्थ ही हैं। इसी प्रकार
साधुजनों को भी तीर्थ-स्वरूप ही समझना चाहिए ॥६१॥
तेषां वाक्योदकेनैव शुद्ध्यन्ति मलिना जनाः ।
ब्राह्मणा यानि भाषन्ते मन्यन्ते तानि देवताः ॥६२॥
ब्राह्मणों के वाक्यरूप जल से मलिन पुरुष भी शुद्ध हो जाते हैं।
ब्राह्मण जिस बात को कहते हैं, देवता लोग भी उस बात को मान
लेते हैं ॥६२॥
सर्वदेवमयो विप्रो न तद्-वचनमन्यथा ।
उपवासो व्रतं चैव स्नानं तीर्थं जपस्तपः ॥६३॥
¹विप्रसम्पादितं यस्य सम्पूर्णं तस्य तत्फलम् ।
ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ६५
ब्राह्मण सर्वदेवमय है, उसका कहा गया कोई भी वचन व्यर्थ नहीं
होता । जो ब्राह्मणों की आज्ञा लेकर उपवास, व्रत, स्नान तथा तीर्थ
करते हैं ॥६३॥
¹विप्रसम्पादितं यस्य सम्पूर्णं तस्य तत्फलम् ।
अन्नाद्ये कीटसंयुक्ते मक्षिका-केशदूषिते ॥६४॥
उन्हीं को उस स्नान, व्रतादि का सम्पूर्ण फल होता है । अन्न आदि
किसी वस्तु में यदि कीड़ा पड़ जावे अथवा मक्खी या केश पड़
जावे, तो ॥६४॥
तदन्तरा स्पृशेच्चापस्तदन्नं भस्मना स्पृशेत् ।
भुञ्जानश्चैव यो विप्रः पादं हस्तेन संस्पृशेत् ॥६५॥
उसमें जल छोड़ देवे पश्चात् भस्म छिड़क देवे तो उस अन्न की
शुद्धि हो जाती है । जो ब्राह्मण भोजन के समय अपने हाथ से पैरों को
छू लेवे ॥६५॥
स्वमुच्छिष्टमसौ भुङ्क्ते यो भुङ्क्ते भुक्तभाजने ।
पादुकास्थो न भुञ्जीत पर्यङ्के² संस्थितोऽपि वा ॥६६॥
उसे उच्छिष्ट भोजन का पाप लगता है, अथवा उच्छिष्ट पात्र में
भोजन करने से जो पाप लगता है वह उसे भी लगता है । खड़ाऊँ पर
बैठकर भोजन न करे अथवा पर्यंक ( खटिया ) आदि पर बैठकर भी
भोजन नहीं करे ॥६६॥
श्वान-चाण्डालदृष्टौ³ च भोजनं परिवर्जयेत् ।
यदन्नं प्रतिषिद्धं स्याद्भक्ष्याशुद्धिस्तथैव च ॥६७॥
१. 'विप्रैः' इति । २. 'पर्यङ्कस्थ-स्थितोऽपि' इति क्वचित्पुस्तके पाठः ।
३. 'दृक् चैव' इति ।
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