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पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

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पृष्ठ 75

ऽध्यायः भाषाटीकासहिता ६३
सर्वान् कामानवाप्नोति द्विजसम्पादितैरिह ।
दुर्बलेऽनुग्रहः प्रोक्तस्तथा वै बाल-वृद्धयोः ॥५५॥
इस प्रकार ब्राह्मण द्वारा व्रतादि से पुरुष की समस्त अभिलाषा
पूर्ण हो जाती है। ब्राह्मणों को भी दुर्बल, बालक तथा वृद्ध पर विशेष
रूप से अनुग्रह रखना चाहिए ॥५५॥
अतोऽन्यथा भवेद् दोषस्तस्मान्नानुग्रहः स्मृतः ।
स्नेहाद् वा यदि वालोभाद् भयादज्ञानतोऽपि वा ॥५६॥
इसके अतिरिक्त यदि बिना कारण ही ब्राह्मण अनुग्रह करे तो
दोष होता है, क्योंकि किसी पर स्नेह, लोभ, भय तथा अज्ञान से किया
गया अनुग्रह ॥५६॥
कुर्वन्त्यनुग्रहं ये तु तत्पापं तेषु गच्छति ।
शरीरस्याऽत्यये प्राप्ते वदन्ति नियमं तु ये ॥५७॥
ब्राह्मणों के लिए ही पाप का कारण बन जाता है। इसलिए दुर्बल
बालक तथा वृद्ध के अतिरिक्त किसी पर भी स्नेहादिवश ब्राह्मण
अनुग्रह न करे। शरीर के नाश होने की अवस्था में जो उसे नियम
तथा व्रत का उपदेश करता है ॥५७॥
महत्कार्योपरोधेन न स्वस्थस्य कदाचन ।
स्वस्थस्य मूढाः कुर्वन्ति वदन्ति नियमं चं^१ ये ॥५८॥
अथवा किसी बड़े कार्य में लगे या स्वस्थ व्यक्ति को उपदेश नहीं
देते एवं वे मन्दबुद्धि उपदेशक स्वस्थों के लिए नियम का उपदेश नहीं
करते ॥५८॥
ते तस्य विघ्नकर्तारः पतन्ति नरकेऽशुचौ ।
स्वयमेव व्रतं कृत्वा ब्राह्मणं योऽवमन्यते ॥५९॥
१. 'तु' इति ।